स्वास्थ्य सेवाएं और लघुऋण

गरीबी कम करने के मॉडल के तौर पर व्यापक रूप से स्वीकृत किया गया लघुऋण उद्योग अचानक कड़ी आलोचना का शिकार बन गया है, खासतौर पर दक्षिण एशिया में।  भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में एस के एस और अन्य के खिलाफ कथित तौर पर गलत कार्यप्रणाली और उच्च ब्याज़ दर लेने के कारण माहौल में गर्मी है। बांग्लादेश में नोबल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के जीवन पर्यन्त किए कार्यों को गरीबों के गले की फांस कहा जा रहा है। वजह है, ज्यादा ऋणग्रस्तता। हालांकि लघुऋण कार्यक्षेत्र को नियंत्रित करने की बहस प्रासंगिक है, लेकिन इसके लिए संपूर्ण कार्यक्षेत्र को कुसूरवार ठहराने से ना केवल इस उद्योग द्वारा देखरेख किए जाने वाले लाखों गरीब लोगों की जिंदगी पर असर पड़ेगा बल्कि ये प्रभावी ढंग से लघु ऋण से संबद्ध कारणों जैसे भारत में प्रगामी वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में भी विघ्न डालेगा।

2009 में भारत में लघुऋण अनुमानित 81.7 लाख लोगों के काम आया। देश में गरीबों के बीच सालाना तौर पर ऋण की मांग करीब 600 अरब रूपयों की है, लघुऋण तक महज़ बीस फीसदी ग्रामीण गरीबों की ही पहुंच है। अगर लघुऋण स्वास्थ्य क्षेत्र में एक माध्यम की तरह काम कर सकें, तो गरीबी में आश्चर्यजनक रूप से कमी आएगी। स्वास्थ्य संबंधी खर्चे गरीबी को 3.6 ग्रामीण और 2.9 फीसदी शहरी इलाकों में बढ़ाते हैं। लघुऋण स्वास्थ्य संबंधी विस्तार और कामगारों के लिए अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में सुनियोजित समूह द्वारा एक आशाजनक मंच प्रदान करता है।

ज़्यादातर लघुऋण सहायता प्राप्त करने वाले उपक्रमी ज़्यादा गरीबों का हिस्सा नहीं होते और सुनियोजित कार्यक्षेत्र में कार्यरत्त नहीं होते। लघुऋण के लाभान्वितों का एक हिस्सा (हर तीन नए लघुऋण नव उद्धमियों में से एक शहरी होता है) शहरी पृष्ठभूमि का होता है। ये लोग अवैध कॉलोनियों में रहते हैं जिनको मूल स्वास्थ्य सेवाएं भी बमुश्किल मिलती हैं। ये हालात उनके स्वास्थ्य के अकसर खराब होने की वजह बनते हैं और नतीज़न उनकी माली हालत भी अकसर कमज़ोर पड़ती रहती है।

लघुऋण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रसार के लिए ना सिर्फ एक मजबूत आधारशिला दे सकता है, बल्कि राष्ट्रीय बीमा योज़नाओं के ज़रिए ये लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को बढ़ा सकता है। हां, इसके लिए जागरुकता बढ़ाने की, स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने वाली संस्थाओं से बीमा योज़ना कार्यक्रम को जोड़ने की और पूंजी को उपलब्ध कराने के उपायों, जैसे की स्वास्थ्य ऋण या फिर स्वास्थ्य बचत योजना की मदद लेनी पड़ सकती है।

अब ज्यादा लघुऋण देने वाले बैंक ये समझ रहे हैं कि लोगों के ज़ीवन सुधारने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ऋण के साथ-साथ किसी न किसी तरह का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना भी जरूरी है। लोगों की आर्थिक और समाज़िक शक्ति का बढ़ना, साथ ही लिंगभेद का कम होना लघुऋण के साथ स्वास्थ्य सुविधाओं को जोड़ने के कुछ फायदे हैं।

लघुऋण की रोज़मर्रा की बैठकों में भी अगर सिर्फ स्वास्थ्य शिक्षा दे दी जाती है, तो लोगों का स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान सुधर जाता है, जिससे लोगों की स्वास्थ्य संबधी आदतों में नापे जाने लायक बेहतर बदलाव आ जाता है। ये बदलाव ऐसे कई हज़ार सालों के विकास लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ज़रूरी क्षेत्रों, जैसे कि ‘जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य’ और ‘संक्रामक रोग’ जैसे पहलुओं में देखने को मिलता है।

सिर्फ एक चौथाई भारतीय लघुऋण कंपनियां किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवा देती हैं। इस तरह के कई छोटे स्तर के स्वास्थ्य जागरुकता अभियानों से ले कर कई बड़े और जटिल स्वास्थ्य कार्यक्रम भी हैं। लेकिन भारत में ऐसी कुछ स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं से ले कर कई परतों वाली स्वास्थ्य सुरक्षा सेवाओं और लघुऋण कार्यक्रमों के बावजूद सिर्फ दस फीसदी लघुऋण के लाभान्वितों को ही थोड़ी बहुत स्वास्थ्य सेवा मिल पाती है।

अकसर लघुऋण देने वाली संस्थाएं जन-समूह-विशेष स्वास्थ्य कार्यक्रमों की रचना करने में संघर्ष करती हैं। इससे कार्यक्रम निर्माण और उसके क्रियान्वयन की कारगर तकनीक की ज़रूरत को बल मिलता है।

हमे याद रखना होगा कि लघुऋण व्यवस्था और इसके ग्राहकों के स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा में सुधार भारत की लघुऋण कंपनियों और इस उद्योग की सेहत सुधारने का सामर्थ्य रखता है.

- सोमन साहा