भारत में गरीबी के लिए दोषी कौन - संस्कृति या व्यवस्था ?---- (2)

भारत की राजनीतिक आर्थिक व्यवस्था

जो लोग आर्थिक तर्कशास्त्र और प्रोत्साहनों पर विश्वास करते है उनका मानना है कि भारत की गरीबी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के कारण है।ब्रिटेन के उपनिवेशों में जिन देशों ने इस सदी में आजादी हासिल की उनमें से केवल भारत ही ऐसा देश है जिसमें लगातार लोकतंत्र रहा है। लेकिन भारत के भी लोकतंत्र के अपने विरोधाभास रहे हैं ।लोकतंत्र सबसे कम बलप्रयोग करनेवाली व्यवस्था है लेकिन इसकी कार्य़प्रणाली इसकी बलप्रयोग की शक्ति को बढा देती है।लोकतंत्र के गतिशास्त्र  और विकास का नेहरूवादी माडल अपनाने के कारण भारतीय जीवन का कोई क्षेत्र इतना सुरक्षित नहीं रहा जहां सरकार का हस्तक्षेप न हो। सरकार ने निजी संपत्ति को समाप्त नहीं किया मगर लाइसेंस-कोटा-परमिट राज के जरिये उत्पादन, वितरण और उपभोग के हर पहलू पर शिकंजा कसा। इस व्यवस्था ने राजनेताओं और नौकरशाहों को असीमित अधिकार दिए। नेताओं ने विकास करने की आड़ में देश को खूब लूटा। भारत में अंग्रेजो का राज तो खत्म हो गया लेकिन उसकी जगह नेता –बाबू राज।(राजनीतिज्ञ-नौकरशाह राज) आ गया।

यहां नेता-बाबू राज का उदाहरण पेश है। कारों को विलासिता की वस्तु घोषित किया गया था और केवल दो कंपनियों को उसका उत्पादन करने की इजाजत थी वह भी उतनी हा संख्या में जो सरकार ने तय की हों ।वे वही एक माडल 40 साल तक बेचती रहीं और कोई भी तबतक उन्हें खरीद सकता था जबतक उनका रंग सफेद हो। सरकार के नियंत्रणों का औचित्य हमेशा स्वयंसिद्ध होता है।कार अभी तक विलासिता की वस्तु रहीं। भारतीय शासन की अजीबोगरीब नीति  का एक और उदाहरण लीजिए, सरकार के विशेषज्ञों ने सड़कों के निर्माण और डिजाइनों का अध्ययन करने के लिए कई देशों का दौरा किया।इन देशों के मार्ग बनाने के आम तरीकों का अनुकरण करते हुए उनहोंने राजमार्गों के बीच में काफी चौड़ी जगह छोड़ना शुरू किया जहां घास ,हरी झाड़ियां,और पेड़ लगाए गए। इससे अचानक राजमार्गों पर गंभीर किस्म का ट्रैफिक जाम होने लगा। राजमार्गों के बीच की इन चौड़ी क्यारियों को गायों ने खोज निकाला ।ट्रैफिक को सैंकड़ों गायों के बीच अपनी राह बनानी पड़ती थी क्योंकि भूखी गायें बीच की क्यारियों की तरफ भगती थी। आखिर गायें और कहां जाती। यह भारतीय विशेषताओं से युक्त समाजवादी आर्थिक नियोजन था।

लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार के लगातार घटने और अर्थव्यवस्था के ढहने ने भारत को उदारवाद के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ा। आटो के बाजार को खोला गया। पहले विदेशी कंपनियां अपने कारखाने नहीं डाल सकतीं थ थीं लेकिन भारतीय कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम चलाने की इजाजत मिली। भारत को विदेशी राज की स्मृतियां अब भी परेशान किए हुए थी। पहले  भारत में विदेशी कंपनियों को संयुक्त उद्यमों में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने की इजाजत दी गई ।यह दलील दी गई कि नियंत्रण   भारतीय कंपनी के हाथ में रहना चाहिए। फिर इस सीमा को 40 प्रतिशत तक बढ़ाया गया। बाद में काफी खींचातानी के बाद इसे 49 प्रतिशत तक बढ़ाया गया। कुछ समय तक ऐसा ही चलता रहा और इस तरह भारत की सार्वभौमता औरआर्थिक विकास की  में संतुलन कायम करने की कोशिश की गई और फिर भारत ने अपनी कथित सार्ऴभौमता खो दी और सीमा 51 प्रतिशत तक बढ़ा दी गई।फिर नए माडल लाए गए नए रंग भरे गए। विदेशी कंपनियों को आटो मार्केट में खुली छूट दे दी गई जबतक वह संबंधित मंत्रालय से अनुमति  लेने में कामयाब होती थी। मंत्रालय लगातार कंपनियों को याद दिलाते रहते थे कि उन्होंने तीव्र गति से निर्णय करने का वादा किया है।सभी निवेश संबधी निर्णय तेजी सेहोते थे।इस तरह नेता – बाबू राज ने ब्रिटिश राजकी यादों को जिंदा रखा।

यह लेख लिखने तक (1998 ) इस देश में कुछ भी नहीं बदला है। वाणिज्य मंत्री ने हाल ही प्रेस कांफ्रेस बुलाई और गर्व के साथ न वस्तुओं की की सूची की घोषणा की कि जो ओपन जनरल लाइसेंस में होंगी।इन वस्तुओं को आयात करने के लिए अब सरकार की अनुमति की जरूरत नहीं होगी।क्या इन वस्तुओं मे सूचना तकनीक के उत्पाद शामिल थे जो देश को इक्कीसवी सदी में ले जाएंगे और देश के इंजीनियरों को विश्व स्तर पर प्रतियोगिता करने में सक्षम बनाएंगे।लेकिन ऐसा नहीं था ।इस सूची थे कास्मेटीक्स और स्टाकिंग्स।उदारीकरण का दौर शुरू होने से पहले लोगों को लोरियल और एग के उत्पाद खरीदने के लिए भी आयात लाइसेंस लेना प़डता था।अब जब कास्मेटीक और स्टाकिंगस का आयात खुल गया तो कम से कम अब बारतीय महिलाएं विदेशी महिलाओं के साथ होड़ कर सकती हैं।यह भारतीय विशेषताओं से युक्त उदारवाद है।

नेता –बाबू राज की इस मानसिकता को देकने के बाद भारत में गरीबी के लगातार बने रहने के मामले में किसी व्याख्या की जरूरत नहीं है।लेकिन फिर भी यह सवाल रह जाता है। (जारी)

- पार्थ जे शाह
(प्रख्यात अर्थशास्त्री और थिंक टैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी के अध्यक्ष,यह लेख 1998 में फ्रीमैन पत्रिका में छपा था)