बांस से होगा संतुलित हरित विकास

देश भर में अनेक मामलों में खराब नीतियों और बदलाव की धीमी गति को देखते हुए सुधार की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस संबंध में ऐसे सुधार आवश्यक हैं जो व्यापक पैमाने पर और जरूरी रफ्तार से अपना असर छोड़ सकें। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम है।

मैं पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हूं कि आखिर क्यों बांस को घास की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? क्योंकि यह घास की तरह पनपता है, इसकी उत्पादकता बहुत ज्यादा है तथा इसे कई तरह के कामों में इस्तेमाल किया जाता है इसलिए जाहिर तौर पर इसमें बहुत अधिक आर्थिक संपन्नता लाने की क्षमता है। ऐसे में अगर लोगों को बांस उगाने, उसे काटने और अपनी मर्जी से उसका इस्तेमाल करने की अनुमति दी जाती है तो दरअसल उनके हाथों में एक तरह से संपत्ति ही सौंपी जाती है।

भारतीय वन अधिनियम ने लगातार बांस को इमारती लकड़ी के रूप में परिभाषित किया। इसका साफ मतलब था कि वन विभाग का इस पर एकाधिकार होना ही था। जो लोग अपने घरों के पिछवाड़े बांस उगाते, उन्हें बगैर वन विभाग की अनुमति के इसे काटने और बेचने का अधिकार नहीं था।

गांवों तथा वनों के रहवासियों को तभी अपना बांस काटने की अनुमति मिल पाती जब वे कई लोगों की हथेलियां गर्म करते और लंबी जद्दोजहद करते। अधिकांश राज्यों में किसी वृक्ष मालिक को बांस काटने के लिए 'पारगमन पास' की आवश्यकता होती है। इसके तहत वृक्ष मालिकों को राजस्व संबंधी दस्तावेजों के साथ जिलाधिकारी अथवा वन विभाग के अधिकारियों से बांस काटने की अनुमति हासिल करनी होती है।

इस प्रक्रिया में उसे लगभग 10 अलग अलग विभागों की अनुमति लेनी होती है और विभिन्न 'मुख्यालयों' के चक्कर काटने होते हैं। ऐसे में यही तरीका बचता है कि किसी ऐसे ठेकेदार की खोज की जाए जो यह सारा काम सुचारू ढंग से करवा सके। इस दौरान वृक्ष के स्वामी का हक मारा जाता है। वृक्ष अथवा घास को आय बढ़ाने वाली गतिविधि के रूप में किसी तरह का प्रोत्साहन भी हासिल नहीं हो पाता और ऐसे में कोई वृक्ष नहीं उगाता और पर्यावरण का नुकसान होता है।

अब यह सारा कुछ बदल सकता है। रमेश के पत्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वन अधिकार अधिनियम ने बांस को उगाने और उसे बेचने या इस्तेमाल करने संबंधी पुराने नियमों में बदलाव लाया है। वर्ष 2006 में पास इस अधिनियम के तहत, 'लघु वन उपज का स्वामित्व, उसे एकत्रित करने, इस्तेमाल करने और निपटाना आदि तमाम अधिकार आदिवासियों और पारंपरिक वनवासियों को रहेंगे।'  इस अधिनियम में बांस को भी लघु वन उपज के रूप में चिह्नित किया गया है। रमेश ने अपने पत्र में मुख्यमंत्रियों से कहा है कि वे सभी अपने वन प्रशासन को निर्देश दें कि बांस को लघु वन उपज माना जाए और उपरोक्त समुदायों के अधिकारों का सम्मान किया जाए।

देश के पेपर उद्योग को भारी मात्रा में कच्चे माल की आवश्यकता होती है और बांस लुगदी का सबसे बढिय़ा स्त्रोत है। बीते समय के दौरान जब बांस को इमारती लकड़ी के रूप में परिभाषित किया गया था, तब उद्योग जगत और वन विभाग ऐसे समझौते करते आए जिसके तहत उद्योग जगत को बांस तथा अन्य लकडिय़ां नगण्य कीमत पर उपलब्ध हो जाया करती थीं। वनक्षेत्रों का बड़ा हिस्सा उद्योग जगत को लीज पर दे दिया गया। इसकी वजह से वनों का तेजी से क्षरण हुआ और उद्योग जगत को होने वाली कच्चे माल की आपूर्ति में कमी आई। इस नीति के चलते किसानों द्वारा उगाए जाने वाले वृक्षों के मूल्य में कमी आई। देश के कागज और लुगदी उद्योग को कच्चे माल की आपूर्ति के लिए 15 लाख हेक्टेयर वृक्षों और बांसों की आवश्यकता है।

अब सामुदायिक वन अधिकार मिल जाने के बाद उद्योग जगत छोटे भूमालिकों अथवा ग्रामीणों से इसकी आपूर्ति कर सकता है। अब इसके लिए उन्हें बाजार मूल्य के अनुसार दाम चुकाने होंगे जिससे कच्चे माल की कीमतों में मामूली इजाफा होगा। लेकिन इसके साथ ही खरीदार और विक्रेता के बीच सीधे संबंध की वजह से पैसा सीधे लोगों के हाथ में आएगा। इस तरह बांस उगाना इन समुदायों के लोगों के लिए फायदे के सौदे में तब्दील हो जाएगा।

इस तरह अर्थव्यवस्था को बगैर रोजगार के विकास की भूमिका से बाहर लाया जा सकेगा। यह विकास का वह नया हरित मॉडल होगा जिसकी दुनिया बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही है।

- सुनीता नारायण