भारत को मजबूत नेता की तलाश

 

भारत में जहां सरकार की जरूरत नहीं है, वहां आम आदमी लाल फीताशाही में मीलों तक जकड़ा है लेकिन जहां उसकी बहुत ज्यादा जरूरत है-उदाहरण के तौर पर सड़कों पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए- वहां सिपाही गायब हैं। 2014 के आम चुनाव में मतदाता दुविधा में होगा। उसे विकास, रोजगार और धर्म निरपेक्षता, बहुलता के बीच चुनाव करना पड़ेगा। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व और 2014 में एक संभावित प्रधानमंत्री के रूप में गंभीर दावेदार के तौर पर 62 वर्षीय नरेंद्र मोदी के अचानक उभरने से देश में एक तूफान सा आ गया है। हालांकि 2014 के आम चुनाव अभी एक साल दूर हैं, अब से तब के बीच कुछ भी हो सकता है। साधारण, खुले दिमाग और सड़क के बीच का भारतीय आश्चर्य में है कि गुजरात के इस मुख्यमंत्री के बारे में वह कैसे सोचे? लेकिन उन्होंने लोगों का ध्रुवीकरण कर दिया है - या तो आप उन्हें प्यार करें या घृणा, क्या वह एक हीरो हैं या एक विलेन हैं?
भारतीय असंतुष्ट और राजनीतिक रूप से परेशान हैं। उनके विराग का कारण बढ़ती मुद्रास्फीति, घटता विकास, अरक्षणीय वित्तीय घाटा, लहूलुहान सार्वजनिक क्षेत्र और संकट की गंभीरता से मुंह चुराने वाली भ्रष्ट सरकार है। भ्रष्ट और पंगु सरकार से परेशान ज्यादातर लोग एक मजबूत नेता चाहते हैं, वे पूछ रहे हैं क्या नरेंद्र मोदी इसका जवाब हो सकते हैं। बिल्कुल, उन्होंने गुजरात में साबित किया है कि वे एक निर्णायक नेता हो सकते हैं, जो अर्थव्यवस्था की ऊंचाई बहाल करे और भ्रष्टाचार मुक्त गवर्नेस की ओर ले जाए।
लेकिन मेरे जैसे खुले दिमाग और बीच सड़क के भारतीय को लगता है कि मोदी भारत की धर्मनिरपेक्ष परम्पराओं और यहां तक कि हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरे का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। हाल के दिनों में किसी भारतीय नेता ने इतने जोश से ‘गवर्नेस’ और ‘विकास’ की बात नहीं की। उनकी ‘कम सरकार ज्यादा शासन’ वाली बात उनसे मेल खाती है जो सरकार के कामकाज से बेहद परेशान हैं। वे समझाते हैं कि सरकार को वही करना चाहिए जो बाजार या सिविल सोसायटी नहीं कर सकते। सरकार को करदाताओं का धन एअर इंडिया, सरकारी बैंकों या कभी अच्छे स्कूटर नहीं बनाने वाली स्कूटर्स इंडिया लि. जैसे अक्षम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बचाने में नहीं लगाना चाहिए। 
मोदी बहुत ज्यादा सरकार और बहुत कम शासन का एक और उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं, किसी भी म्युनिसिपल दफ्तर चले जाएं आपको ज्यादातर ऐसे क्लर्क मिलेंगे जो सुस्त और भ्रष्ट होंगे। लेकिन म्युनिसिपल दफ्तर को असल में क्लर्क नहीं, टैक्निकल लोग चाहिए जो तेजी से शहरी होते भारत में सेनिटेशन, परिवहन और इन्फ्रास्ट्रक्चर की समस्याओं को हल कर सकें। इसलिए गुजरात में उन्होंने इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों और इंटर्न्‍स को म्युनिसिपल समस्याएं हल करने का मौका दिया। 
भारत में जहां सरकार की जरूरत नहीं है, वहां आम आदमी लाल फीताशाही में मीलों तक जकड़ा है लेकिन जहां उसकी बहुत ज्यादा जरूरत है-उदाहरण के तौर पर सड़कों पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए- वहां सिपाही गायब हैं। भारत दण्डनीति का पवित्र सबक भूल गया है जो महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को सिखाया था।
भारत के चुनावों में मध्यम वर्ग की भूमिका कभी महत्वपूर्ण नहीं रही। वे कभी-कभार ही वोट देते हैं, राजनीति में भी उनकी आवाज नहीं होती। लेकिन 1991 के बाद मध्यम वर्ग से महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी धैर्य, संघर्ष, कड़ी मेहनत और एक सेल फोन के माध्यम से उठी। कई लोग गांवों से पलायन करके आए- मोदी इन्हें ‘नव मध्यम वर्ग’ कहते हैं। इन्हें अपनी कड़ी मेहनत वाले जीवन और भ्रष्टाचार के माध्यम से ताकतवर हुए लोगों के बीच का विरोधाभास चिढ़ाता हुआ लगा।
मोदी का एक महत्वपूर्ण नकारात्मक पहलू भी है। बहुत से भारतीय मानते हैं कि वह एक मुस्लिम-विरोधी हैं और 2002 में गुजरात में हुई घटनाओं के लिए वे उन्हें माफ नहीं कर सकते जिनमें भीड़ की हिंसा में करीब एक हजार मुसलमान मारे गए थे। भले ही उन्होंने जानबूझकर उन घटनाओं की अनदेखी न की हो, लेकिन उन्होंने मुंह फेर लिया था। मुख्यमंत्री के रूप में वे त्रासदी होते देखते रहे, उन्हें जिम्मेदारी स्वीकार करनी ही चाहिए। उनके आलोचकों को डर है कि वे देश का ध्रुवीकरण कर देंगे (हालांकि बहुत से मुसलमानों ने गुजरात में उन्हें वोट दिए)। अब तक भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यक काफी हद तक उदार हो गए हैं।
लेकिन मोदी का उत्थान असंतुष्ट मुसलमानों को घरेलू आतंकवाद को बढ़ावा देने की ओर मजबूर कर सकता है। यह असली खतरा है। इस प्रकार नरेंद्र मोदी एक धर्म-संकट उपस्थित कर रहे हैं, अनिश्चयी, मेरे जैसे बीच सड़क के भारतीयों के लिए नैतिक दुविधा। उनमें उच्च विकास दर की अर्थव्यवस्था कायम करने की क्षमता है जो बहुत सी नौकरियों का सृजन कर लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल सकती है। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता, बहुलवाद और सहिष्णुता उतनी ही कीमती हैं जितनी समृद्धि।
मैं यह जानना चाहता हूं कि मोदी ने 2002 की घटनाओं के लिए अफसोस क्यों नहंीं जताया? त्रासदी के लिए उन्हें व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं लेनी है, लेकिन खुद को कानूनी दांवपेंच में फंसाए बिना वे दुख तो जता ही सकते हैं। यह तीन बार निर्वाचित होने वाले एक मुख्यमंत्री के लिए उदार भाव प्रदर्शन होगा। आखिरकार महाभारत में कुरुक्षेत्र युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने भी युद्धक्षेत्र में हुई हर तरह की हिंसा के प्रति पश्चाताप किया था। उस पश्चाताप के फलस्वरूप उन्होंने युद्ध समाप्त होने के बाद धृतराष्ट्र को सिंहासन पर बिठा दिया था और खुद उनके नाम पर शासन करने लगे थे। क्या मोदी सांप्रदायिक हैं इसलिए अफसोस नहीं जता सकते ? 
मैं भी आज भारत में दंड-नीति चाहता हूं। लेकिन मैं ऐसे मजबूत नेता के लिए बेताब हूं जो मुझे इंदिरा गांधी की याद दिला सके। वह भी एक मजबूत नेता थीं, लेकिन उन्होंने संविधान से खिलवाड़ किया, इमर्जेसी लगाई, आजादी छीन ली। क्या मोदी संविधान के दायरे में रहकर काम करेंगे और संस्थानों को मजबूत करेंगे? अंत में, मैं जानता हूं कि मुझे 2014 के चुनावों में बहुत से दोषयुक्त उम्मीदवारों में से किसी को चुनना होगा। मुझे उस दुविधा से गुजरना होगा। अगर मैं मोदी को खारिज करता हूं, तो मैं विकास की जगह धर्मनिरपेक्षता और बहुलवाद के मूल्यों के लिए वोट दे रहा होऊंगा। इस तरह मैं अर्थव्यवस्था के तेजी से सुधरने और लाखों नौकरियों के सृजन की उम्मीद गंवा दूंगा। दूसरी ओर, अगर मैं मोदी को चुनता हूं तो, मैं बहुलवाद, सहिष्णुता और भारत की विभिन्नता, जो मेरे लिए ‘आदर्श भारत’ का हृदय है, से समझौता करूंगा। मेरे लिए मुश्किल विकल्प है। मुझे उम्मीद है कि आगामी महीनों में सही विकल्प के लिए मेरे पास कुछ और स्पष्टता होगी।
 
 
गुरचरण दास (लेखक जाने-माने स्तंभकार और साहित्यकार हैं)
सभारः दैनिक भास्कर

 

गुरचरण दास