बाजार आधारित व्यवस्था में लाभ पहले श्रमिक को और फिर मालिक को

अपनी युवावस्था के दिनों में मैंने निचले स्तर तक आर्थिक लाभ के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक ट्रिकल डाउन) के बारे में सुना था। इसके मुताबिक अगर अमीर और अधिक अमीर होंगे तो गरीबों को भी इसका लाभ मिलेगा और इस वजह से यह सबके लिए फायदेमंद रहेगा। ऐसा माना जा रहा था कि यह इस बात का भी खुलासा कर देगा, कार्ल मार्क्स के विपरीत, कि यह सच नहीं है कि अमीर और अमीर हो गए, जबकि गरीब और गरीब। इसके विपरीत हुआ यह कि दोनों ही साथ-साथ अमीर हुए। अमेरिका में गरीबी की रेखा 11 हजार डॉलर प्रति वर्ष (पांच लाख रुपए प्रति वर्ष) की चौंकाने वाली ऊंचाई तक पहुंच गई है। इतिहास देखा जाए तो गरीब कभी भी इतने ज्यादा अमीर न थे। फिर भी आर्थिक प्रगति का लाभ निचले सिरे तक पहुंचने की बात मुझे असंभव ही लगती थी।

युवावस्था के दिनों में तो मैं इसकी बेहूदगी पर हंसा करता था। मेरा कहना था कि आखिर इतिहास इस बात का गवाह है कि दौलत हमेशा से राजाओं, सामंतों, महंतों के एक समूह विशेष तक ही सीमित रही और इनका समूह छोटा ही रहा। वास्तव में सामंतशाही का मकसद ही निचले स्तर तक आर्थिक लाभ नहीं पहुंचने देना और अमीरों को अमीर ही बनाए रखना था। मुझे युवावस्था में बताई गई बातें बिल्कुल सही थी, लेकिन सामंतशाही के दौर के लिहाज से।

आधुनिक पूंजीवाद में बात अलग थी क्योंकि शासक ही सारी पूंजी पर कब्जा नहीं कर सकते थे। पूंजीवाद ने लोगों और कंपनियों को अपनी कमाई को अपने पास रखने का मौका दिया। राजा और अफसर अब उस सारी पूंजी पर कब्जा नहीं कर सकते थे। यही तो फ्रांस की क्रांति का मूल था। मुझे बताया गया कि आधुनिक काल में ऐसे आर्थिक नियम थे जिन्होंने निजी जायदाद और पैसे की रक्षा की और ऐसे हालातों के कारण पैसा अमीरों से गरीबों तक पहुंच गया।

मैं अब भी सहमत नहीं था। पूंजीवाद ने फ्रांस की क्रांति के बाद एक सदी से ज्यादा अरसे तक गरीबों के जीवनस्तर में लेशमात्र भी सुधार नहीं किया। कार्ल मार्क्स ने घोषणा की और उनके काल के कई लोगों ने इससे सहमति भी जताई कि अमीरों वर्ग के स्वार्थ गरीबों के बिल्कुल विपरीत हैं और अमीर हर स्तर पर ऐसा प्रयास करेंगे कि आर्थिक तरक्की का लाभ गरीबों तक न पहुंचने पाए। बिल्कुल सही है, मुझे ऐसा बताया गया था, लेकिन वह परोपकारी सरकार (वेल्फेयर स्टेट) बनने की बात है।

पिछली एक सदी में, कर्मचारियों को संगठन बनाने के अधिकार मिले, लोकतंत्र ने गरीबों को और अधिक अधिकार संपन्न बनाया, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के साथ, ‘केनेस मांग’ (केनेसियन डिमांड) के वक्त प्रबंधन नीतियां सबके लिए मददगार बन गईं। सबसे महत्वपूर्ण रहा पूरी दुनिया में शिक्षा का प्रसार। इसने गरीबों को नौकरी और पेशे के लायक बना दिया। आज मानव पूंजी को आर्थिक पूंजी जितना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए समृद्धि के युग में आर्थिक तरक्की का लाभ नीचे तक पहुंच गया। बेमन से ही सही मैंने इस शोध प्रबंध को स्वीकार लिया। मुझे अंदेशा लगा रहता था कि पैसा किसी भी मात्रा में नीचे तक नहीं पहुंच सकता। फिर भी मैं इस हकीकत को जानता था कि अमीर और गरीब दोनों ही साथ-साथ अमीर हो रहे हैं, भले ही उनके और अमीर होने की दर एक समान न हो। सो शायद परोपकारी सरकार के आधुनिक संस्थानों ने निचले तबके तक आर्थिक लाभ के सपने को हकीकत में बदल दिया था।

आज मैं दूसरे पहलू को भी जानता हूं। यह सच है कि विकास का लाभ अमीर और गरीब दोनों को मिला, लेकिन ऐसा अमीरों का पैसा गरीबों तक पहुंचने के कारण नहीं हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लाभ गैर-अमीरों से ऊपर अमीरों तक पहुंचा। यह बहुत अलग और आज की अर्थव्यवस्था के कामकाज का ज्यादा सटीक वर्णन है। एक बड़ी टेक्सटाइल मालिक की बात करूं। सिद्धांत तो यही कहता रहा है कि पहले टेक्सटाइल मालिक अपने धंधे से खूब कमाई करता है और फिर इस लाभ का कुछ हिस्सा उसके कर्मचारियों, कपास उत्पादकों और अन्य तक पहुंचता है। यह बिल्कुल सही नहीं है। नीचे से ऊपर तक लाभ का सिद्धांत (ट्रिकल अप थ्योरी) वास्तविकता का खुलासा कर सकता है। पहले कपास उत्पादक, फसल उगा कर श्रमिक को पैसा देता है और फिर अपनी फसल को लाभ में बेच देता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कृषि क्षेत्र में सबसे पहले पैसा श्रमिक को मिलता है और फिर उत्पादक को। इसके बाद कपास बीज अलग करने के लिए जिनिंग फैटरी में जाता है। इस प्रक्रिया से ट्रांसपोर्टर और जिनर की रोजी-रोटी चलती है। इसके बाद कपास मिल में पहुंचता है। वहां कर्मचारियों को कपास की प्रोसेसिंग के दौरान दाम और वेतन का भुगतान होता है, भले ही फिर मिल को लाभ न हो। जब कपड़ा तैयार हो जाता है, इसे एक तय कमीशन या लाभ पर एजेंटों या व्यापारियों के जरिये बेचा जाता है। इस मौके पर जब कपड़ा बेचा जाता है तो टेक्सटाइल मालिक को तब जाकर कोई लाभ होता है। इस वक्त लाभ निचले सिरे से ऊपर तक पहुंच जाता है।

इसलिए कृपया आर्थिक तरक्की का फायदा ऊपर से नीचे जाने के सिद्धांत को खारिज कर इसके नीचे से ऊपर जाने के सिद्धांत को स्वीकार लें। यह सच नहीं है कि पैसा ऊपर से नीचे पहुंचता है। इसके विपरीत टैक्सटाइल इंडस्ट्री से परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर जुड़ा हर व्यक्ति इंडस्ट्री के मालिक से पहले कमा लेता है। लाभ ऊपर से नीचे जाने के सिद्धांत के अनुसार मालिक का लाभ पर पहला हक होता है। इसके विपरीत, उनको तो हर एक के लाभ कमा लेने के बाद लाभ मिलता है। कई बार तो यह भी जरूरी नहीं कि पर्याप्त लाभ ऊपर तक पहुंचे और मालिक को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। बैलेंस शीट देखने वाले हर व्यक्ति को इस हकीकत का आभास होता है। बैलेंस शीट में कंपनी की कमाई का लेखा-जोखा होता है। उसके बाद इसमें खर्चों का उल्लेख होता है, जैसे सप्लायरों को भुगतान, कर्मचारियों, मैनेजरों, उधार देने वालों, सलाहकारों और अन्य ऐसे लोगों को किया गया भुगतान। उसके बाद ही कंपनी के लाभ का जिक्र होता है और कई बार घाटे का। लाभ को आमतौर पर कंपनी का आधार (बॉटमलाइन) कहा जाता है, क्योंकि यह सबसे अंत में होता है और पूरा ढांचा इसके ऊपर ही टिका होता है।

बिजनेस मैगजीन फॉर्च्यून यह खुलासा करती है कि दुनिया की शीर्ष 500 कंपनियों का लाभ कुल बिक्री का तीन फीसदी होता है। इसका मतलब है कि इन कारोबारों में 97 फीसदी पहले अन्य लोगों के खाते में जाता है और फिर तीन फीसदी लाभ ऊपर तक पहुंचता है। हकीकत की दुनिया में काम ऐसे ही चलता है। इसलिए आधुनिक अर्थव्यवस्था की कामयाबी के लिए लाभ के ऊपर से नीचे जाने के सिद्धांत को ही कारण बताने की भूल मत कीजिए। यह तो लाभ के नीचे से ऊपर जाने की वजह से है।

- स्वामीनाथन अय्यर (लेखक 'द इकोनॉमिक टाइम्स' के कंसल्टिंग एडिटर हैं)
टाइम्स ऑफ इंडिया में 30 जुलाई 2000 को प्रकाशित

स्वामीनाथन अय्यर

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