बजट 2021ः करदाताओं पर नए करों का बोझ न पड़ना इस वक्त की बड़ी उपलब्धि

- प्राइवेट पार्टनरशिप में सैनिक स्कूल स्थापित करने की योजना स्वागत योग्य कदम
- सरकारी कंपनियों व बैंकों के निजीकरण और तीन साल से पूर्व के आयकर के मामलों को न खोलने का फैसला भी क्रांतिकारी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक फ़रवरी को लोकसभा में देश का आम बजट प्रस्तुत किया। ऐसे समय में जबकि देश जबरदस्त आर्थिक मंदी का सामना कर रहा हो और कुछ माह पूर्व ही देश की जीडीपी ऐतिहासिक रूप से ऋणात्मक अंकों से गुजरी हो तो बजट से उम्मीदों का बढ़ जाना लाज़मी था। देश की जनता के साथ साथ विपक्षी दल और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों की उत्सुकता इस बात को लेकर थी कि सरकार किस प्रकार करदाताओं पर अतिरिक्त भार डाले बिना देश को आर्थिक प्रगति की राह पर ले जाती है। इसके साथ ही यह भी उम्मीद लगाई जा रही थी कि वित्तमंत्री की पोटली से उन लोगों के लिए भी कुछ न कुछ अवश्य निकलेगा जो कोविड महामारी के कारण बर्बाद हो गए या बर्बादी की कगार पर पहुंच गए। उपरोक्त उम्मीदों के हिसाब से यदि तटस्थ रूप से बजट की विवेचना करें तो यह बजट काफी संतुलित प्रतीत होता है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के लिए कुल 34,83,236 करोड़ रुपये के व्यय का बजट पेश किया है। यह चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान 34,50,305 करोड़ रुपये से थोड़ा ही अधिक है। इसमें पूंजी व्यय 5,54,236 करोड़ रुपये है, जो 2020-21 के संशोधित अनुमान 4,39,163 करोड़ रुपये से कहीं अधिक है। बजट दस्तावेज के मुताबिक, राजस्व खाते पर व्यय 29,29,000 करोड़ रुपये अनुमानित है जबकि 2020-21 के संशोधित अनुमान के अनुसार खर्च 30,111,42 करोड़ रुपये दिखाया गया है। यह जानना भी सुखद है कि कुछ विशेषज्ञों के द्वारा राजकोषिय घाटे की चिंता न करते हुए दिल खोल कर खर्च करने की जो मांग की गई थी उस पर सरकार ने अधिक ध्यान नहीं दिया। सरकार ने वर्ष 2022 में राजकोषीय घाटे का जीडीपी के 6.8 फीसदी रहने की उम्मीद जताई है जबकि वर्तमान वित्त वर्ष में इसके 9.5 फीसदी रहने का अनुमान है। यह जानना भी सुखद है कि सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए संकल्पित है।

यदि वेतनभोगी वर्ग की बात करें तो इस वर्ष उन्हें कोई सौगात भले ही नहीं मिली लेकिन उनपर अतिरिक्त कर न लगना ही अपने आप में बड़ी बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि कोविड संक्रमण के दुष्परिणामों से उबरने के बाद लोक कल्याणकारी मदों में हुए खर्चों की पूर्ति के लिए उम्मीद की जा रही थी कि किसी न किसी रूप में नए कर लगाए जाएंगे और राजकोष को भरने की कोशिश की जाएगी।

सरकारी कंपनियों और बैंकों के निजीकरण की घोषणा कर सरकार ने उस पुराने लेकिर महत्वपूर्ण दर्शन को आत्मसात किया है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं होता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही प्रधानमंत्री मोदी ने भी कई मौकों पर इस बात को स्वीकार किया है कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है बल्कि ऐसे माहौल का निर्माण करना है जिससे लोग भयमुक्त होकर व्यापार कर सकें। निजीकरण की घोषणा से यह भी स्पष्ट है कि सरकार अब करदाताओं के पैसों को उत्पादक क्षेत्रों में निवेश करना चाहती है न कि घाटे में चल रही कंपनियों को बेल आउट देने के लिए। सरकार के इस कदम से ये साफ संदेश है कि भले ही उसपर सरकारी संपत्तियों को बेच देने जैसा आरोप विपक्ष लगाता रहे लेकिन दीर्घकाल के लिए जो देश हित में है वैसे कड़े फैसले लिए जाते रहेंगे।

केंद्रीय बजट के हिसाब से दो छोटी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं जिनके भविष्य में दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे। ये फैसले हैं, निजी भागीदारी के साथ 100 सैनिक स्कूलों की स्थापना करना और आयकर में अनियमितता के तीन साल से अधिक पुराने मामलों को न खोलने देने की घोषणा। जहां तक सैनिक स्कूलों को स्थापित करने की बात है तो यह देखने वाली बात होगी कि सरकार निजी सेक्टर को इसमें किस प्रकार शामिल करना चाहती है। आदर्श तरीका यह होता है कि स्कूल की संरचना आदि में खर्च सरकार करे बाकी प्रबंधन का कार्य निजी क्षेत्र के एक्सपर्ट्स करें। इसका फायदा ये होगा कि गरीब व जरूरतमंद छात्रों के कंधे पर भारी भरकम फीस का बोझ भी नहीं पड़ेगा और उन्हें निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान की जाने वाली गुणवत्ता भी मिल सकेगी। 

आयकर से जुड़े तीन साल से पुराने मामले अब विशेष परिस्थितियों में विशेष अनुमति के साथ ही खोले जा सकेंगे। सरकार के इस फैसले से एक ओर जहां जनता को राहत मिलेगी वहीं आयकर अधिकारियों के द्वारा किये जाने वाले शोषण और मनमानी पर भी रोक लगने की संभावना है। यह फैसला इस बात का भी द्योतक है कि सरकार अब पुराने मामलों को लंबे समय तक लटका कर रखना नहीं चाहती है। यह आयकर विभाग और अधिकारियों को भी साफ साफ संदेश है कि यदि कहीं कोई गड़बड़ी है तो उसे जल्द से जल्द चिन्हित करें और कार्रवाई करें।

- अविनाश चंद्र (संपादक)