आय में निर्मम फासले

भारत 2020-25 तक विश्व की दूसरी महाआर्थिक शक्ति बनने का अनुपम स्वप्न संजोए हुए है। इस दिशा में आर्थिक मंदी, महंगाई और वैश्विक उतार-चढ़ाव के बावजूद इसकी यात्रा आगे बढ़ रही है। देश में करोड़पति, अरबपति और खरबपतियों की आबादी भी बढ़ रही है। 20 से 25 करोड़ के तथाकथित 'ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' के अस्तित्व में आने का दावा भी किया जा रहा है। अब भारत को अमीर राष्ट्रों के समूह (जी-8, जी-20 आदि) में शामिल होने का न्योता भी दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद के हम प्रबल दावेदार बन चुके हैं। दो दशकों से वैश्वीकरण, निजीकरण, उदारीकरण और विनिवेशीकरण का अश्वमेध अबाध गति से चल रहा है। ये सब उपलब्घियां स्वागत योग्य हैं।

इन उप्लब्धियो के समानान्तर एक यथार्थ और भी है। न्यूनतम वेतन तथा अधिकतम वेतन में 50 से लेकर 10 हजार गुना तक अंतर है। असंगठित क्षेत्र में प्राप्त न्यूनतम मासिक वेतन और संगठित (सरकारी व निजी) क्षेत्र के न्यूनतम व अधिकतम वेतनों के बीच मौजूद फासला अमानवीयतम तथा बर्बरतम स्तर तक पहुंच गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के अन्तर्गत न्यूनतम दैनिक मजदूरी 100 रूपए अर्थात 3000 रूपए मासिक है, इसके विपरीत सरकार के चतुर्थ श्रेणी का वेतन 15000 रूपए के आसपास है। भारत सरकार के केबिनेट सचिव का वेतन सवा-डेढ़ लाख के बीच है। संगठित क्षेत्र के अधिकरियो और कर्मचारियों को मिलने वाली दूसरी सुविधाओं (पेंशन, अवकाश, चिकित्सा सुविधा, महंगाई भत्ता आदि) का यहां उल्लेख व तुलना करना हास्यास्पद इसलिए होगा, क्योंकि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों व कर्मचारियों के लिए ये तमाम बातें दिवास्वप्न हैं। निजी क्षेत्र के सी.ई.ओ. की पगारों-सुविधाओं की चर्चा करना तो और भी मूर्खतापूर्ण होगा, क्योंकि ऎसे कई मुख्य प्रबंधक हैं, जिन्हें प्रतिमाह 50 लाख रूपए से एक करोड़ रूपए तक वेतन मिलता है। यहां आम श्रमिक और केबिनेट सचिव या मुकेश अंबानी की तुलना नहीं की जा रही है। इन तीनों की पृष्ठभूमियां और कार्यक्षेत्र अलग-अलग हैं। अत: जीवन शैलियों और आय में स्वाभाविक अंतर होगा ही।

लेकिन सवाल यह भी है कि ये तीनों ही भारतीय नागरिक हैं। यह 'नागरिकता' का फैक्टर तीनों को भारतीय राज्य से जोड़ता है। अत: इस नाते तीनों में अन्तर के सीमा निर्धारण का सवाल उठता है। विषमता कम होने की बजाय, क्यों बढ़ रही है? गरीबों और करोड़पतियों, दोनों की आबादी साथ-साथ बढ़ रही है। ऎसा क्यों है? दोनों में से किसी एक की आबादी घट क्यों नहीं रही है?

राज्य का एजेण्डा अब 'लाभ विकास वृद्धि' का है, न कि 'मजदूरी वृद्धि' का। यह सच भी है कि क्या आज कोई श्रमिक नागरिक 100 रूपए से लेकर 200 रूपए प्रतिदिन की मजदूरी पर सम्मानजनक ढंग से जी सकता है? संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि गरिमापूर्ण जीवन निर्वाह योग्य न्यूनतम वेतन होना चाहिए। इस जीवन निर्वाह में आधारभूत आवश्यकताएं (आवास, स्वास्थ, शिक्षा, स्वच्छ पेय जल और अन्न) शामिल हैं। क्या न्यूनतम वेतन में यह सब संभव है? निजी संस्थानों में तो दो-ढाई हजार की मासिक मजदूरी पर भी औरतें-पुरूष काम कर रहे हैं। काम के घंटे भी 10-11 से कम नहीं हैं। रविवार को भी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों और दिहाड़ी मजदूरों को ड्यूटी पर आना पड़ता है।

नरेगा के कारण असंगठित क्षेत्र में एक नई समस्या पैदा हो गई है। इस क्षेत्र के मालिक श्रमिकों का उपहास करते हुए कहते हैं कि तुम लोग नरेगा के 'दामाद' हो। सरकार से ही 100 रूपए की मजदूरी लो। आज असंगठित श्रमिक दो पाटों के बीच फंस गया है, एक तो सरकारी क्षेत्र में उसे नियमित काम नहीं मिल रहा और दूसरा- निजी क्षेत्र के नियोक्ता उसे 100 रूपए की दैनिक मजदूरी पर रखना नहीं चाहते हैं। इसीलिए अब गरिमापूर्ण जीवन निर्वाह के लिए 'युक्तिसंगत न्यूनतम वेतन' की मांग बहुत ज़रूरी है।

-रामशरण जोशी