खाली-पीली ईमानदारी

महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों का केवल व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार होना पर्याप्त नहीं, यह एक बार फिर साबित हो रहा है रक्षामंत्री एके एंटनी की नाकामी से। वह चौतरफा नाकामियों से घिरे हैं। खराब बात यह है कि वह न तो रक्षा सामग्री की खरीद में घपले-घोटाले रोक पा रहे हैं और न ही सेनाओं के आधुनिकीकरण को गति दे पा रहे हैं। इससे भी खराब बात यह है कि उनके कार्यकाल में भारतीय सेनाएं दिन-प्रतिदिन दुर्बलता की ओर बढ़ती दिख रही हैं। न तो थल सेना की जरूरतें पूरी हो पा रही हैं, न वायु सेना की और न ही नौसेना की। जब उन पर सवाल उठते हैं तो उनके समर्थक-शुभचिंतक उनकी ईमानदारी का उल्लेख करके देश को चुप कराने की कोशिश करते हैं। इसमें दोराय नहीं कि वह नेताओं की उस श्रेणी में आते हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते। वह किसी भी तरह के घपले-घोटाले और पक्षपात के आरोपों से बचे हुए हैं, लेकिन बतौर रक्षामंत्री उनका कार्यकाल बेहद निराशाजनक है। उनकी ईमानदारी का देश को कोई लाभ नहीं मिला-ठीक वैसे ही जैसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदारी से देश का कोई भला नहीं हुआ। अब तो स्थिति यह है कि जब प्रधानमंत्री की ईमानदारी का बखान किया जाता है तो लोग हंसते हैं। उनकी नाक के नीचे घपले-घोटालों का अंबार लगता रहा। मनमोहन सिंह उन घपलों-घोटालों को भी नहीं रोक सके, जिन्हें लेकर विपक्ष और मीडिया ने उन्हें आगाह किया था। उन्होंने चेतने और गड़बड़ी रोकने के बजाय उन्हीं लोगों को क्लीनचिट देने अथवा उनका बचाव करने की कोशिश की जिन पर तरह-तरह के आरोप लग रहे थे। इस संदर्भ में जो दो नाम बार-बार याद आते हैं उनमें एक हैं ए. राजा और दूसरे अश्विनी कुमार। उन्होंने इन दोनों को साफ-सुथरा बताने और उनका बचाव करने की हर संभव कोशिश की।

पिछले कुछ समय से कांग्रेसजन यह प्रचारित करने की कोशिश कर रहे हैं कि देखिए, हमने हर उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जिस पर गंभीर आरोप लगे। यह निरा झूठ है। इस झूठ का सहारा इसलिए लिया जा रहा है ताकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भ्रष्टाचार विरोधी नेता के तौर पर चित्रित किया जा सके। पता नहीं कांग्रेस को इसमें कितनी सफलता मिलेगी, क्योंकि सबको यह अच्छी तरह याद है कि राहुल ने कलमाड़ी, राजा, पवन बंसल, अश्विनी कुमार के मामलों में किस तरह मौन साधे रखा? वह देश को उद्वेलित करने वाले मुद्दों पर मुश्किल से ही कुछ बोले। मौन रहने को लेकर कुख्यात हो चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुछ उन मामलों में भी चुप्पी का सहारा लिया जो सीधे तौर पर उनसे जुड़े थे। बतौर उदाहरण उन्होंने इस बारे में आज तक कुछ नहीं बोला कि उनके संयुक्त सचिव ने कोयला घोटाले पर सीबीआइ की प्रारंभिक रपट में छेड़छाड़ क्यों और किसके इशारे पर की? उन्होंने इस अधिकारी को हटाया भी नहीं।

स्पष्ट है कि ऐसी ईमानदारी व्यर्थ है जो खुद उस व्यक्ति की छवि को न बचा सके जो ईमानदार होने का दावा कर रहा है। नि:संदेह कोई यह नहीं कह सकता कि मनमोहन सिंह ने एक पैसे का भी अनुचित लाभ उठाया है, लेकिन इसमें संदेह है कि उन्होंने अपने आसपास के लोगों को अनुचित लाभ उठाने से रोकने की कोशिश ईमानदारी से की। कुछ ऐसी ही कहानी एके एंटनी की भी लगती है। उनके खाते में यह श्रेय तो जाएगा कि वह सबसे लंबे समय तक रक्षामंत्री रहे, लेकिन यह लंबा समय सैन्य तंत्र के लिए किसी बड़ी उपलब्धि का गवाह नहीं बना। अगर किसी राजनेता में हालात सुधारने का जज्बा न हो और उसके इरादे उसके आचरण से मेल न खाते हों तो फिर उसके ईमानदार होने का कोई विशेष मूल्य नहीं। यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीय राजनीति में केवल मनमोहन सिंह और एके एंटनी ही ऐसे राजनेता हैं जिन्हें ईमानदार कहा जा सकता हो, लेकिन यह भी सच है कि ऐसे लोग दुर्लभ हैं जो भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ पूरी प्रतिबद्धता और ईमानदारी से लड़ते नजर आ रहे हों। कुछ समय पहले तक आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ऐसे दुर्लभ लोगों में ही नजर आ रहे थे, लेकिन जबसे उन्होंने दिल्ली की सत्ता छोड़ी है तबसे उनके इरादों को लेकर संदेह पैदा हो गया है। जो अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार से लड़ने के मामले में दूसरे नेताओं की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं वे खुद अपनी नीयत को लेकर सवालों से घिरते जा रहे हैं। पिछले कुछ समय से न जाने क्यों रह-रहकर ऐसा लग रहा है कि उनका इरादा भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ना नहीं, बल्कि जैसे-तैसे केंद्र की सत्ता को हासिल करना है। महज 49 दिन में दिल्ली की सत्ता छोड़ने के लिए उन्होंने जो तमाम कारण गिनाए वे विश्वसनीय नहीं जान पड़ते। अगर उनके तमाम समर्थकों समेत अन्य अनेक लोग यह महसूस कर रहे हैं कि उनका इरादा जनलोकपाल विधेयक पारित कराना नहीं, बल्कि उसकी आड़ में दिल्ली की सत्ता छोड़कर आम चुनाव मैदान में कूदना था तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। अभी चंद दिन पहले केजरीवाल गुजरात के कथित थोथे विकास को लेकर अपने 16 सवालों का जवाब मांगने के लिए नरेंद्र मोदी के आवास पर एक तरह से जबरन घुसे जा रहे थे और वह भी पहले से कोई इजाजत लिए बगैर। उनकी नीयत खुद को मीडिया में प्रचारित करना था, न कि मोदी से मिलना। इसकी पुष्टि तब और अच्छे से हो गई जब वह कुछ ही घंटे बाद एक विशेष विमान के जरिये दिल्ली में प्रकट हुए। उन्हें विशेष विमान का सहारा इसलिए लेना पड़ा, क्योंकि दिल्ली में एक मीडिया समूह के कार्यक्रम में उनका भाषण तय था। यह देखना दयनीय है कि यही केजरीवाल दूसरों की नीयत पर सवाल उठाते हैं।

 

- राजीव सचान (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

साभारः दैनिक जागरण