कमेन्टरी - गुरचरण दास

गुरचरण दास

इस पेज पर गुरचरण दास के लेख दिये गये हैं। उनके लेख विभिन्न भारतीय एवं विदेशी शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसके अलावा उन्होने कई बेस्टसेलर किताबें भी लिखी हैं।

पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें।

अधिक जानकारी के लिये देखें: http://gurcharandas.org

यद्यपि सन् 1991 से भारत में आर्थिक सुधारों की शुभारंभ और मुक्त बाजार के साथ भारतीयों के प्रेम प्रसंग को शुरू हुए दो दशक बीत चुके हैं, इसके बावजूद पूंजीवाद को भारत में अपना मुकाम पाने के लिए अबतक जद्दोजहद करना पड़ रहा है। अधिकांश लोगों की भांति भारतीय भी मानते हैं कि बाजार फलदायक तो है लेकिन नैतिक नहीं है। लेकिन मेरी राय इसके बिल्कुल उलट है। मेरा मानना है कि इंसान अनैतिक होता है और लोकतंत्र के तहत या राजतंत्र के तहत, समाजवादी व्यवस्था हो अथवा पूंजीवादी समाज बुरा व्यवहार वही करता है। बाजार नामक

Published on 31 Oct 2016 - 20:46
दूसरों से मुझे बचाना तो राज्य का कर्तव्य है, लेकिन मुझे खुद से ही बचाना इसके दायरे में नहीं आता। हमारे संविधान में यही धारणा निहित है, जो जिम्मेदार नागरिक के रूप में मुझ पर भरोसा करता है और राज्य से हस्तक्षेप के बिना मुझे अपनी जिंदगी शांतिपूर्वक जीने की आजादी देता है। इसीलिए पोर्न साइट ब्लॉक करने का सरकार का आदेश गलत था। उसे श्रेय देना होगा कि उसने जल्दी ही अपनी गलती पहचान ली और रुख बदल लिया- इसने वयस्कों की साइट से प्रतिबंध हटा लिया जबकि चाइल्ड पोर्न साइट पर
Published on 16 Nov 2015 - 16:06
स्वतंत्रता दिवस का अवसर थोड़ा रुकने, रोजमर्रा की घटनाओं पर सोच का दायरा बढ़ाने और पिछले 68 साल के दौरान अपने देश की यात्र पर नजर डालने का बढ़िया वक्त होता है। आजाद देश के रूप में अपने भ्रमपूर्ण इतिहास पर जब मैं नजर डालता हूं तो कुहासे में मील के तीन पत्थरों को किसी तरह देख पाता हूं। अगस्त 1947 में हमने अपनी राजनीतिक लड़ाई जीती। जुलाई 1991 में आर्थिक आजादी हासिल की और मई 2014 में हमने सम्मान हासिल किया।
 
Published on 16 Nov 2015 - 15:19

Pages