होम स्कूलिंग को कानूनी जंजीरों से मुक्त करने की जरूरत

सहल कौशिक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी ज्वाइंट एंटरेंस एग्जामिनेशन (आईआईटी जेईईई) की बेहद प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के छात्र हैं। वर्ष 2010 में उन्होंने महज 14 साल की छोटी सी उम्र में देशभर में 33वाँ और दिल्ली में पहला रैंक हासिल किया था। सहल ने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीँ की थी। उन्होंने घर में ही पढ़ाई की थी। पिछ्ले कुछ वर्षोँ में बहुत सारे पैरेंट्स ने होम स्कूलिंग के विकल्प को अपनाया है, क्योंकि परंपरागत स्कूलों की कई खामियों के कारण वे अपने बच्चोँ को वहां नहीं भेजना चाहते थे। उन्हेँ स्कूलोँ द्वारा बच्चोँ की समस्याओँ को सुलझाने के बजाए उन्हेँ रट्टा लगाने पर जोर देकर पढ़ाने का तरीका, और बच्चोँ की अनुरूपता के लिए उनकी रचनात्मकता को पीछे छोड़ने का तरीका सही नहीँ लगता है।

आरटीई एक्ट के कारण होमस्कूलिंग की राह में आने वाली बाधाएं

निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम (आरटीई एक्ट) 2009 स्कूल के अलावा किसी भी ऐसी जगह बच्चे के शिक्षा के अधिकार को मान्यता नहीँ देता है जिसे अधिनियम के तहत मान्यता न मिली हो। अधिनियम के अनुसार, बच्चे को प्रारम्भिक शिक्षा किसी मान्यता प्राप्त स्कूल द्वारा दिया जाना अनिवार्य है। मतलब आज की शिक्षा व्यवस्था में होम स्कूलिंग के लिए कोई जगह नहीं है। इतनी ही महत्वपूर्ण एक और बात यह है कि स्कूल के सम्बंध में अधिनियम की जो परिभाषा है, वह कुछ विशेष प्रकार के स्कूलोँ; के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गयी है। ये स्कूल गरीबों के स्कूल हैं जिन्हें बजट प्राइवेट स्कूलों के नाम से जाना जाता है। ये स्कूल ऐसे इलाकोँ में चलते हैं जहाँ प्ले ग्राउंड बनाने के लिए जमीन नहीं है और ये बेहद कम फीस लेते हैं। ऐसे में ये स्कूल सरकार द्वारा तय किए गए वेतनमान के अनुसार शिक्षकों को सैलरी नहीं दे पाते हैं।

आरटीई अधिनियम के ऐसे प्रतिबंधात्मक नियमोँ के मद्देनजर यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओपेन स्कूलिंग (एनआईओएस) का प्राथमिक शिक्षा के लिए चलाया जा रहा ओपेन बेसिक एजुकेशन (ओबीई) प्रभाव में रहना चाहिए अथवा नहीं। प्राथमिक और सेकंडरी स्कूलिंग के लिए ओबीई शिक्षा और एनआईओएस एग्जामिनेशन को भारत सरकार से औपचारिक स्कूलिंग के समकक्ष मान्यता प्राप्त है। यहाँ से शिक्षा लेने वाले छात्र भी उच्च शिक्षा और रोजगार के समान अवसर के लिए योग्य माने जाते हैं। एनआईओएस सर्टिफिकेट उन बच्चोँ के लिए आगे की शिक्षा का वैकल्पिक रास्ता बनता है जो घर में रहकर पढ़ते हैं अथवा गैर मान्यता प्राप्त स्कूलोँ से शिक्षा लेते हैं, या ग्रामीण इलाकोँ में वॉलंटियर्स अथवा पैरा‌ टीचर्स से शिक्षा लेकर उच्च स्तर की औपचारिक शिक्षा हासिल करना चाहते हैं। हालांकि, आरटीई एक्ट द्वारा प्राथमिक शिक्षा हेतु बाधक नियमों के मद्देनजर एनआईओएस ने 2011 में यह घोषणा कर दी कि आरटीई एक्ट के प्रावधानों के परिपेक्ष्य में 2013 के बाद 6 से 14 साल की उम्र वाले बच्चोँ को ओबीई कार्यक्रम के तहत शामिल नहीँ किया जाएगा।

श्रेया सहाय बनाम केंद्र सरकार

उसी साल, 14 साल की श्रेया सहाय की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई, जिसमेँ यह कहा गया कि, चूंकि आरटीई एक्ट औपचारिक स्कूलिंग के अलावा किसी भी अन्य माध्यम से ली गई शिक्षा को मान्यता नहीं देता है, ऐसे में बच्चोँ के मौलिक अधिकारोँ का हनन है। इस याचिका में मांग की गई कि होमस्कूलिंग और वैकल्पिक शिक्षा वाले स्कूलोँ को भी स्कूल की परिभाषा के तहत लाया जाए और एनआईओएस को 14 साल से कम उम्र के बच्चोँ को शिक्षा देना जारी रखने के लिए अनुमति दी जाए। इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने एक एफिडेविट दिया जिसमेँ यह कहा गया कि होमस्कूलिंग गैरकानूनी नहीं है, और आरटीई अधिनियम किसी भी प्रकार से होमस्कूलिंग के आड़े नहीं आता है। लेकिन साथ में यह भी दृढ़ता के साथ कहा गया था कि एनआईओएस का ओबीई कार्यक्रम मार्च 2015 के बाद 6-14 साल की आयुवर्ग वाले बच्चोँ को नहीँ लेगा। अंततः हाई कोर्ट ने 2013 में इस याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि कोर्ट द्वारा सरकार को आरटीई एक्ट में बदलाव करने का निर्देश देना न्यायसंगत नहीं होगा “क्योंकि किसी भी अधिनियम अथवा नियम में बदलाव का अधिकार सिर्फ सरकार और विधायिका के पास है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण फैसला था क्योंकि उच्च न्यायालय के पास यह अधिकार है कि अगर उसे कोई वैधानिक प्रावधान असंवैधानिक प्रतीत होता है तो वह उसमें परिवर्तन करने या समाप्त करने के लिए उसकी न्यायिक समीक्षा के निर्देश दे सकता है।

तबसे अब तक, ओबीई कार्यक्रम को समय-समय पर विस्तारित किया जा रहा है, पहले मार्च 2017 तक, और हाल ही में मार्च 2020 तक “यह कहते हुए कि एनआईओएस आरटीई अधिनियम के सेक्शन 4 के तहत बच्चोँ को मुख्यधारा में लाने हेतु लगातार प्रगतिशील है।” मगर आरटीई अधिनियम के सेक्शन 4 तहत मुख्यधारा में लाए जाने का क्या मतलब है, यह केंद्रीय एचआरडी मंत्रालय ने कहीँ भी स्पष्ट नहीं किया है।

होमस्कूलिंग कानूनी है, पर कब तक?

श्रेया सहाय के मामले में केंद्रीय एचआरडी मंत्रालय का एफिडेविट जो कि होमस्कूलिंग को कानूनी करार देता है, वह उन बच्चोँ के लिए बड़ी जीत है जो घर में रह कर पढ़ते हैं अथवा किसी अनौपचारिक माध्यम से शिक्षा ले रहे हैं। इस हिसाब से यह एफिडेविट बच्चोँ के शिक्षा के अधिकार और उनकी इच्छा को मान्यता देता है। लेकिन एक ठेठ सरकारी मानसिकता का परिचय देते हुए सरकार ने मार्च 2020 के बाद एनआईओएस के भविष्य पर सवालिया निशान लगाकर बच्चोँ के पैरेंट्स को अधर में लटका दिया गया है।

यह अनिश्चितता न सिर्फ होमस्कूलिंग की कानूनी मान्यता को बल्कि इसे अपनाने वाले अभिभावकों और छात्रोँ, बजट प्राइवेट स्कूलोँ, हजारोँ अनौपचारिक स्कूलोँ, जोकि देश के विभिन्न हिस्सोँ में बच्चोँ की जरूरतोँ को पूरा करने के लिए एनजीओ आदि के माध्यम से चलाए जा रहे हैं, को भी अंधेरे में रखे हुए है। ऐसे में सरकार को या तो ओबीई कार्यक्रम को बिना किसी डेडलाइन के एक्सटेंड कर देना चाहिए अथवा आरटीई अधिनियम में बदलाव करके होमस्कूलिंग को किसी भी तरह की कानूनी रुकावट से मुक्त कर देना चाहिए। प्राइवेट स्कूलोँ के असोसिएशन जैसे कि नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलायंस, देश भर के होमस्कूलों के एसोसिएशंस और शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे एनजीओ को एकजुट होकर आरटीई स्कूल्स से इतर बच्चोँ के शिक्षा के अधिकार और एनआईओएस कार्यक्रम को जारी रखने हेतु संघर्ष करना चाहिए। यह एक ऐसा अभियान है जिसे जागरूक जनता और पॉलिसी मेकर्स भी खुले दिल दे सहयोग करेंगे। सबसे युवा आईआईटी छात्र सहल कौशिक को इस अभियान के बैनर पर लाना चाहिए।

-विनीत भल्ला (लेखक, थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के सदस्य हैं)