विश्व बाजार में कहा हैं हम...

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए कहा है कि देश का बाजार दुनिया के लिए हमने खोला है। उनकी बात सही है। देश सचमुच आज दुनिया का बाजार बन गया है, लेकिन दुनिया के बाजार में हम कहां हैं? यह उन्होंने नहीं बताया है। भारत दुनिया का एक ऐसा देश है, जिसके पास प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों की कमी नहीं है। अपने उद्योग धंधों का विज्ञान एवं तकनीक के जरिये आधुनिकीकरण करके विश्व बाजार का यह एक बड़ा खिलाड़ी बन सकता है, लेकिन आज जब दुनिया के बाजार पर नजर डालते हैं तो भारत सहित तमाम देशों में चीनी सामानों की भरमार दिखाई देती है। हमारे यहां लैपटाप से लेकर पेन ड्राइव, टेलीविजन, मोबाइल आदि इलेक्ट्रॉनिक्स के तमाम सामान, खिलौने, घडि़यां आदि कई तरह के सामानों पर मेड इन चाइना की मोहर दिखाई देती है।

भारतीय बाजारों में तो गणेश लक्ष्मी की मूर्ति से लेकर रेडीमेड कपड़े और जूते चीन से बनकर आ रहे हैं। पुल का निर्माण हो या टेलीफोन एक्सचेंज, बिजली घर हो या अन्य प्रकार के ढांचागत निर्माण, आज भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के देशों में चीनी कंपनियां बड़े स्तर पर ठेके ले रही हैं। कुल मिलाकर आज विश्व बाजार पर चीन का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है। आर्थिक मोर्चे की जंग ने एक नए प्रकार के युद्ध का क्षेत्र तैयार किया है। यह युद्ध अपनी तकनीक और कौशल के द्वारा दुनिया के बाजार पर कब्जा करने के लिए लड़ा जा रहा है। इस युद्ध में चीन, अमेरिका, जापान ने दुनिया के तमाम देशों को पीछे छोड़ दिया है। विज्ञान और तकनीक को विकास का हथियार बनाकर तरक्की करने वाला दूसरा देश जापान है। 1945-46 के परमाणु युद्ध में जापान लगभग बरबाद हो गया था और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भी उसके पास कोई खास चीज नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं की मार भी वह झेलता रहा है, लेकिन विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में विकास करके उसने अपने उद्योग धंधों का जो कायाकल्प किया है, उसकी मिसाल खोजनी मुश्किल है। लेकिन हमारे देश के नेताओं और जनता ने इन देशों से कुछ भी नहीं सीखा।

चीन की आबादी भारत से अधिक है और उसके पास कृषि योग्य भूमि भी भारत से कम है। पचास-साठ साल पहले चीन के पास ऐसा कुछ नहीं था, जिसका उदाहरण पेश जाए। लेकिन उसके नेताओं खासकर माओत्से तुंग और उसके बाद जियाबाओ के नेतृत्व में चीन का आधुनिकीकरण हुआ और आज भी जारी है। वैश्वीकरण के इस युग में सरकार और उसके तंत्र की भूमिका उत्प्रेरक की हो गई है। हमारे उद्यमी दुनिया के बाजार का अधिक से अधिक लाभ उठा सकें, इसके लिए जरूरी है कि सरकार नियामक की नहीं, बल्कि सहायक की भूमिका निभाए। आज विश्व बाजार में छुटभैयों के लिए कोई जगह नहीं है। जरा सोचिए, पिछली सदी में अपने नए प्रवर्तनों से इतिहास बनाने वाली नामी-गिरामी कंपनियों को भला आज कौन याद करता है? द्वितीय विश्व युद्ध के जमाने में फार्चून 500 ब्रांड सूची की 10 शीर्ष कंपनियों में से सात कंपनियां तो आज इस सूची में जगह तक नहीं पा सकी हैं। दूसरी ओर हम देखते हैं कि जीई या टाटा जैसी कंपनियां समय और जरूरत के साथ अपने को निरंतर बदलते हुए आज भी अग्रणी ब्रांड बनी हुई हैं।

जैसे-जैसे वैश्वीकरण की प्रक्रिया गति पकड़ती जा रही है, नई चुनौतियां और अवसर भी उत्पन्न हो रहे हैं। नए बाजार, उत्पाद, मूल्य, कच्चे माल के नए स्त्रोत और वैविध्यपूर्ण प्रतिभाओं की खेप कुछ ऐसे नए अवसर हैं। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चुनौती उभरते हुए विश्व व्यवसाय वातावरण की जटिलता है। अनंत संभावनाओं में से उचित समय पर उचित अवसर का पता लगाना और तीव्र गति से उचित निवेश के साथ क्रियान्वयन आज की सबसे बड़ी चुनौती है। लगातार विकास वृद्धि और कुशल नेतृत्व का चोली दामन का साथ है। दोनों को टिकाए रखने के लिए भारत की मजबूत कंपनियों को चाहिए कि वे अपने घरेलू माहौल के सुरक्षित आंगन से बाहर निकलें।

वैश्वीकरण अब अपने पसंद की बात नहीं रही, बल्कि व्यावसायिक मजबूरी बन चुकी है। भारतीय उद्योगों के सामने आज यह एक अद्वितीय चुनौती है। स्पर्धात्मक उत्पादन के लिए एक आवश्यक शर्त है किफायती आर्थिक प्रबंधन की व्यवस्था करना। भारतीय कंपनियां अपनी सीमाओं से बाहर जाकर यह हासिल कर सकती हैं। वास्तव में वैश्विक स्तर प्राप्त करने की चर्चा करना बड़ा आसान है, लेकिन सचमुच कर दिखाना दूसरी बात है। उद्योगों के लिए दो बातें अनिवार्य हैं। एक तो सभी मानदंडों पर खरा उतरना। दूसरी बात है निरंतर परिवर्तन एवं नवीनता की क्षमता हासिल करना। यहीं पर लोगों या कर्मचारियों का विशेष महत्व होता है। खासकर उस उद्योग में जिसकी सफलता उत्पाद प्रौद्योगिकी और आक्रामक विपणन टीम के सम्मिश्रण के साथ सहयोगी सेवाओं से तालमेल पर टिकी होती है। वास्तव में विचार से समृद्धि आती है और विचार लोगों से ही उत्पन्न होते हैं। जितने अधिक जागरूक हमारे लोग होंगे, उतने ही चुस्त चौकन्ने हमारे उद्योग भी होंगे। शीर्ष बनने और टिके रहने के लिए आज की आवश्यकता है परिवर्तन, निरंतर परिवर्तन और अपनी दृष्टि और उद्योगों का एक जटिल और वैश्वीकरण संसार की मांगों के साथ तालमेल कायम करना जरूरी हो गया है। इसके लिए अक्सर ग्राहक की जरूरतों पर पहले से अंदाजा लगाकर दौड़ में आगे रहना जरूरी हो जाता है।

आज नेतृत्व उन्हें हासिल होगा, जो अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने की क्षमता दिखाएंगे। केवल लाभ के मदों पर नहीं, बल्कि मानव संसाधन प्रबंधन, प्रतिभाओं को अपने पास रखने, पर्यावरण सुरक्षा, समाज को प्रत्यक्ष लाभ और कुल मिलाकर संपूर्ण अनुकूलता जैसे गैर-वित्तीय मदों पर भी निरंतर आगे बढ़ते रहना जरूरी है। भारत की क्षमताओं को देखते हुए जरा भी संदेह नहीं है कि भारतीय उद्योग विश्व की सर्वश्रेष्ठ इकाइयों में गिने जाने की क्षमता रखता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार आर्थिक सुधारों के साथ-साथ खुद अपना भी सुधार करे। अमेरिका, चीन, जापान आदि देशों ने तकनीकी साम‌र्थ्य हासिल करके ही अपना विकास किया है और विश्व बाजार में हावी है। लेकिन इस बात को न देश के अग्रणी नेताओं ने समझा है और न ही हमारे प्रमुख उद्योगपतियों और जनता ने जाना है। इसकी अहमियत उनकी सोच के बाहर लगती है, लेकिन यदि भारत को आर्थिक दृष्टि से संपन्न बनना है और अपनी विकास दर बढ़ानी है तो अपनी मूल तकनीकी क्षमता को विकसित करना होगा। तभी हम विश्व बाजार में दूसरे देशों का मुकाबला कर सकेंगे। कोई भी देश उत्पादक देश बने बिना बहुत दिनों तक उपभोक्ता नहीं बना रह सकता है। इसलिए दूरगामी योजनाओं के जरिये अपने उद्योग धंधों को पूर्णतया सशक्त बनाने के लिए तकनीकी साम‌र्थ्य को हमें विकसित करना ही होगा। इसके अलावा देश के आर्थिक विकास का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

निरंकार सिंह (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण