शिक्षा प्रणाली को ठीक करने के तरीके..

हर कोई जानता है कि भारत में शिक्षा प्रणाली कितनी खराब है – लेकिन कितना अजीब है कि, जब चुनाव होते हैं तो यह एक बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में राज्य की विफलता माता-पिता के वोट देने के तरीके को बदलती नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में गड़बड़ी की स्थिति का सामान्यीकरण हो गया है - जो उदासीनता को स्पष्ट करती है। लेकिन हमारे देश का भविष्य हमारे बच्चों को मिलने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। हमें इसे ठीक करने की जरूरत है।

भारत में इंजीनियरिंग स्नातकों की बढ़ती संख्या पर टिप्पणी करते हुए, किसी ने एक बार कहा था कि अगर लोगों के किसी भी एक समूह में एक पत्थर फेंका जाए, तो पत्थर के किसी इंजीनियर को लगने की संभावना ज्यादा होगी। भारत की शिक्षा प्रणाली के बारे में भी इसी तरह का बयान दिया जा सकता है। भारतीय शिक्षा प्रणाली के किसी भी घटक की बात कर लें; यानि बात चाहे शिक्षकों की नियुक्ति की हो या छात्रों के दाखिले की, निशुल्क शिक्षा प्रदान करने के लिए सरकारी सहायता के वितरण कार्य की हो या स्कूलों के निर्माण की या किसी अन्य घटक के बारे में, आपको हर जगह भ्रष्टाचार, अक्षमता और जवाबदेही की कमी मिलेगी।

सारी समस्या की जड़ शिक्षा प्रणाली के स्वरूप का त्रुटिपूर्ण होना है। जब तक मूल स्वरूप को नहीं बदला जाता है, तब तक सिस्टम नहीं बदलेगा। ऊपर से दिखने वाली समस्याओं से निबटने के प्रयास से केवल अस्थायी बचाव किया जा सकता है। दरअसल, हमें ऐसा तरीका ढूंढना चाहिए जो भ्रष्टाचार, अकुशलता, जवाबदेही में कमी जैसी समस्याओं का समाधान करता हो। और ऐसा अभिभावकों को सशक्त बनाकर, जवाबदेही सुनिश्चित करके और स्वायत्ता के साथ प्रथम पंक्ति के योद्धाओं यानि कि अध्यापकों पर भरोसा जता कर ही किया जा सकता है। सैद्धांतिक रूप से सुनने में तो यह अच्छा लगता है लेकिन इसके लिए अलग से क्या करने की जरूरत है? कुछ सुझाव निम्नलिखित हैः

एक: आरटीई निरस्त हो

बहुचर्चित शिक्षा का अधिकार कानून वास्तव में शिक्षा प्रणाली के लिए विषाक्त ही साबित हुआ है। जब बात निष्पादन की आती है तब यह अव्यावहारिक साबित होता है क्योंकि इसका स्वरूप ही त्रुटिपूर्ण है, और इसके दुष्परिणाम छात्रों के सीखने के स्तर में कमी और स्कूलों के बंद होने के रूप में देखने को मिले हैं। यह अधिनियम इतना त्रुटिपूर्ण है कि संशोधन भी इसे बेहतर नहीं बना सकते हैं। किसी भी सरकार के लिए सबसे आसान काम है एक्ट को खत्म करना। यह हमारी बीमार शिक्षा प्रणाली को तत्काल राहत देगा। बंद होने के कगार पर आये स्कूल वापस आ सकते हैं और निजी स्कूलों की बढ़ती फीस से परेशान अभिभावक राहत की सांस लेंगे।

दो: लाभ अर्जित करने वाले स्कूलों को मिले मान्यता

हमारी शिक्षा प्रणाली की मूलभूत समस्याओं में से एक, जो कि गहरा प्रभाव डालता है; वह शिक्षा का गैर लाभकारी गतिविधि होना है। निसंदेह, शिक्षा महज व्यापारिक गतिविधि नहीं हो सकती- लेकिन यह व्यापार से किसी भी मायने में कम नहीं है। लाभ कमाने का उद्देश्य लोगों के लिए दूसरों की समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए शक्तिशाली प्रोत्साहन है। सरकार स्वयं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में असमर्थ है- और यह दूसरों को भी ऐसा करने से रोकती है।

तीन: शिक्षा में डीबीटी लागू हो

राजीव गांधी, जब भारत के प्रधान मंत्री थे, तब दिया गया उनका एक बयान काफी चर्चित हुआ था कि सरकार द्वारा खर्च किए गए प्रत्येक रुपये में से केवल 15 पैसे ही इच्छित लाभार्थी तक पहुंचते हैं। दिल्ली के स्कूलों में प्रति छात्र खर्च (नगरपालिका और राज्य सरकार दोनों के स्वामित्व में) लगभग 50,000/- रुपये हैं। हालांकि, लाभ उस अंतिम बच्चे तक नहीं पहुंचता है, जिसके नाम पर सरकार ने शिक्षा उपलब्ध कराने की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली है, और इसके तहत पूरे क्षेत्र को नियंत्रित कर रखा है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर मॉडल को कई कल्याणकारी योजनाओं में अपनाया गया है, और इससे सरकार द्वारा खर्च करने के तौर तरीकों में दक्षता आई है। अच्छी खबर यह है कि इस विचार को अनुच्छेद 12-ए के रूप में संवैधानिक समर्थन उपलब्ध है, जिसे 2002 में संविधान के 86 वें संशोधन के बाद जोड़ा गया था। यदि इसे लागू किया जाता है, तो यह लाखों गरीब माता-पिता को अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए सशक्त करेगा।

चारः भूमिकाओं का बंटवारा

स्कूलों के मानदंडों और मानक का विनियमन; स्कूल के निर्माण और संचालन के लिए वित्तपोषण; शैक्षणिक प्रावधानों के कार्यान्वयन और मूल्यांकन: सभी तीनों भूमिकाएं एक ही निकाय के तहत, विभिन्न प्रकार के स्कूलों के लिए राज्य और केंद्र स्तर पर शिक्षा मंत्रालय द्वारा की जाती हैं। यह व्यवस्था ‘हितों के टकराव न होने’ के सिद्धांत के खिलाफ जाती है और सरकार के लिए इस प्रणाली में हेरफेर करने को आसान बनाती है। इन तीन अलग-अलग भूमिकाओं के लिए, तीन अलग-अलग और स्वतंत्र निकाय होने चाहिए। कार्यों के एक दूसरे पर निर्भर होने की प्रकृति के कारण उन्हें एक दूसरे के साथ तारतम्य बनाकर काम करना होगा, फिर भी निकायों की स्वतंत्र प्रकृति एक दूसरे को नियमित करने का कार्य करेगी और उन्हें पारदर्शी और जवाबदेह बनाए रखेगी।
 

पांचः नियमन का सीखने के परिणामों पर आधारित होना

स्कूल विनियमन के मानदंड वर्तमान में स्कूल के बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की योग्यता जैसे इनपुट पर आधारित हैं। एक स्कूल तब तक कार्य करना जारी रख सकता है जब तक कि वह इनपुट मानदंडों का अनुपालन करता है भले ही वह परिणाम चाहें किसी भी प्रकार का दे रहा हो। इसको उलटने की जरूरत है। स्कूल द्वारा परिणाम देने के बारे में हमें चिंतित होना चाहिए। एक स्कूल को तब तक कार्य करना जारी रखना चाहिए जब तक वह अच्छे परिणाम देता है, और यदि ऐसा करने में विफल रहता है तो उसे कार्य करना बंद कर देना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि विद्यालय के नियमन के मानदंडों को सीखने के परिणाम में बदल दिया जाए।

छः स्कूलों की स्वायत्ता

देश की शिक्षा प्रणाली राज्य और केंद्र के स्तर पर बहुत अधिक केंद्रीकृत है क्योंकि इसे आदेश और नियंत्रण के सिद्धांतों पर डिज़ाइन किया गया है। इसके परिणामस्वरूप बच्चों को क्या पढ़ाया जाता है और बच्चों को आज की दुनिया में बने रहने के लिए क्या सीखने की जरूरत है, इसमें एक असंतुलन पैदा हो गया है। छात्र, पढ़ाए जा रहे पाठों के वास्तविक जीवन में अनुप्रयोग को समझने में असफल हो रहे हैं और रट्टा मारने वाली शिक्षा को अपना रहे हैं। लाभार्थी के निकट रहने वाले व्यक्ति और संस्थान लाभार्थी को समझने की सबसे अच्छी स्थिति में होते हैं, और उसी के अनुसार अपनी सेवा में परिवर्तन करते हैं। इसलिए, स्कूलों को उस तरह से कार्य करने के लिए स्वायत्तता देने की आवश्यकता है, जो उसके शिक्षक अपने छात्रों के लिए सबसे अच्छा सोचते हैं।

सात: तीसरे पक्ष के द्वारा मूल्यांकन

सरकारी और निजी, दोनों प्रकार के स्कूलों के प्रदर्शन का मूल्यांकन सरकार द्वारा किया जाता है। अब, सरकार स्वयं एक सेवा प्रदाता होने के साथ-साथ उसी सेवा के एक निजी प्रदाता का भी मूल्यांकन करती है जो हितों के टकराव का एक और उदाहरण है। एक ही मानक के आधार पर सभी सेवा प्रदाताओं का स्वतंत्र मूल्यांकन करने के लिए एक बाहरी विशेषज्ञ एजेंसी स्थापित की जानी चाहिए।

आठ: शिक्षा से संबंधित आंकड़ें सार्वजनिक किए जाए

वर्तमान में स्कूली शिक्षा से संबंधित आधिकारिक डाटा प्राप्त करने का एकमात्र स्त्रोत ‘शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली’ (UDISE) है। फिर भी इसमें विश्वसनीयता की कमी है, और एक वर्ष के बाद ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाती है। विश्वसनीय और वास्तविक समय डेटा का अभाव पारदर्शिता से समझौता करता है, जवाबदेही को कम करता है और प्रणाली में हेरफेर करने की गुंजाइश देता है। नीति निर्माताओं के लिए यह भी संभव नहीं है कि वे अपनी नीतिगत हस्तक्षेपों की प्रतिक्रिया देखें और उसके अनुसार समय पर निर्णय लें। आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ, स्कूल में होने वाली हरेक गतिविधि से संबंधित वास्तविक समय डेटा एकत्रित करने के लिए एक प्रणाली बनाने की आवश्यकता है। यह संभव है और रेलवे जैसे अन्य क्षेत्रों में उपयोग किया भी जा रहा है। विशेषज्ञों द्वारा स्वतंत्र व्याख्या के लिए सार्वजनिक डोमेन में ऐसे डेटा उपलब्ध कराने से पारदर्शिता आएगी, जवाबदेही तय होगी और समय पर कार्रवाई के साथ पीढ़ियों को बचाया जा सकेगा।

- डॉ. अमित चंद्र (लेखक थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के फेलो हैं)