भारत तभी चीन को टक्कर दे पाएगा जब वह पूंजीवादी बनेगा -लिंगल -(2)

उदारवादी अर्थशास्त्री क्रिस्टोफर लिंगल पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए हुए थे।उन्होंने सेंटर फार सिविल सोसायटी के चिंतन श्रृंखला के अतर्गत दो भाषण दिए। वे ग्वाटेमाला के विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर है इसके अलावा सेंटर फार सिविल सोसायटी में रिसर्च स्कालर हैं।राजनीतिक अर्थशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र उनकी दिलचस्पी के मुख्य विषय रहे हैं।जिन्हें वे उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर फोकस करते हैं। उनकी सिंगापुर के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखी  Singapore's Authoritarian Capitalism: Asian Values, Free Market Illusions, and Political Dependency और  The Rise and Decline of the 'Asian Century': False Starts on the Road to the 'Global Millennium' काफी सराही गईं। सतीश पेडणेकर ने उनसे उनके अकादमिक जीवन ,. पश्चिमी देशों  में पूंजीवाद के गहराते संकट, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े  कुछ मुद्दों पर बातचीत की। लिंगल ने बहुत इत्मीनान से उनके जवाब दिए। प्रस्तुत है इस बातचीत की दूसरी किश्त

आर्थिक संकट अमेरिका और यूरोपीय देशों में है और अशियाई देशों में कम है। ऐसा क्यों है?

मुझे ऐसा नहीं लगता। भारत में भुगतान संतुलन और रूपये के गिरावट  की समस्या है।भारी राजकोषीय घाटा है। आप जो देख रहे हैं वह यह है कि कुछ एशियाई  अर्थव्यवस्थाएं  अमेरिकी अर्थव्यवस्था  की तुलना में छोटी हैं। और हालांकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था गिरावट आई है इसके बावजूद वे भारत से सामान खरीदते हैं वह अर्थव्यवस्था को जीवंत बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। यदि वह यह सामान न खरीदे तो तो भारत के लिए समस्या पैदा हो जाएगी। चीन अधिनायकवादी होने के कारण अपनी बहुत सी समस्याओं को छुपाने में कामयाब हो जाता है जो भारत नहीं कर सकता। चीन इसलिए टिका हुआ है क्योंकि डालर की आवक बनी हुई है। जब वह बंद हो जाएगी चीन की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाएगी। क्या यह डालर की आवक बंद होगी। मेरा मानना है कि आखिरकार बंद होगी। कब? कब यह मैं नहीं कह सकता। चीन की सफलता और आर्थिक विकास के भ्रम  का उसी तरह अंत होगा जिस तरह ग्रीस में हुआ। दुनियाभर में यह हो रहा है कि सरकारी क्षेत्र की जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही हैं और वह प्राइवेट क्षेत्र की तुलना में ज्यादा तेजी से खर्च कर रहा है। भारत में लोकतंत्र है जो मजदूरों और किसानों के असंतोष के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करता है।

क्या आपको नहीं लगता कि कि भारत को उसकी जनकल्याणकारी योजनाओं और सरकारी क्षेत्र ने संकट से बचा लिया?

मेरी नजर में  सारे जनकल्याणकारी कार्यक्रम आखिरकार पैसे की बर्बादी,और अर्थव्यवस्था पर बोझ होते हैं। सरकार केवल तभी खर्च कर सकती है जब वह प्रायवेट सेक्टर से संसाधन जुटाए। तो भारत में यह हो रहा है जब भारत में आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ तो तब पलड़ा सरकारी क्षेत्र की तरफ बहुत ज्यादा झुका हुआ था। इसलिए जब कहा जा रहा था कि प्राइवेट सेक्टर बढ़ रहा है तब भी  अन्य देशों की तुलना में उसकी रफ्तार कम थी । भारत के जनकल्याणकारी कार्यक्रम एक लोकलुभावन भ्रांति है।पैसा लोगों तक नहीं पहुंच रहा है। बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करने के बावजूद कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आया है।  ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में असंतुलन पैदा किया है। उसने एक तरफ  मजदूरी और दूसरी तरफ अनाज के दाम  बेतहाशा बढ़ा दिए हैं। फसल के मौसम में लोगों को कृषि मजदूर मिलना मुस्किल हो गया है। इस तरह जनकल्याण कार्यक्रमों ने भारत की हालत को बेहतर नहीं बनाया है। हालात बदतर ही हुए हैं।

भारत में आर्थिक उदारीकरण बहुत सफल नहीं रहा है। हालांकि कुछ समय तक विकास दर अच्छी रही लेकिन बाद में महंगाई, आय की असमानता, गरीबी  और बेरोजगारी बढ़ी।

उदारीकरण 1990 के बाद भारत सरकार द्वारा की गई नीतिगत पहलों का एक छोटा सा हिस्सा रहा है  और उदारीकरण की प्रक्रिया कछुआ चाल से चल रही है। उदारीकरण अच्छा पक्ष यह है कि इसने लाइसेंस कोटा राजा को खत्म किया जो भारत की उत्पादक शक्तियों के व्यक्त होने में बाधक बना हुआ था। सरकार ने जो किया वह यह था कि उसने भारत के लोगों को उदारीकरण के जरिये आगे बढ़ने का  5 प्रतिशत अवसर दिया।यदि 90 प्रतिशत अवसर दिया जाए तो भारत दुनिया का सबसे अमीर देश होगा। असल में भारत सरकार अर्थिक सुधारों  को रोककर भारत के विकास को अवरूद्ध कर रही है।

यह कहा जा रहा है कि उदारीकरण देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की मुख्य वजह है। याराना पूंजीवाद सरकारी नीतियों को बड़े पैमाने प्रभावित कर रहा है।

म शायद भारत के भ्रष्टाचार के इतिहास से परिचित नहीं हैं। लाइसेंस राज में बहुत बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ। उदारीकरण को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार ठहराना तो एक बहुत बड़ा मजाक है। जो भी भारत के समझता है वह जानता है कि भ्रष्टाचार तब होता है जब कोई कुछ करना चाहता है और उसके रास्ते में कानून आड़े आता है। आप यदि चाहते हैं कि भ्रष्टाचार कम हो तो कम कानून बनाइए ,बीच में कम नौकरशाह हों क्योंकि  उन्हीं की वजह से भ्रष्टाचार शुरू होता है।

आपकी चीन के बारे में क्या राय है जिसने अधिनायकवादी पूंजीवाद का रास्ता अपनाया है।

मैंने भविष्यवाणी की थी जो भी देश जापान के निर्यात आधारित विकास का माडल अपनाएंगे वे उसी रास्ते पर चलते हुए डूबेंगे भी। जापान  ने पांचवे,छठे और सातवे दशक में निर्यात आधारित विकास की राह  पर चल कर महान सफलता पाई। लेकिन हमें ध्यान में रखना चाहिए कि जापान इसलिए सफल हुआ क्योंकि तब उसे किसी प्रतियोगिता का सामना नहीं करना पड़ा। चीन,रूस और भारत बंद अर्थव्यवस्ताएं थी।लैटिन अमेरिक,मध्य पूर्व और अफ्रिका की व्यवस्थाएं सक्रिय नहीं हो पाईं थी। कोई प्रतियोगिता न होने के कारण जापान सफल रहा है। हुआ यह कि आठवे दशक में हांगकांग,सिंगापुर,ताइवान,कोरिया,इंटोनेशिया और कई और देश जापान के प्रतियोगी बन गए। उसके बाद आठवे दशक के अंत में जापान के निर्यात आधारित माडल का बुलबुला फूट गया। लेकिन बाद में जापान ,हांगकांग और सिंगापुर को चुनौती देनेवाले देशों में आर्थिक ऊथल पुथल का दौर चलने लगा। तभी चीन आर्थिक शक्ति के तौर पर उभरा। नौवे दशक के अंत में चीन पूरी तरह से प्रतियोगी बन गया तो उसने दक्षिण एशियाई देशों के पैरों तले से जमीन खींच ली।जापान की तरह उनका भी पतन हुआ।ऐसा जल्दी ही चीन के साथ भी होगा क्योंकि चीन का निर्यात आधारित विकास माडल उसी तरह सफल नजर आ रहा जैसे कभी जापान सफल नजर आता था।

क्या लोकतांत्रिक भारत कभी चीन को टक्कर दे पाएगा।

हां, जब भारत पूंजीवादी बनने का फैसला करेगा।भारत ने अभी पूंजीवाद को नहीं अपनाया है।समाजवाद उसके डीएनए में है। भारतीय राजनीतिज्ञ और राजनीतिक पार्टियां समाजवाद के किसी न किसी ऱूप को अपनाया हुआ है। कई नेताओं को भले ही समाजवाद की बाकायदा शिक्षा न मिली हो लेकिन वे किसी न किसी तरह पापुलिज्म को अपनाए हुए हैं। वे समाजवाद की किसी न किसी सीख उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व और संपत्ति का पुनर्वितरण का अनुकरण कर रहे हैं। इसलिए जबतक भारत पूंजीवाद के रास्ते से दूर रहेगा तब तक वह चीन की तुलना में पिछड़ा ही रहेगा। मैं एक लेख पढ़ रहा था क्या भारत चीन के लोकतांत्रिक बनने से पहले पूंजीवादी बनेगा। जिस तरह चीन में लोकतांत्रिक बनने को लेकर विरोध है उसीतरह भारत में पूंजीवाद को लेकर गहरा प्रतिरोध है। बहुत से भारतीय बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ पूंजीवाद को उपनिवेशवाद के साथ जोडते हैं। इस गलतफहमी के कारण भारत में पूंजीवाद के प्रति अविश्वास है। यह सच्चाई नहीं है। पूंजीवाद  का मकसद मुक्त बाजार है तो उपनिवेशवाद का मकसद बाजार पर नियंत्रण करना है। स्वतंत्रता के बाद समाजवाद भारत के दुर्भाग्यकी  वजह होने के ढेरों प्रमाण होने के बावजूद भारत में आर्थिक उदारवाद को इसलिए गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि लोग उस पर विश्वास नहीं करते।चीन भारत की असफलता के लिए उसके लोकतंत्र को दोषी ठहरता है। जबकि मैं समाजवाद को दोषी मानता हूं।लोकतंत्र भारत के लिए कोई समस्या नहीं पैदा कर रहा है लेकिन समाजवाद कई समस्याओं की वजह है। यदि भारत समाजवाद से दूर हटे तो वह विश्व का सबसे धनी मुल्क होगा। बशर्त्ते भारत सरकार लोगों को इसके लिए मौका दे।