गुजरात में शराब बंदी का औचित्य

 

हम भारतीय असहज मुद्दों से बचने में उस्ताद  हैं। असहज मामलों पर चर्चा करने के बजाय हम ढोंगी और झूठा बनना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है शराब के सेवन का, जिस पर चर्चा से परहेज करना हम अच्छी तरह सीख चुके हैं। हमसे उम्मीद की जाती है कि हम शराब से संबंधित हर चीज की सार्वजनिक रूप से आलोचना करेंगे।

वहीं व्यक्तिगत स्तर पर करोड़ों भारतीय शराब का मजा लेते हैं। इनमें केवल बिजनेसमैन और कॉपरेरेट दुनिया में काम करने वाले लोग ही नहीं हैं, बल्कि राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, शिक्षक और पत्रकार भी शामिल हैं। इस पाखंड का नतीजा यह है कि देश के कई हिस्सों में शराबबंदी से संबंधित कानूनों पर कभी चर्चा नहीं होती। मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड, लक्षद्वीप और गुजरात में शराब अब भी पूरी तरह प्रतिबंधित है। गुजरात में शराबबंदी की नीति हैरान करती है, खासकर इसलिए क्योंकि गुजरात खुद को देश के सबसे आधुनिक राज्यों के रूप में पेश करता है।

वर्ष 1960 के नशाबंदी कानून को बनाए रखने की हर जगह एक जैसी वजह बताई जाती है। शराब का सेवन गरीब परिवारों को तबाह कर सकता है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने का तर्क भी प्रतिबंध के पक्ष में दिया जाता है। शराब से होने वाली स्वास्थ्य की समस्याएं और इसकी लत लगने के खतरे से सभी वाकिफ हैं। जब प्रतिबंध के पक्ष में इतने सारे कारण मौजूद हैं, फिर आश्चर्य की बात तो यह है कि बाकी 24 राज्यों में भी यह लागू क्यों नहीं है? 

प्रतिबंध के पक्ष में अच्छे इरादों का होना इसका केवल एक पक्ष है। इसका दूसरा पहलू यह है कि प्रतिबंध कारगर नहीं है। इस प्रतिबंध की जिस हद तक अवहेलना की जाती है, वह हास्यास्पद है। अवैध शराब गुजरात में आसानी से उपलब्ध है। मैं खुद गुजरात में कई ऐसे कार्यक्रमों में शामिल हुआ हूं, जहां शराब  परोसने की व्यवस्था होती है। शहरों के हाई-प्रोफाइल लोग शाम की चुस्कियों के साथ जिंदगी और काम से जुड़ी बातें करते हैं। इसके साथ ये प्रतिष्ठित लोग कानून तोड़ने वाले अपराधियों में तब्दील होकर रह जाते हैं। यह एक पुराने कानून का परिणाम है, जो भारत की 90 फीसदी से ज्यादा आबादी पर लागू नहीं होता। यदि हम नागरिकों को एक काूनन तोड़ने को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो फिर वे बाकी कानूनों का सम्मान कैसे करेंगे? क्या इसका आखिरी नतीजा समाज में ‘सब कुछ चलता है’ की सोच को और मजबूत नहीं करेगा, जो देश की मौजूदा समस्याओं का एक बड़ा कारण है?

जब पूरी दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग शराब पीने के बाद अगले दिन संस्थाएं, कंपनियां और देश तक चला सकते हैं, तो फिर किसी क्षेत्र विशेष में इसके उपभोग पर पाबंदी लगाने के लिए कानून थोपने की क्या जरूरत है? गुजरात सहित पूरे देश में वसा और शुगर के ज्यादा उपभोग से भी जीवन को खतरे में डालने वाली कई बीमारियां हो रही हैं, फिर इन पर पाबंदी क्यों न लगाई जाए? गुजरात की हर गली में सिगरेट और तंबाकू वाले पान क्यों मिलते हैं? ऐसे प्रतिबंध का भला मतलब क्या है जो कारगर न हो? क्या हम उन बदलावों से मुंह मोड़े रहेंगे, जिनकी गुजरात में जरूरत है? 

सारी दुनिया में करोड़ों लोग शराब का सेवन करते हैं और यह वैध है। कोई भी आधुनिक राज्य इसके उपभोग पर बंदिश लगाने की कोशिश नहीं करेगा। इसके कई नुकसान भी हैं। सरकार को करोड़ों रुपए की एक्साइज ड्यूटी से हाथ धोना पड़ता है, जिसकी भरपाई के लिए दूसरी वस्तुओं और सेवाएं महंगी हो जाती हैं। गुजरात खुद को ग्लोबल निवेश और पर्यटन केंद्र के रूप में पेश करने की भरपूर कोशिश कर रहा है। इन दोनों क्षेत्रों के लिहाज से शराब पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं है। भारतीय लोग रोजाना कानून तोड़ते हैं, लेकिन कानून में बदलाव की चर्चा तक नहीं करते। हमें इसमें कोई बुराई भी नहीं दिखती, लेकिन विदेशियों के साथ ऐसा नहीं है। विदेशी पर्यटकों को अवैध शराब का सेवन करना न तो रोमांचक लगता है न ही सामान्य। गुजरात के समुद्र तटीय इलाकों में रौनक नहीं आ सकती, जब तक कि शराब से प्रतिबंध हटाया नहीं जाता। पर्यटन से रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इस कानून को लागू कर हम हजारों गुजराती युवकों को नौकरी से वंचित कर रहे हैं। 

इसी तरह निवेश के केंद्र के रूप में भी यह कानून गुजरात को नुकसान पहुंचा रहा है। लंदन, न्यूयॉर्क, हांगकांग, टोकयो, सिंगापुर, सिओल या मुंबई- दुनिया का कोई भी ऐसा व्यावसायिक शहर नहीं है, जहां शराब प्रतिबंधित हो। ग्लोबल बैंकर ऐसी जगहों पर रहना पसंद नहीं करते, जहां हर पार्टी में उन्हें अवैध काम करना पड़े। यदि गुजरात खुद को विश्वस्तरीय बिजनेस सेंटर बनाना चाहता है तो उसे अपने कानूनों को भी वैश्विक मापदंडों के अनुरूप बनाना होगा।

1920 से 1933 के बीच अमेरिका में भी शराबबंदी को आजमाया गया था, लेकिन यह बुरी तरह असफल रही। इसके लिए भी वही तर्क दिए गए थे, जो आज गुजरात में दिए जाते हैं। इसके दुष्प्रभाव भी एक जैसे थे। नतीजतन इस कानून को ही खत्म कर दिया गया। जॉन रॉकफेलर शराबबंदी के धुर समर्थकों में शामिल थे, लेकिन प्रतिबंध समाप्त किए जाने के बाद उनकी राय कुछ ऐसी थी: ‘‘जब शराबबंदी लागू की गई थी, तब मुझे यह उम्मीद थी कि आम लोग इसका समर्थन करेंगे और शराब के दुष्प्रभावों को समझेंगे। लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि इसके नतीजे अपेक्षित नहीं मिल रहे। इसके बाद शराब की खपत बढ़ गई, कानून तोड़ने वालों की नई जमात पैदा हो गई, कानून के प्रति सम्मान की भावना काफी कम हो गई है और अपराध का स्तर पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।’’

कई लोग स्वीकार करेंगे कि ये बातें मौजूदा गुजरात पर भी लागू होती हैं। राजनीति के कारण बदलाव में देर होगी। राज्य में विधानसभा चुनाव अभी हाल में हुए हैं, लेकिन 2014 में होने वाले आम चुनाव और इसमें मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को देखते हुए कानून में सुधार की संभावना कम ही है। लेकिन हमें इस पर खुली चर्चा करनी चाहिए और उन नतीजों  पर पहुंचना चाहिए जो व्यावहारिक, तर्कसंगत और देश के विकास में मददगार हों। मैं शराब पीने का पक्षधर नहीं हूं, न ही खुद ज्यादा शराब पीता हूं। लेकिन मैं स्वतंत्रता, बदलाव और आधुनिकता का समर्थक जरूर हूं और गुजरात को आज इन्हीं चीजों की जरूरत है। (ये लेखक के निजी विचार हैं। इस मुद्दे पर कल के अंक में पढ़िए गुजरात के प्रसिद्ध लेखक गुणवंत शाह के विपरीत विचार।)

 

- चेतन भगत (अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार)

सभारः दैनिक भास्कर

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