लक्ष्मीजी की पूजा और लक्ष्मीपुत्रों से नफरत

बिरला हो या टाटा ,अंबानी हो या बाटा
सबने अपने चक्कर में देश को है काटा
अरे हमरे ही तो खून से इनका
इंजिन चले धकाधक
आमआदमी की जेब हो गई है सफाचट

प्रकाश झा की की आनेवाली फिल्म चक्रव्यूह का यह गीत विवादों से घिर गया है। सेंसर बोर्ड के चक्रव्यूह से बच निकलने में भले ही कामयाब हो गया हो लेकिन वह कानूनी नोटिस के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। बिरला समूह के सभी वारिसों ने मिलकर नोटिस भेजा है ।सुना है बाटा वाले भी भेजनेवाले हैं। लेकिन फिल्म के निर्माता प्रकाश झा का कहना है कि फिल्म में इन गणमान्य उद्योगपतियों या उद्योग समूहों के बारे में जो कहा गया है वह हमारी राय नहीं है वह तो हमने यह दिखाया कि जनता का उद्योगपतियों के बारे में नजरिया क्या है।

प्रकाश झा की बात सही हो सकती है लेकिन यह भी सही है कि आजकल फिल्म निर्माताओं की यह कोशिश होती है कि फिल्म रिलीज होने से पहले उसके बारे में कोई विवाद पैदा हो जाए । दरअसल विवाद से फिल्मों को जो पब्लिसिटी मिलती है वह ज्यादा कारगर होती है। इसतरह की भारी पब्लिसिटी पाने के लिए हर फिल्म निर्माता तरसता है।पब्लिसिटी के प्रति इस दीवानगी को जाने भी दें ।बाक्स आफिस पर गल्ला बोटरने के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले निर्माता इसतरह की टोटकों से बाज नहीं आनेवाले ।लेकिन यह गीत हमारे बुद्धिजीवियों की सोच के दिवालियापन को दर्शाता है। पूंजीपतियों ,उद्येगपतियों को कोसना ,उन्हें चोर बताना,शोषक करार देना ,उन्हें समाज की तमाम बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराना हमारी आदत बन गई है और इसे हम सोचे समझे बगैर दोहराते रहते हैं। विडंबना यह है कि दूसरी तरफ हम श्रम का गौरव करने के नाम पर श्रमजीवियों और मजदूरों को बहुत महिमामंडित करते हैं। इसके पीछे की रूमानी  सोच यह है कि दुनिया की सारी समृद्धि मजदूरों की श्रम से जन्मी है। बेशक समृद्धि को पैदा करने में श्रम की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है लेकिन वह मुख्य कारक नहीं है।मुख्य कारक तो पूंजीपति या उद्योगपति ही है जो उद्यम की परिकल्पना करता है, उसमें पूंजी लगाकर उसे कार्यान्वित करता है ताकि समृद्धि –संपदा पैदा हो। सारी दुनिया की समृद्धि में इन उद्योगपतियों का सबसे अहम यौगदान है।यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि वे संपत्ति के असली सर्जक हैं। अपने इस सृजन के लिए वे बाकी कारकों को खुद ही  जुटाते हैं।

लेकिन भारत के बुद्धिजीवी इस हकीकत को समझने और मानने के लिए तैयार नहीं हैं। समाजवादी नारेबाजी उनके दिमाग  में इस तरह घर कर गई है कि सूर्य़कांत  त्रिपाठी निराला जैसे वरिष्ठ साहित्यकार भी उसके शिकार हो जाते हैं। वे श्रम की महिमागान करने के लिए अपनी सुप्रसिद्ध कविता में लिखते हैं।

वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

श्रम के प्रति यह भाव निश्चित ही संवेदनापूर्ण है होना भी चाहिए। लेकिन पूंजीपति या उद्योगपति के प्रति उनका नजरिया किस तरह विकृत मानसिकता की उपज है इसकी बानगी यह कविता है

अबे, सुन बे गुलाब
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट;

तो यह है हमारी कथित प्रगतिशील सोच ।समृद्धि संपत्ति और संपदा के सृजन के जटिल अर्थशास्त्र को समझती ही नहीं । केवल समाजवादी को जीवन का यधार्ध मान लेती है।जो मेहनत करके अपना पेट तक नहीं भर पाते वे हैं हमारे मन में बहुत सहानुभूति है होना भी चाहिए लेकिन जो कैपिटलिस्ट या उद्योगपति संपत्ति का सृजन कर रहा हैं।जो हजारों लाखों लोगों को रोजगार देता है,केवल अपना पेट नहीं भरता वरन दूसरों का पेट भरने का भी इंतजाम करता है वह हमारी नफरत का पात्र है, वह मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है, सारी अनैतिकता की जड़ है। सभी जानते हैं कि समृद्धि का सृजन और लोगों को रोजगार मुहैया कराना कितना महत्वपूर्ण और पवित्र काम है। एपल कंपनी का संस्थापक स्टीव जाब्स कहता था कि वह दान धर्म नहीं करता क्योंकि वह इतने लोगों को रोजगार जो दे रहा है। लोगों को रोजगार देना उन्हें जीविका उपलब्ध कराना है।इससे बड़ा काम कोई हो ही नहीं सकता।

यह सब विरोधाभास देखने पर कबीर का यह दोहा बरबस याद आ जाता है – रंगी को नारंगी कहे चलती को कहे गाड़ी।यह बहुत बड़ी विडंबना है कि इस लक्षमीजी का पूजन करनेवाले देश में देश दुनिया का आर्थिक चक्र चलानेवाले लक्ष्मीपुत्रों को लोग चोर,लुटेरे  और शोषक कहते हैं  और उनसे नफरत करते हैं । शायद हमारा देश यह भूल गया है कि संपदा और संपत्ति के बड़े पैमाने पर निर्माण के  बगैर न गरीबी दूर हो सकती है न  कोई देश समृद्धि कर ही नहीं सकता है। तब सवाल खड़ा होता है कि पूंजी का सृजन करनेवालों को गालिया देनेवाला उन्हें बार बार अपमानित करनेवाला  देश कैसे समृद्ध हो सकता है?

- सतीश पेड़णेकर