जन्मदिन विशेषः क्या चाहते थे राजाजी

जन्म 10 दिसंबर, 1878 – निधन 25 दिसंबर, 1972 मैं चाहता हूं कि भारत का माहौल उस डर से मुक्त हो, जैसा आजकल हो गया है, जहां उत्पादन या व्यापार के कठिन काम में जुटा हुआ ईमानदार व्यक्ति अधिकारियों, मंत्रियों और पार्टी के आकाओं के हाथों में ठगे जाने के भय से आजाद होकर अपना कारोबार कर सके। मैं ऐसा भारत चाहता हूं, जहां योग्यता और ऊर्जा को कार्य करने का स्कोप हासिल हो। साथ ही इसमें उन्हें किसी के आगे नाक न रगड़नी पड़े और अधिकारियों एवं मंत्रियों से विशेष वैयिक्तक अनुमति प्राप्त करने की जरूरत न हो। जहां उनके प्रयासों का मूल्यांकन भारत और विदेशों में खुले बाजार के द्वारा किया जाए। मैं चाहता हूं कि परिमट-लाइसेंस का गहरा कोहरा हम लोगों पर हावी न हो जाए। मैं चाहता हूं कि राज्य नियंत्रणवाद (राज्यवाद) समाप्त हो जाए और सरकार अपने सचारू रूप से अपने कार्यों को अंजाम देने लगे। मैं चाहता हूं कि सरकारी बंधन की अकुशलता दूर हो जाए जहां निजी प्रबंधन की प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्था कार्यों की देखरेख करे। मैं चाहता हूं कि इस परिमट-लाइसेंस राज का भ्रष्टाचार दूर हो जाए। मैं चाहता हूं कि कानून और नीतियों को शासित करने के लिए नियुक्त किए गए अधिकारी सत्तारूढ़ पार्टियों के आकाओं के दबावों से मक्तु रहें तथा वे धीरे-धीरे निर्भीक ईमानदारी के मानकों को पुनः स्थापित कर दें, जिनकी वे कभी पैरवी किया करते थे। नेहरू कहते हैं कि कभी भी किसी परिमट चाहने वाले ने उनसे अनरोध नहीं किया। सच है। लेकिन उनके मातहत 150 मंत्रियों की एक पूरी फौज है और अनेक पेशेवर कांग्रेसी इन लोगों को कोटा और परिमट दिलाने में मदद करने सबंधी इस नए कारोबार में लगे हैं। मैं सभी के लिए वास्तविक रूप से समान अवसर चाहता हूं और परिमट लाइसेंस राज द्वारा सृजित किसी भी निजी एकाधिकार को नहीं चाहता हूं। मैं एक ऐसा भारत चाहता हूं जहां किसानों को नेहरू के लिए सहकारी कृषि के माध्यम से हवाई किले बनाने के लिए उनकी जमीनों को छोड़ने के लिए प्रोत्साहित या भ्रमित न किया जाता हो। मैं संपित्त, भुमि और अर्जन के अन्य सभी रूपों के सभी स्वामियों के लिए सुरक्षा चाहता हूं। उनके ऊपर डैमोकल की तलवार भी नहीं लटकी रहे जो उन्हें स्वामित्व हरण की धमकी देती हो। साथ ही उन्हें औचित्यपूर्ण और संपूर्ण प्रतिपूर्ति का भुगतान भी प्राप्त न हो पाए जो कि सही सिद्धांतों के आधार पर न्यायिक प्राधिकारियों द्वारा निहित की गई हो, न कि राजनैतिक विधान की मनमानी के अनुसार। मैं चाहता हूं कि मौलिक अधिकारों को उनके मूल स्वरूप और अखंडित रूप में बनाए रखा जाए। मैं एक ऐसा भारत चाहता हूं जहां उच्च प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर निजी पूंजी के निर्माण में बाधक न बनें और वे उद्यम और प्रयास को हतोत्साहित न करें। मैं एक ऐसा भारत चाहता हूं जहां केंद्र का बजट मुद्रा स्फीति और अत्यंत उच्च कीमतों को पैदा न करे। मैं एक ऐसा भारत चाहता हूं जहां राज्य पूंजीगत निवेश पर कर न लगाए जो कि किसानों की वर्तमान पीढ़ी के जीवन को दूभर बना देता है। मैं चाहता हूं कि बड़े उद्योग की धन की शक्ति को राजनीति से अलग ही रखा जाए। लोकतंत्र को चलाना बहुत कठिन काम है। इसे पैसे की ताकत से नष्ट नहीं किया जाना चाहिए और अत्यंत खर्चीले चुनावों द्वारा आभासी नहीं बनाया जाना चाहिए तथा ऐसा नहीं होना चाहिए कि बड़े उद्योग सत्तारूढ़ पार्टी को धनराशि देकर समर्थन प्रदान कर रहे हों और बदले में उनसे विशेषाधिकार प्राप्त कर रहे हों या वे राज्य की विनियामक ताकत के डर से उनका साथ दे रहे हों। मैं एक ऐसा भारत चाहता हूं जहां धर्म, एक बार फिर इंसानों के दिलों पर राज करे, लालच नहीं। मैं चाहता हूं कि सहानुभूति और परोपकार की भावना स्वतंत्र रूप में कार्य करे तथा वह राज्य की उन योजनाओं द्वारा नियंत्रित न किया जाए जो अत्यिधक कराधान (Over‐Taxation) और अत्यिधक केंद्रीकरण (Over‐ Centralization) द्वारा सभी कल्याणकारी कार्यों पर एकाधिकार जमा लेती है। मैं चाहता हूं कि राज्य को अपनी सीमाएं मालूम हों और वह मानवता की भावनाओं से कार्य करे, साथ ही नागिरक उनके द्वारा उस संबंध में नैसर्गिक रूप से प्राप्त पारंपिरक स्त्रोंतों के माध्यम में आध्यात्मिक ज्ञान की अनुभितू करे। मैं एक ऐसी सशक्त पार्टी चाहता हूं जो सत्तारूढ़ पार्टी की वास्तविक विरोधी पार्टी हो, चाहे वह कोई भी पार्टी क्यों न हो, ताकि लोकतंत्र के पहिये एक सीधी सड़क पर दौड़ें। मैं चाहता हूं कि भारत विदेशों में अपने नैतिक बल को पुनः हासिल करे और मैं यह नहीं चाहता कि हमारे लोग यह सोचने के लिए विवश हों कि वह नैतिक प्राधिकार अभी तक नहीं खोया है, जो हम गांधी के दिनों में धारण किया करते थे। - मद्रास के मरीना बीच पर एक जनसभा में जवाहरलाल नेहरू के भाषण पर 'द हिंदू' अखबार में प्रकाशित राजाजी की प्रतिक्रिया विस्तार में पढ़ने के लिए क्लिक करें.. http://azadi.me/sites/default/files/liberal-thinker-c-rajgopalachari.pdf