कैसे कम हो अनाज के सड़ते पहाड़ों की ऊंचाई

 

भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 2010-11 की 9.2 प्रतिशत के आधे से भी नीचे आकर 2012-13 में मात्र 5 प्रतिशत रह गई है। हमारी अर्थव्यवस्था के सामने मुख्य समस्याएं हैं- ऊंचा चालू खाता घाटा, ऊंचा वित्त घाटा और छोटे-मंझोले उद्यमों के लिए बैंक ऋण का अभाव। ये तीनों मुश्किलें एक अकेले उपाय से दूर की जा सकती हैं। वह है देश के पास मौजूद अतिरिक्त खाद्य भंडार को कम करना। कृषि मूल्य एवं लागत आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन अशोक गुलाटी और इसकी संयुक्त निदेशक सुरभि जैन ने अपने हाल के एक शोधपत्र 'सुरक्षित भंडार नीति, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल की रोशनी में' के जरिये इस बात को स्पष्ट किया है। सब्सिडाइज्ड अनाजों के बल पर सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दशकों से चलाती आ रही है। इसके लिए सुरक्षित भंडारों की जरूरत पड़ती है, जिनका आकार पूरे साल के दौरान खरीद के सीजन के मुताबिक बदलता रहता है। पारंपरिक मानकों के अनुसार हर साल 1 जुलाई को रबी खरीद का सीजन खत्म होते वक्त 3 करोड़ 19 लाख टन का स्टॉक होना जरूरी है।

किस काम का खाद्यान्न

देश की 67 फीसदी आबादी के लिए हर महीने प्रति व्यक्ति पांच किलो गेहूं या चावल की व्यवस्था करने वाले नए खाद्य सुरक्षा बिल को ध्यान में रखते हुए इस भंडार में बढ़ोतरी करनी होगी। लक्ष्य अगर पूरी तरह आत्मनिर्भर रहने का और खराब सालों में भी बाहर से अनाज न मंगाने का हो तो 4 करोड़ 67 लाख टन के सुरक्षित भंडार की जरूरत पड़ेगी। लेकिन अगर बहुत जरूरी हो जाने पर थोड़ा-बहुत अनाज आयात कर लेने का विकल्प खुला रखा जाए तो 4 करोड़ 17 लाख टन का भंडार देश के लिए काफी होगा। असलियत में अभी, यानी 1 जुलाई 2013 को भारत के पास अनाज का 8 करोड़ 20 लाख टन भंडार होगा। यह स्थिति तब है, जब इस साल देश में अनाज का उत्पादन उम्मीद से कम हुआ है। नए खाद्य सुरक्षा बिल के तहत सब्सिडाइज्ड अनाज की सालाना बिक्री 6 करोड़ 20 लाख टन तक पहुंच जाएगी। लेकिन देश में अनाज की सरकारी खरीद इससे कहीं ज्यादा है, जिसके चलते देश का अनाज भंडार दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। अर्थशास्त्रियों की गणना के मुताबिक सरकार के पास अभी जरूरत से 4 करोड़ टन ज्यादा अनाज है।

चूहे, कीड़े और बारिश

इस जखीरे से खाद्य सुरक्षा की स्थिति नहीं सुधरती। अनाज की जरूरत खाली पेट को है, पहले से ही भरे गोदामों को नहीं। सच कहें तो हमारे पास अभी का स्टॉक रखने के लिए गोदाम ही नहीं हैं। काफी सारा अनाज खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की चादरों से ढककर रखना पड़ता है। नतीजा यह कि हर साल लाखों टन अनाज चूहों, कीड़ों और बारिश की भेंट चढ़ जाता है। इससे भी बुरी बात यह है कि 70 हजार करोड़ से लेकर 92 हजार करोड़ रुपये तक का बैंक ऋण इस फालतू अनाज भंडार में फंसा पड़ा रहता है। गुलाटी और जैन का कहना है कि इस ऋण का उपयोग अभी किसी भी उत्पादक काम में नहीं हो पा रहा है, जबकि छोटे और मंझोले उद्योगों के लिए यह बड़े काम का साबित हो सकता था। इन उद्यमों की जरूरत का कर्ज हम सड़ते अनाज के पहाड़ खड़े करने में झोंक रहे हैं। बजट के ब्यौरों में इसका जिक्र भले न किया जाता हो, लेकिन इस मद में उठाया जाने वाला सरकारी कर्ज वित्त घाटे का ही हिस्सा हुआ करता है। वित्तमंत्री चिदंबरम वित्त घाटे को नीचे लाने के लिए काफी चिंतित हैं और इसके लिए बेहद जरूरी पूंजी खर्च तक में कटौती कर रहे हैं। लेकिन इसके बजाय अनाज भंडारों पर कटौती की तलवार चलाना उनके लिए कहीं अच्छा रहेगा।

गुलाटी और जैन इन भंडारों को केंद्र से हटाकर राज्यों को हस्तांतरित करने की बात कहते हैं, लेकिन यह तो समस्या को टरकाना हुआ, सुलझाना नहीं। इसके बजाय जरूरत से ज्यादा खाद्यान्न के निर्यात को लेकर दिए गए उनके सुझाव पर अमल करना कहीं बेहतर रहेगा। पिछले साल भारत ने करीब 1 करोड़ टन चावल और 56 लाख टन गेहूं का निर्यात किया था, फिर भी देश का अनाज भंडार रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचा। असल में एक आक्रामक निर्यात नीति समय की मांग है। खाद्यान्नों की ग्लोबल कीमतें अभी भी ऊंची हैं, लिहाजा चावल और गेहूं का कुछ और ज्यादा, करीब ढ़ाई करोड़ टन निर्यात देश के लिए कम से कम 10 अरब डॉलर की आय सुनिश्चित करेगा। इससे व्यापार घाटा अभी के चिंताजनक स्तर से नीचे आएगा और डॉलरों की आवक पर भारत की निर्भरता कम होगी। इससे रुपया भी मजबूत होगा, महंगाई कम होगी और करोड़ों लोगों का भला होगा (कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं सुधरेंगी सो अलग)। कुछ लोग कहेंगे कि निर्यात सुधारने के लिए रुपये को नीचे लाना जरूरी है, लेकिन रुपया तो पहले ही पिछले दो सालों में 22 फीसदी नीचे आ चुका है।

सरकारी बर्बादी

गुलाटी और जैन लोगों को सीधे सस्ता अनाज बांटने के बजाय उन्हें सशर्त नकदी दिए जाने के पक्षधर हैं। इससे खरीद और वितरण की नाकारा सरकारी व्यवस्था से होने वाली बर्बादी काफी हद तक रोकी जा सकेगी। एफसीआई के कर्मचारियों को व्यापारियों के लिए काम करने वाले ठेका मजदूरों की तुलना में सात-आठ गुनी पगार देनी पड़ती है। 'खाद्य सुरक्षा' खर्च का बड़ा हिस्सा पंजाब जैसी राज्य सरकारों को टैक्स देने में चला जाता है। गुलाटी और जैन का आकलन है कि कैश ट्रांसफर व्यवस्था लागू हो जाने के बाद सुरक्षित अनाज भंडार की जरूरतें एक झटके में गिरकर महज एक से डेढ़ करोड़ टन तक सिमट जाएंगी। बाकी अनाज बाहर बेचने की व्यवस्ता बने तो वित्त घाटे में जोरदार कमी आएगी और कृषि क्षेत्र में अधिक उत्पादक निवेश के लिए धन लगाया जा सकेगा। खाद्य सुरक्षा का यह रास्ता देश के लिए कहीं ज्यादा बेहतर साबित होगा।

 

- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

साभारः नवभारत टाइम्स

स्वामीनाथन अय्यर