भारत का विकास अफ्रीका से बेहतर क्यों

भारत आर्थिक सुधार करने में भले ही अफ्रीका से पीछे रहा, लेकिन विकास में काफी आगे निकल चुका है। भारत में ज्यादातर सुधार जीडीपी विकास दर के 6 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंचने से काफी पहले ही हो चुके थे। ब्रिटिश विद्वान जेम्स मेनर कहते हैं कि घाना और दक्षिण अफ्रीका के विचारशील लोग उनसे पूछते हैं, "भारतीय ऐसा कैसे कर पाते हैं? उनके यहां उदारीकरण हमसे कम हुआ, लेकिन उनकी विकास दर हमसे ज्यादा है और समाज में स्थिरता भी अधिक है।"

इसका जवाब मैं देना चाहुंगा। आर्थिक सफलता महज आर्थिक सुधारों पर नहीं बल्कि सांस्थानिक मजबूती और ऐतिहासिक कौशल पर भी निर्भर करती है- जिसे अर्थशास्त्री ‘आरंभिक स्थितियां’ (इनिशियल कंडीशन) कहते हैं। भारत और चीन ऐतिहासिक महाशक्तियां हैं। यहां औद्योगिक क्रांति से पहले दुनिया के संपूर्ण औद्योगिक उत्पादन का 70 फीसदी उत्पादन होता था।

पश्चिमी उपनिवेशवाद के 300 साल के दौरान उनका पतन हुआ, लेकिन अब वो एक बार फिर अपनी पुरानी श्रेष्ठ स्थिति हासिल करने में जुट गए हैं। 17वीं सदी में भारतीय बैंक उद्यमी और कारोबारी ईस्ट इंडिया कंपनी से भी ज्यादा बड़ी हैसियत रखते थे।

पलासी के युद्ध के बाद रॉबर्ट क्लाइव जब मुर्शिदाबाद में दाखिल हुआ तो उस समय उसे यह लगा कि ये शहर लंदन से ज्यादा समृद्ध है। शाहजहां के पास इतना धन और कौशल था कि उसने ताजमहल बनवा डाला, लेकिन उनके समकालीन यूरोपीय शासकों के पास इतनी क्षमता नहीं थी।

इस संदर्भ में देखें तो पिछले 300 सालों में भारत और चीन का पतन एक अल्पकालिक घटना थी। अलग तरह की आरंभिक स्थितियों की वजह से चीन और भारत ने जितनी तेजी से विकास किया, उसे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लिए दोहरा पाना मुश्किल है।

अफ्रीका और एशिया के देशों को 'विकासशील देशों' के वर्ग में एक साथ रखना, एक तरह का राजनीतिक तिकड़म है। 1970 के दशक तक अफ्रीका में अस्थायी खेती का ही दौर चल रहा था। लेकिन एशिया के अधिकांश हिस्सों में करीब 3000 साल पहले ही अस्थायी खेती की जगह स्थायी खेती शुरू हो चुकी थी।

इसने शासक वर्ग को आवश्यक इंजीनियरिंग और कौशल के विकास के लिए अवकाश और अवसर मुहैया कराया। 3000 सालों से लगातार स्थायी खेती करने के कारण यहां लोगों में नए-नए कौशल और नई-नई तरकीबों का विकास होता गया। अस्थायी कृषि के दौर से अभी-अभी बाहर निकल रहे अफ्रीकियों के पास इस तरह के कौशल का अभाव है-उनकी अर्थव्यवस्था में बाजार या कारोबारी कुशलता अनुपस्थित थी।

खुद भारत में कई जगहों की स्थिति अफ्रीका से बेहतर नहीं है। ये बात भारत के आदिवासी इलाकों में महसूस की जा सकती है, जिन्होंने हाल ही में अस्थायी कृषि को छोड़कर स्थायी कृषि को अपनाया है। अफ्रीका की तरह ही भारतीय आदिवासी क्षेत्रों में कौशल और कारोबारी प्रवृत्ति का अभाव है। मैदानी इलाकों के लोग बड़ी आसानी से झांसा देकर कबायली लोगों की जमीन हथिया लेते हैं।

पूरा का पूरा अफ्रीका ऐतिहासिक दृष्टि में पिछड़ा नहीं रहा है। मिस्र, ट्यूनीशिया और अल्जीरिया जैसे प्राचीन कृषि प्रधान देश विकास और संभावनाओं के मामले में भारत से कमतर नहीं, बल्कि आज की तारीख में भारत से कहीं ज्यादा समृद्ध हैं। लेकिन सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में पड़ने वाले अफ्रीकी देश भारत और मिस्र की तुलना में पिछड़े हैं। भारत के आदिवासी इलाकों में विकास उतना ही मुश्किल है, जितना की अफ्रीका में। ये कहा जाता है कि आदिवासी इलाके की किसी ग्रामीण समिति में अगर 11 आदिवासी और एक गैर-आदिवासी होंगे तो, गैर-आदिवासी हर फैसले में हावी रहेगा और उसी अकेले के पास सारे संसाधन और कौशल होंगे।

इस अंतर को पाटने के लिए कई पीढ़ियों तक अच्छी शिक्षा और अन्य कौशलों के प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा। कई अफ्रीकी देश साक्षरता के मामले में भारत से आगे हैं, लेकिन वो संस्थानिक ढांचों में पीछे रह गए हैं। इनमें से कई देशों पर ठगों का शासन हैं, जिन्होंने इन देशों को बर्बाद कर रखा है।

नेहरु युग में आर्थिक मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन नहीं हुआ। लेकिन इस युग में देश को सांस्थानिक मजबूती मिली- लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, राज्य की मनमानी पर रोक, उच्च गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालय और प्रौद्योगिकी संस्थान।

अर्थव्यवस्था पर राज्य के सख्त नियंत्रण के दौर में भी निजी क्षेत्र काफी सक्रिय रहा। लाइसेंस-परमिट राज के मुश्किल दौर में अपना वजूद बनाए रखने वाले कारोबारियों ने इस दौरान इस तरह की कार्य-कुशलता विकसित की कि औद्योगिक और आयात लाइसेंस पाबंदियों के हटते ही उनका कारोबार आसमान की बुलंदियां छूने लगा।

अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के ज्यादातर देशों में न केवल सांस्थानिक मजबूती की कमी है, बल्कि उनमें भारतीय अर्थव्यवस्था की व्यापकता का भी अभाव है। अल्पशिक्षित और अकुशल लोगों की भारी तादाद की तुलना में भारत में विश्वस्तरीय अन्वेषकों और कुशल प्रबंधकों की संख्या बहुत कम है। लेकिन भारत में अन्वेषकों और प्रबंधकों की ऐसी एक फीसदी आबादी का मतलब होता है करीब 1 करोड़ 20 लाख लोग, जो किसी आर्थिक करिश्मे के लिए काफी हैं। भारत की तरह कोई भी लैटिन अमेरिकी या अफ्रीकी देश एक साल में 5,00,000 इंजीनियर पैदा नहीं कर सकता। इन 5 लाख इंजीनियरों में आधे नाकाबिल हो सकते हैं, लेकिन एक चौथाई उपयोगी होते हैं और शेष एक चौथाई विश्वस्तरीय होते हैं।

अफ्रीका में आर्थिक सुधार मुख्य रूप से दानकर्ताओं की मदद से मुमकिन हो रहे हैं, जिसका स्थानीय बुद्धिजीवी सख्त विरोध कर रहे हैं। इसलिए आर्थिक सुधारों के स्वागत की बजाय उसके विरोध में ज्यादा राजनीतिक ऊर्जा लगी। लेकिन भारत में नरसिम्हा राव आर्थिक सुधारों को लेकर काफी गंभीर थे। आर्थिक सुधारों को अपना निजी काम समझने के कारण इसकी गति धीमी रही और यह किसी सुनियोजित तरीके से नहीं हो सका, लेकिन फिर भी ये सुधार देश के अंदर से ही पैदा हो रहे थे। औद्योगिक और कारोबारी क्षेत्र में सुधारों की शुरुआती कामयाबी से सुधार की अच्छी छवि बनी और इससे पीछे लौटने का सवाल ही नहीं रह गया।

संसद में बहुमत न होने के बावजूद नरसिम्हा राव ने बड़े-बड़े आर्थिक सुधार लागू किये, जबकि विपक्षी पार्टी इसका तीखा विरोध कर रहे थे और यहां तक कसम खा रहे थे कि सत्ता में आने के बाद वो इन सुधारों को वापस ले लेंगे। नरसिम्हा राव के इस कदम से भारत की सांस्थानिक दृढ़ता दिखाई पड़ती है।

अफ्रीका में दानकर्ताओं की मदद से अंधाधुंध आर्थिक सुधार किए गए, जिसका फायदा गिने-चुने लोगों को मिला, जबकि एक बड़ी आबादी को इसका नुकसान झेलना पड़ा। इससे आर्थिक सुधारों की बदनामी हुई। इसके विपरीत भारतीय राजनेताओं ने उदारीकरण का पक्ष लिया जिससे ज्यादा लोगों तक इसका लाभ पहुंचा और कम लोगों को नुकसान हुआ।

इसलिए जब बैंक यूनियन और किसानों ने ये धमकी दी कि अगर उनके क्षेत्र में उदारीकरण किया गया तो वो सड़क पर उतरेंगे तो नरसिम्हा राव ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे ऐसा नहीं करेंगे। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों की तादाद में कटौती से भी इनकार कर दिया। व्यावहारिक अर्थनीति ये कहती है कि संकट का काल ही कष्टकर उपायों (जैसे- श्रमसुधार) को आजमाने का बिलकुल सही वक्त होता है।

लेकिन राव ने विदेशी अर्थशास्त्रियों की नीतियों की बजाय लोकतांत्रिक राजनीति को ज्यादा अहमियत दी। नरसिम्हा राव ने अपना ध्यान उन क्षेत्रों पर केंद्रित किया जहां जल्द ही फायदा नजर आने लगे और कम से कम लोगों को नुकसान झेलना पड़े। उन्होंने औद्योगिक लाइसेंस को हटाया और कुछ घरानों का एकाधिपत्य खत्म किया, आयात शुल्क को धीरे-धीरे कम किया और बाजार आधारित विनमय दर (एक्सचेंज दर) अपनाई, जिससे विदेशी विनिमय में अंततः काला बाजारी खत्म हुई।

बाद में विश्व बैंक भी इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में उसकी अंधाधुंध आर्थिक सुधार की नीतियां सही नहीं थीं, इसकी बजाय उन्हें कारोबार में आने वाली अड़चनों और पाबंदियों को हटाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए था। ये काफी हद तक राव की नीतियों के करीब ही था, जो अकादमिक शोधों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं से उपजी थीं।

संक्षेप में कहें तो भारत में 8-9 फीसदी की विकास दर केवल आर्थिक सुधारों की ही देन नहीं है। इसकी मजबूत आरंभिक स्थितियां पिछले 3000 सालों के दौरान विकसित कौशल और पिछले 60 सालों के दौरान हासिल संस्थानिक दृढ़ता से तैयार हुई हैं। वो देश जहां ऐसी नींव नहीं बनी हैं, वहां भारत की कामयाबी को दोहरा पाना कठिन है।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर