गरीबी पर मध्यवर्ग का ढोंग

गरीबी रेखा के हालिया विवाद से दो चीजें साबित होती हैं। पहली, संख्याओं को अलग-अलग तरीके से रखकर आंकड़ों का भ्रम पैदा किया जा सकता है। दूसरी, भारतीय मध्यवर्ग में दोहरे चरित्र और गरीबी को झुठलाने की बीमारी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर योजना आयोग के हलफनामे के बाद मीडिया में भूचाल आ गया। ये कोई नए आंकड़े नहीं थे, बल्कि विश्लेषक इनसे पहले से परिचित थे। इसमें शहरों में रोजाना 32 रुपये कमाने वाले को गरीबी रेखा के ऊपर माना गया। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह आंकड़ा 26 रुपये रखा गया है। मीडिया और मध्यवर्ग चीख-चीखकर यह सवाल पूछने लगे कि कैसे कोई इतने कम पैसों में गुजारा कर सकता है। कई रिपोर्टों का हवाला दिया गया, जिनके मुताबिक पटरी पर रेहड़ी लगाने वाले भी रोजाना बस किराए में ही 32 रुपये खर्च कर देते हैं।

इसके दबाव में योजना आयोग बचाव की मुद्रा में आ गया। आयोग के ही एक सदस्य ने कहा कि गरीबी एक तुलनात्मक विचार है और वह निजी तौर पर मानते हैं कि 15 हजार रुपये प्रति माह तक कमाने वाला गरीबी रेखा के नीचे है। बाद में आयोग ने सफाई दी कि इस 32 रुपये प्रतिदिन की आय को सब्सिडी वाले खाद्यान्न प्राप्त करने के लिए न्यूनतम स्तर नहीं माना जाएगा। अलबत्ता, इसका फैसला अन्य कसौटियों को ध्यान में रखकर किया जाएगा, ताकि और अधिक लोग ऐसी योजनाओं का लाभ उठा सकें।

अब जरा तथ्यों पर गौर करें। तेंदुलकर समिति की सिफारिशों पर आधारित मौजूदा गरीबी रेखा वास्तव में पुरानी के मुकाबले काफी ऊपर तय की गई है। इस नई रेखा ने गरीबों की संख्या को घटाने का खेल नहीं किया, बल्कि वर्ष 2004-05 में इनकी तादाद को बढ़ाकर 27.5 से 37.2 प्रतिशत तक कर दिया। इसके चलते 10 करोड़ नए गरीब जुड़ गए। बत्तीस रुपये वाली मौजूदा गरीबी रेखा से भले ही काफी लोग भड़के हुए हों, लेकिन पुरानी रेखा तो महज 24 रुपये रोजाना थी। इसके बावजूद बीते दशकों में इसे लेकर मध्यवर्ग के बीच बहुत कम नाराजगी दिखी। तमाम लोग गरीबी की इस गणित से अनजान थे।

अगर 24 रुपये रोजाना का खर्च बीते कई दशकों से गरीबी का मानक बना हुआ था तो क्यूं आज 32 रुपये प्रतिदिन का उपभोग लोगों को अखर रहा है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि हम रोजाना खर्च की नजर से इन आंकड़ों को नहीं देख रहे हैं। देश में औसत परिवार 5 सदस्यों वाला माना गया है। गरीब परिवारों में अधिक बच्चे होने के कारण यह संख्या औसतन 6 सदस्यों की होती है। अगर छह लोग रोजाना 32 रुपये के हिसाब से उपभोग पर खर्च करते हैं तो यह करीब 6,000 रुपये महीना बैठता है।

मैंने देखा कि अधिकतर लोग अचंभित हैं कि 32 रुपये रोजाना प्रति व्यक्ति खर्च (जो काफी कम लगता है) कैसे छह हजार रुपये के आंकड़े में तब्दील हो जाता है। फिर वे अपना शुरुआती गुस्सा भूलकर यह सोचने लगते हैं कि गरीबी की यह नई कसौटी (6,000 रुपये प्रतिमाह) काफी उचित है। हालांकि, इन आंकड़ों के भ्रम में अभी भी बहुत कुछ है। विदेशियों को तो ये छह हजार रुपये भी बेहद कम लगते हैं, लेकिन हमारे मध्यवर्ग को क्यों नहीं? जवाब है कि वे अपने घरेलू नौकरों को 4 से 5 हजार भी बमुश्किल देते हैं और अगर नौकर ने इससे ज्यादा मांगे तो झिकझिक करते हैं। तब वे इस बात को भूल जाते हैं कि उस नौकर के परिवार का प्रति व्यक्ति खर्च कितना बनता है। उनका हमेशा यही कहना होता है कि नौकर ज्यादा पैसे मांग रहे हैं, भले ही यह योजना आयोग के द्वारा तय उस स्तर से भी कम हो, जिसके लिए वे इतनी हायतौबा मचा रहे हैं।

यह दोहरी मानसिकता नौकरों तक ही सीमित नहीं है। जब यही वर्ग दिल्ली हाट साड़ी खरीदने जाता है तो बुनकर से कम से कम पैसे में सौदा समेटने की फिराक में रहता है। अगर उन्हें बताया जाए कि यह बुनकर महीने के सिर्फ 4,000 रुपये कमाता है तो क्या वे अपना रवैया बदल देंगे या क्या वे इस बात के लिए राजी होंगे कि वे ही बुनकर को गरीब बनाए रखने में मददगार हैं? निश्चित रूप से नहीं।

दरअसल, दोहरे मानदंड रखना मध्यवर्ग का ही स्वभाव नहीं है, बल्कि यह तो हर मानव में मौजूद है। मध्यवर्ग का गरीबी के लिए सरकार को दोषी ठहराना सही है। गरीबों के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले राजनेताओं की ओर से गरीबी उन्मूलन के लिए खरबों रुपये आवंटित किए जाते हैं, लेकिन इसमें से अधिकतर रकम बर्बाद या गायब कर दी जाती है। मध्यवर्ग गरीबी हटाने का सशक्त समर्थक रहा है, लेकिन उसे अपने लिए भी भारी सब्सिडी चाहिए। सस्ती रसोई गैस और केरोसीन इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।

तो क्या यह मान लिया जाए कि बीते दो दशकों से भारत का विकास महज आंकड़ों का मायाजाल है? बिल्कुल नहीं। गरीबी का अनुपात स्वतंत्रतता और 1977-78 के बीच नहीं बदला। यह और बात है कि इस दौरान जनसंख्या दोगुनी हो गई। यानी गरीबों की कुल संख्या भी समाजवाद के उन सुनहले दिनों में दोगुनी हो गई (तमाम युवा समाजवादी इससे इत्तेफाक नहीं रखते)।

सौभाग्यवश, 80 के दशक से शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण, जिसने 90 के दशक में तेजी पकड़ ली, उसके कारण आर्थिक विकास की रफ्तार तेज हुई और इससे गरीबी में कमी आनी शुरू हुई।

मुमकिन है कि भारत 1990 और 2015 के बीच गरीबों की संख्या घटाकर आधे पर लाने के संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास लक्ष्य से आगे निकल जाए। इसके बावजूद भारत लंबे समय तक गरीब देश बना रहेगा। आंकड़ों को भूल जाइए और कंस्ट्रक्शन साइटों के आसपास बने गरीबों के झोपड़ों को देख लीजिए। मुश्कलों के बाद भी वे इसलिए यहां रहते हैं, क्योंकि गांवों की स्थिति और भी बदतर है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाकर मध्यवर्ग ने प्रशंसनीय काम किया है, जिसके सभी वर्ग शिकार हैं। हालांकि, उसका गुस्सा मुख्य रूप से बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ है। वहीं, गरीब निचले स्तर के भ्रष्टाचार और सरकार की लचर सेवाओं से परेशान है। मध्यवर्ग ने सरकारी स्कूलों और उसकी तमाम सेवाओं का इस्तेमाल करना छोड़ दिया है। इसलिए ये विषय न तो मध्यवर्ग को छूते हैं और न ही रेटिंग के पीछे भागने वाले खबरिया चैनलों को। हमें लचर, भ्रष्ट सरकारी सेवाओं के खिलाफ अधिक आक्रोश की जरूरत है।

- स्वामीनाथन अय्यर
साभार: स्वामीनॉमिक्स.ऑर्ग

स्वामीनाथन अय्यर