खर्च होना चाहिए कर का आधार: पार्थ

सरकारों द्वारा आयकर लगाने के पीछे तर्क से ज्यदा परंपरा का योगदान है। प्रोग्रेसिव टैक्स ढांचे (अधिक आय पर अधिक कर) के समर्थन का आशय आयकर की अनिवार्यता नहीं है। अर्थशास्त्र यह कहता है कि जो लोग अधिक कमाएंगे वे अधिक खर्च भी करेंगे। इसलिए अगर माल-असबाब और सेवाओं (जीएसटी) पर टैक्स लिया जा रहा है तो यह स्वाभाविक है कि अधिक खर्च करने वाले अधिक कर चुकाएंगे। यह अपने आप में प्रोग्रेसिव टैक्स है। इसका फायदा यह है कि आयकर की तरह इस कर से बचना संभव नहीं है, चोरी भी नहीं की जा सकती।
 
इसके विपरीत अधिक आय पर अधिक कर की दर का आशय अधिक वसूली कतई नहीं है। अगर आज उच्च आय वर्ग के लोगों पर 30 या 40 प्रतिशत आयकर है तो आयकर कानून ही इससे बचने के तमाम रास्ते भी उपलब्ध कराता है। वेतनभोगी के अलावा तो सभी लोग अपने खर्चों को भारी भरकम ब्यौरा पेशकर आयकर से छूट हासिल कर लेते हैं और हकीकत में काफी कम टैक्स देते हैं। जबकि अधिक टैक्स दर रखने से एक तरफ तो देश में व्यापार माहौल पर नकारात्मक असर पड़ता है तो दूसरी तरफ कर चोरी को बढ़ावा मिलता है और काले धन की अर्थव्यवस्था को बल मिलता है। 
 
काला धन इसीलिए है कि लोग कर के डर से अपनी असल आय नहीं बताते हैं। जिसकी आवक 20 करोड़ है वह सिर्फ 10 करोड़ ही दिखाता है और 10 करोड़ का कोई रिकॉर्ड नहीं पेश करता। इस तरह आयकर बचाने के चक्कर में काले धन का सर्जन शुरू हो जाता है। नकदी आय को नहीं दिखाने के लालच में ही काले धन का दुष्चक्र शुरू होता है। पर जब आय पर कर ही नहीं होगा तो आय की घोषणा की भी जरूरत ही नहीं होगी। यह सवाल भी नहीं होगा कि पैसा आया कहां से? इसलिए अगर आय पर कर खत्म कर देते हैं तो कालेधन की समस्या तो खत्म ही हो जाएगी! 
 
यह कहना भी उचित नहीं है कि प्रत्यक्ष कर (आयकर आदि) की बजाए अप्रत्यक्ष कर (बिक्री, एक्साइज आदि) पर अधिक निर्भरता से महंगाई बढ़ती है। यह सही है कि अप्रत्यक्ष करों की जद में गरीब अमीर सभी आते हैं पर समाज के वंचित तबके पर इसकी मार न पड़े इसके लिए कुछ ठोस उपाय किए जा सकते हैं। कई देशों में ऐसा है भी। अनप्रोसेस्ड आइटम्स जैसे सब्जियां, गेहूं आदि और अतिआवश्यक उपभोक्ता सामग्रियों तेल, नमक आदि को कर मुक्त श्रेणी में रख सकते हैं। जबकि प्रोसेस्ड आइटम जैसे ब्रेड, रेडीमेड आइटम्स, महंगे सामान, विलासित की वस्तुओं मसलन वाशिंग मशीन, सेलफोन आदि पर टैस्क अधिक रखा जा सकता है। 
 
 
- डॉ. पार्थ जे शाह