भारत में शिक्षा का पैमाना औसत दर्ज़े का

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने कुछ समय पहले जारी अपनी रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर केन्द्रित किया है। इस हिस्से में बेशक स्कूलों में बच्चों का नामांकन और उपस्थिति बढ़ने के लिए भारत की पीठ थपथपाई गई है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि देश में छात्रों को औसत दर्जे की शिक्षा और कौशल प्रदान किया जा रहा है। इसमें पढ़ना और लिखना भी शामिल है, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों से नीचे है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बेशक भारत में आने वाले सालों में शिक्षित श्रमजीवी वर्ग की तादाद में इज़ाफा होगा, लेकिन डिग्री और सर्टिफिकेट इकठ्ठा करने की बजाय वास्तविक कौशल प्राप्त करना ज्यादा अहम है। यह किसी व्यक्ति की आमदनी बढ़ने की संभावनाओं को तो बढ़ाती ही है साथ ही उसका देश के विकास में योगदान भी सुनिश्चित करती है।

भारत ने हाल ही में सूचित किया था कि बुनियादी शिक्षा की दर में 74 फीसदी तक का इज़ाफा हुआ है। एक दशक पहले यह आंकड़ा 65 फीसदी था। फिर भी रिपोर्ट में विद्यार्थियों को प्रत्येक स्तर पर प्रदान किए जा रहे कौशल की गुणवत्ता पर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट कहती है, “पढ़ने वाले विद्यार्थियों पर आधारित अध्ययनों से यह प्रतीत होता है कि शिक्षा दर में सुधार की बातें जो अखबारों के शीर्षकों में प्रकाशित हैं, दरअसल एक आवरण मात्र है। यह टिप्पणी भारतीय स्कूलों में जिस तरह की शिक्षा प्रदान की जा रही है, उसे देखते हुए की गई है।

भारत में 1990 के शुरूआत से ही लोगों के व्यय करने की क्षमता में 6 फीसदी सालाना का इज़ाफा हुआ है। लेकिन 1 अप्रैल 2008 से मार्च 31 2009 के वित्तीय वर्ष तक लोगों की व्यय क्षमता सकल घरेलू उत्पाद की 3.8 फीसदी ही थी। यह बेशक चीन जैसे बड़े उभरते हुए देशों के समांतर है। लेकिन उन 34 देशों से काफी नीचे है, जो आर्थिक सहयोग और विकास संगठन से संबद्ध हैं। गौरतलब है कि इस सगंठन का उद्देश्य विश्वभर में आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त करना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार द्वारा उच्च निवेश और विधि-संबंधी पहल की वजह से प्रत्येक स्तर पर शिक्षा की दर संबंधी आंकड़े ज़रूर बढ़ गए हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए कई तरह के सुधार किए जाने जरूरी हैं, जो आर्थिक विकास के लिए अत्यावश्यक हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक बीच में ही स्कूल छोड़ देने में प्रवृति में कमी आई है। फिर भी वे बच्चे जिन्होंने 2001 में प्राइमरी स्कूलों में एडमिशन लिया था, 31 मार्च 2008 तक उनमें से महज़ आधे से कुछ ज्यादा ही आठवीं कक्षा तक पहुंचे। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों की स्कूल में हर रोज़ उपस्थिति उनके खराब स्वास्थ्य की वजह से बाधित होती है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश शैक्षिक सफलता की दिशा में एक अहम कारक सिद्ध हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी तादाद में शिक्षकों का अनुपस्थित रहना और स्कूलों में मौजूदगी के दौरान भी ज्यादा कुछ ना करना, स्कूली पढ़ाई के लिए हानिकारक है। इसके परिणामस्वरूप कम-लागत वाले निज़ी स्कूलों की तादाद काफी ज्यादा बढ़ गई है। रिपोर्ट कहती है, “जिन लोगों की आमदनी साधारण ही है, वे भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। इससे सरकारी स्कूलों को लेकर उनकी असंतुष्टि का पता चलता है। अभिभावकों को लगता है कि निजी स्कूल उच्च-गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करते हैं।”

सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की नियुक्ति राज्य सरकारों द्वारा स्थायी रूप से की जाती है। जबकि निजी स्कूल के शिक्षक स्कूली स्तर पर ही नियुक्त किए जाते हैं। इनकी नियुक्ति एक निर्धारित अवधि के लिए ही की जाती है।

रिपोर्ट कहती है, “यही कारण है कि निजी स्कूल के टीचरों पर जवाबदेही का ज्यादा बोझ होता है।” रिपोर्ट के तहत सुझाव दिया गया है कि भारत को एक ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिसके तहत बार-बार अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों को पदमुक्त किया जा सके। फिर भी रिपोर्ट में इस बात पर सहमती जताई गई है कि राजनीतिक तौर पर ऐसा करना बेहद मुश्किल होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, “स्थायी इकरारनामे वाली व्यवस्था को खत्म करना असरदार साबित होगा। इसके अलावा सरकारी स्कूल के शिक्षकों की निगरानी व्यवस्था को औऱ ज्यादा बढ़ाना फायदेमंद साबित होगा। इससे शिक्षक छात्रों को पढ़ाने की दिशा में अपनी कोशिश बढ़ाएंगे और अंतत: शिक्षा की गुणवत्ता में इज़ाफा होगा।”

अगर उच्च शिक्षा की बात की जाए, तो कॉलेज में नामांकन कराने वाले छात्रों का औसत अब भी तुलना किए जाने वाले देशों के मुकाबले कम है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों के लिए एजुकेशन लोन को ज्यादा सुलभ और सरल बना दिया जाना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है, “उच्च शिक्षा व्यवस्था में कमी के सूचक भारतीय स्नातकों को कम तनख्वाह में नौकरी मिलने को लेकर दिखाई दिए।

रिपोर्ट में 2010 में यूनीवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया के राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर देवेश कुमार के शोध का हवाला भी दिया गया है। इस शोध के मुताबिक प्रशासनिक सेवा की प्रवेश परीक्षा में हिस्सा लेने वाले हज़ारों आवेदक ऐसे थे, जिन्होंने अर्थशास्त्र और सांख्यिकी में दक्षता हासिल की हुई थी। उनके लिए सिविल सेवा में 30 स्थान निर्धारित थे, लेकिन उनमें से महज़ 23 ही अपनी योग्यता साबित कर पाए।

2007-08 वित्तीय वर्ष के दौरान कॉलेज जाने वाले 13.6 फीसदी छात्रों ने ही उच्च शिक्षा के लिए नामांकन करवाया। लेकिन यह अनुपात अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुकाबले कम है। रूस, ब्राज़ील, चीन और इंडोनेशिया में इसके विपरीत ज्यादा छात्र उच्च शिक्षा के लिए नामांकन कराते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का उद्देश्य इस अनुपात को 2020 तक 30 फीसदी बढ़ाना है।

- गीता आनंद
साभार: वाल स्ट्रीट जर्नल