GPS ने दिया आदिवासियों को जमीनी हक

पिछले हफ्ते मैं गुजरात गया। यह देखने कि तकनीक और एक सक्रिय एनजीओ ने कमजोर आदिवासियों को वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत किस तरह ताकतवर बनाया है। यह कानून आदिवासी जोत वाले उन सभी प्लॉटों पर मालिकाना हक की व्यवस्था करता है, जिनपर 2005 में खेती की जा रही थी। इससे पहले, वनों के सरकारी अधिग्रहण के बाद से ही सभी वनवासियों को सदियों के मालिकाने वाली उनकी जमीनों का गैरकानूनी कब्जेदार बना दिया गया था। वन विभाग द्वारा उनके गांवों और खेतों को कभी भी उजाड़ दिए जाने का खतरा बना रहता था।
उम्मीद थी कि यह कानून इस अन्याय को हमेशा के लिए समाप्त कर देगा। कई राज्यों ने जल्द ही ऐसे झूठे दावे भी किए कि उन्होंने वन अधिकार कानून लागू करके लाखों आदिवासियों को उनका हक दे दिया है। लेकिन कानून लागू होने में भयंकर गड़बड़ियां थीं। ज्यादातर इलाकों में न तो सही नक्शा मौजूद था, न जमीन के कागजात। अर्धशिक्षित ग्रामीणों से लंबे फॉर्म भरने और दावा दर्ज कराने की उम्मीद की गई थी, और ऐसे ज्यादातर दावों को वन विभाग ने खारिज कर दिया।
 
कैसा खेत, किसका खेत
इस अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं को इस बात की तस्दीक करनी थी कि 2005 में कौन सा परिवार किस चक को जोत रहा था और फिर इन दस्तावेजों को उसे राज्य सरकार के पास भेजना था। लेकिन गुजरात में दर्ज कराए गए कुल 1,82,000 दावों में से 1,28,000 पूरी तरह या आंशिक रूप से खारिज कर दिए गए। स्वीकृत मामलों में भी दावे के तहत आने वाले रकबे के एक हिस्से पर ही सरकारी मोहर लग पाई।
आर्च (एक्शन रिसर्च इन कम्यूनिटी हेल्थ एंड डिवेलपमेंट), लिबर्टी इंस्टीट्यूट और कुछ अन्य एनजीओज ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। वहां अदालत ने राज्य सरकार की खिंचाई की और मालिकाना साबित करने वाले कई अन्य साक्ष्यों की रोशनी में दावों पर पुनर्विचार का आदेश जारी किया। ऐसे साक्ष्यों में पंचनामा, केस रेकॉर्ड, सरकारी रसीदें और गूगल अर्थ तथा नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी के सैटेलाइट चित्रों तक को शामिल किया गया।
 
12 हजार रुपये का चमत्कार
यहां से समस्या के समाधान का रास्ता खुला। लेकिन खेतों की सीमा और उनका रकबा तय करने में नपाई के त्रिभुजीकरण वाले पारंपरिक तरीके का दबदबा फिर भी कायम रहा। ऐसे में आर्च हाथ में लेकर इस्तेमाल किए जा सकने वाले जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) यंत्र का आइडिया लेकर आया, जो 12 हजार रुपये का आता है। इसे उठाए हुए आदिवासी अपने खेत का एक चक्कर लगाते हैं और बीच-बीच में इसमें लगे बटन दबाते जाते हैं। इससे यंत्र खुद-ब-खुद उनके खेत का नक्शा तैयार कर देता है, जिसमें खेत का अक्षांश-देशांतर और उसका सटीक रकबा दर्ज रहता है। यह तरीका इस्तेमाल करके हर परिवार ने अपनी जोत का नक्शा तैयार किया और उसे ग्रामसभा से प्रमाणित करा लिया। फिर ऐसे सभी नक्शों को 2005 में उतारी गई गांव की सैटेलाइट तस्वीर पर सुपरइंपोज किया गया तो इससे हर जोत के मालिकाने का बिल्कुल सटीक ब्यौरा उपलब्ध हो गया।
जमीन के झगड़े तब पैदा हुए, जब दो ग्रामीणों ने एक ही क्षेत्र पर अपना मालिकाना जताया। ग्रामसभा को कब्जा प्रमाणित करने से पहले ऐसे झगड़ों का निपटारा करना पड़ा। मौजूदा नक्शों को 2005 के नक्शे पर सुपरइंपोज करने से इस कट-ऑफ डेट के बाद हुए कब्जों की असलियत उजागर हो गई और वन विभाग की आशंका भी इससे दूर हो गई। इस प्रकार एक सक्रिय एनजीओ ने एक बहुत बड़ी समस्या का तेज और कारगर समाधान प्रस्तुत किया। इस क्रम में तैयार हुए गांव के नक्शे को इंटरनेट पर अपलोड किया गया, जहां से इसकी एक कॉपी कोई भी ग्रामीण अपने पास के बाजार से निकलवा सकता है। जमीन के दस्तावेजों के लिए सरकारी महकमों पर आदिवासियों की निर्भरता इस तरह एक ही झटके में समाप्त हो गई। इस सेवा के लिए आदिवासियों ने आर्च को प्रति परिवार 60 रुपये दिए, जिससे मशीन पर आया खर्चा भी निकल गया। सरकारी सहायता की इसमें कोई जरूरत नहीं पड़ी। बाद में ग्रामीणों ने जब अपना दावा इस नक्शे के अलावा पंचनामा, और रसीदों वगैरह के साथ पेश किया तो एक गांव में कुल 63 में से 61 और दूसरे में 112 में से 96 दावे मंजूर हो गए। आर्च को उम्मीद है कि सफलता के औसत को वह 90 प्रतिशत तक ले जा सकता है।
इस परियोजना में शुरू से शामिल गांव अब अपने पड़ोसियों को जीपीएस का इस्तेमाल करना सिखा रहे हैं, जिससे आदिवासियों की ताकत और बढ़ रही है। कुल 150 गांव अभी तक इस परियोजना के तहत लाए जा चुके हैं, जो गुजरात के आदिवासी गांवों की समूची तादाद का दसवां हिस्सा है। अगले 18 महीनों में इसका विस्तार ऐसे सभी गांवों तक कर दिया जाएगा। गुजरात के आदिवासियों का कहना है कि औपचारिक मालिकाने से बहुत फर्क पड़ता है। उन्हें अब गैरकानूनी कब्जेदार नहीं समझा जाता। खेती से जुड़ी सभी सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिलता है, और वे चाहें तो मनरेगा के तहत अपने खेतों में कुएं भी खुदवा सकते हैं। पहले तो वन विभाग उन्हें अपने खेतों में ट्रैक्टर तक नहीं ले जाने देता था। लेकिन मालिकाना मिल जाने के बाद 90 फीसदी खेतों की जुताई ट्रैक्टरों से होने लगी है, जो हल-बैल की तुलना में यह काम कहीं जल्दी और सस्ते में कर देते हैं।
 
पूरे देश में फैलाएं
इस तजुर्बे का विस्तार वनों की बहुलता वाले सभी राज्यों में जल्द से जल्द किया जाना चाहिए। लिबर्टी इंस्टीट्यूट और आर्च इसके लिए इन राज्यों में सक्रिय एनजीओज से संपर्क कर रहे हैं। कुछ मार्क्सवादी और 'रूमानी पशुचारी' व्यक्तिगत मालिकाने की धारणा को ही खारिज करते हुए इसके विरोध में हैं, लेकिन बाकियों का समर्थन उन्हें मिल रहा है। इस जीपीएस तकनीकी का इस्तेमाल पूरे देश के जमीनी दस्तावेज दुरुस्त करने में किया जा सकता है। हालांकि इसके लिए बहुत सारे झगड़े सुलझाने की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि जमीन को लेकर झगड़े हमारे देश में हर तरफ फैले हुए हैं। बहरहाल, इसमें कोई शक नहीं कि यह तरीका है बड़े काम का।
 
 
- स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स
स्वामीनाथन अय्यर

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