जन्मदिन मुबारक फ्रेडरिक बास्तियात

फ्रेडरिक बास्तियात का जन्म 30 जून 1801 में बेयोन में हुआ था। उनका परिवार एक छोटे से कस्बे मुग्रोन से ताल्लुक रखता था, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा गुजारा और जहां पर उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित है। मुग्रोन, बेयोन के उत्तर-पूर्व में एक फ्रांसीसी हिस्से 'लेस लेंडेस' (Les Landes) में स्थित है। उन्होंने अपनी जिंदगी का बाद का हिस्सा पेरिस में 'लेस जर्नल डेस इकानॉमिस्तेस' (Le Journal des Economistes) के संपादक और 1848 में संसद सदस्य के तौर पर गुजारा।

एक अर्थशास्त्री के तौर पर उन्हें सुस्पष्ट दिमाग और विरोधियों को उखाड़ देने वाली व्यंग्यात्मक शैली हासिल थी। उन्होंने अपने वक्त में आर्थिक विज्ञान को उपभोक्ताओं, यानी लोगों की सोच के आधार पर विकसित करके एक नई दिशा दी थी। वह लेन-देन और निजी पसंद की आजादी के मुखर और कभी न थकने वाले जांबाज थे, जो कारोबार में किसी भी तरह की बाधा या अनुदान के सख्त खिलाफ थे। आज 150 साल बाद भी उनके द्वारा किए गए काम की ताजगी और औचित्य बरकरार है। संस्थाओं और समाजों के गठन को लेकर उनकी कई भविष्यवाणियां खरी साबित हुई हैं।

एक दार्शनिक के तौर पर, वे आधुनिक काल के कई उदारवादियों के पूर्वजों की तरह थे, उन्होंने व्यक्तिगत आजादी और जवाबदेही पर कई आधारभूत नीतियां तैयार कर दी थीं। एक स्थानीय जज, के तौर पर वे कुशलता और समानता के अग्रदूत थे।

एक राजनीतिज्ञ के तौर पर, वे सरकार के छोटे आकार के पक्षधर थे और जनता की जेब से बढ़ते अनवरत खर्चों के खिलाफ लड़ते रहते थे। उन्होंने उपनिवेशवाद के विस्तार और गुलामी प्रथा की भी मुखर आलोचना की थी। वे सत्ता के विकेंद्रीकरण, सांसद रहते मंत्री बनने और संसद में सरकारी अधिकारियों की संख्या को सीमित करने के पक्षधर थे। वह राजनीति में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी के भी पक्षधर थे।

फ्रेडरिक बास्तियात का जीवन

जहां तक राजनीतिक अर्थशास्त्र की बात है तो फ्रेडरिक बास्तियात को काफी सम्मानजनक स्थान हासिल है। फ्रांस के अर्थशास्त्रियों की उदारवादी या लेसी-फेयर (laissez-faire एक ऐसा मत जिसके तहत सरकार को व्यावसायिक गतिविधियों में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए), जिसमें महान जे.बी. से (J. B. Say) भी शामिल थे, से ताल्लुक रखने वाले बास्तियात समाज, समृद्धि और आजादी को समझने की कोशिश में अपने तर्कपूर्ण, सधे और व्यंग भरे लहजे के कारण जाने जाते थे। निबंधों और पैम्फ्लेट्स की छोटी सी सीरीज और राजनीतिक अर्थशास्त्र पर प्रबंधन में बास्तियात ने रोस्यू (Rousseau) की सोच के ठीक विपरीत हमें समझाया कि सामाजिक जगत की एक कुदरती सामंजस्य भरी व्यवस्था है, एक ऐसी व्यवस्था जो सीमित संसाधनों से असीमित मांगों को पूरा करने के इंसानी प्रयास की देन होती है। परिणाम सभी के लिए भौतिक सुख-शांति की दिशा में संतुलित प्रगति होती है। उन्होंने लिखा कि इस आजादी और उससे जुड़ी बातों जैसे जायदाद, प्रतिस्पर्धा की राह में हस्तक्षेप लोगों को न केवल गरीब बल्कि दमन का शिकार भी बनाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि हस्तक्षेप से लोगों का सृजन का वह काम प्रभावित होता है, जिसमें वे जुटने वाले थे। इस तरह सृजन के फल भुला दिए जाते हैं और हस्तक्षेप के दौरान वे ही 'न देखी जाने वाली' बात बन जाते हैं।

 

विस्तार से पढ़ने के लिये क्लिक करें..

https://azadi.me/profile-frederic-bastiat