दान की महान परंपरा

प्रसिद्ध उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने समृद्ध और गहन सामाजिक सरोकारों का परिचय देते हुए महादान का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। दुनिया के 28वें तथा देश के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अमीन अजीम प्रेमजी ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए 8846 करोड़ रुपयों का दान देकर दान परंपरा को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने 21.3 करोड़ शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को देने की घोषणा की है। यह राशि विप्रो में उनकी हिस्सेदारी का लगभग 11 फीसदी है। अजीम प्रेमजी ट्रस्ट उत्तराचल, राजस्थान व कर्नाटक के दो-दो जिलों में 25 हजार स्कूलों को सहायता प्रदान कर चुका है। इससे ढाई लाख बच्चे लाभान्वित हुए हैं। उन्होंने गरीब छात्रों के लिए विश्वविद्यालय की स्थापना भी की है। एक दशक पहले 750 करोड़ रुपयों से शुरू किए गए इस ट्रस्ट में ही यह विशाल राशि हस्तांतरित की जाएगी। प्रेमजी का इरादा इन शेयरों के लाभाश से मिलने वाली एक हजार करोड़ रुपयों की धनराशि से देश के 50 जिलों में प्राथमिक शिक्षा का स्तर उठाना है।

अजीम प्रेमजी की इस महादानिक परंपरा के विस्तार से भारतीय उद्योग जगत में अमीरों के सामाजिक दायित्वबोध का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है। पिछले दिनों गॉर्डन एंड बीटी मूर फाउंडेशन, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन तथा वारेन बफेट द्वारा अपनी अकूत संपत्ति को समाज हित में खर्च करने की घोषणा से राजनयिकों तथा उद्योगपतियों के सामाजिक उत्तरदायित्वों की काफी चर्चा रही थी। लगभग इसी कालखंड में उद्योगपति रतन टाटा द्वारा अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को ढाई अरब, आनंद महिंद्रा द्वारा 20 करोड़ तथा अनिल अग्रवाल फाउंडेशन द्वारा उड़ीसा की वेदांता यूनिवर्सिटी को एक अरब डॉलर देकर एक सार्थक चर्चा को जन्म दिया है।

आज मुद्दा यह है कि आखिर अन्य अमीर लोग तथा उद्योगपति देश की तमाम सामाजिक समस्याओं तथा सामाजिक व शैक्षिक सस्थाओं के ढांचागत सुधार के प्रति उदासीनता क्यों बरत रहे हैं? पिछले कुछ वर्षों से फो‌र्ब्स-500 की सूची में आने वाले भारतीय अरबपतियों की सख्या लगातार बढ़ रही है। देश में कुछ ऐसे अमीर हैं, जिनकी बहुमजिली आवासीय इमारत का एक माह का बिजली बिल 70-75 लाख रुपये आता है। दूसरी ओर देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले करीब 37 फीसदी लोग ऐसे हैं जिन्हे एक समय का भोजन भी मयस्सर नहीं है। बेरोजगारी और कुपोषण की स्थिति भी बदतर है। सच्चाई यह है कि देश में अरबपतियों की बढ़ती सख्या और प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण इत्यादि के साथ बढ़ता आतंकवाद तथा नक्सलवाद जैसी सामाजिक समस्याएं अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ते फासले का ही दुष्परिणाम हैं। भारत के लोकमन से जुड़ा दार्शनिक तथ्य यह है कि देश व समाज से सुख-सुविधा, शिक्षा, संपन्नता व अन्य भौतिक साधन प्राप्त करने के बाद हम इसे कितना हिस्सा वापस करते हैं। इसी दर्शन के तहत भारतीय जीवन पद्धति में त्याग, तप, दया, सेवा, धर्म, कर्म, दर्शन व आध्यात्मिकता का प्राधान्य मिलता है।

भारत में दान को जीवन पद्धति का एक आवश्यक अंग माना गया है। हिंदू, इस्लाम, सिख, ईसाई, बौद्ध व जैन इत्यादि सभी पंथों के ग्रंथों में दान की महिमा का बखान है। दानवीर कर्ण ने तो इसके लिए अपनी जान खतरे में डाल दी थी। यही कारण है कि अमीर लोगों व औद्योगिक घरानों द्वारा लोक कल्याण के  कार्य पर उदारतापूर्वक खर्च करने अथवा समाज के प्रति ऋण से उऋण होने की भावनात्मक परंपरा भारत से ही शुरू होती है।

आज सड़क, पानी, बिजली व प्राथमिक शिक्षा की दुर्दशा पर आंसू बहाने तथा इन्हें सुधारने के अनेक वायदे किए जाते हैं। यह कटु सच्चाई है कि देश में उच्च व तकनीकी शिक्षा का ढांचा चाहे जितना बेहतर हो, स्वास्थ्य, बुनियादी शिक्षा, सड़क, स्वच्छ जल व बिजली इत्यादि बुनियादी जरूरतों से जुड़ा ढांचा अभी भी बहुत कमजोर स्थिति में है। देश की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी सवेदनाएं व ढांचागत सुविधाओं से जुड़ी त्वरित कार्यवाही का फंडा किसी भी विधानसभा व संसद के एजेंडे में शामिल नहीं है।

ऐसे में अजीम प्रेमजी का यह सकारात्मक व रचनात्मक कदम प्रशंसनीय कहा जाना चाहिए। प्रेमजी ने देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए जो रकम दी है, वह केंद्रीय बजट में शिक्षा के लिए आवंटित धन का लगभग 28.5 फीसदी है। इसलिए सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यह धन निश्चित ही ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की हालत सुधारने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि देश के अनेक स्कूल आज भी ढांचागत सुविधाओं व शिक्षकों की कमी के चलते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। शिक्षा के अधिकार से जुड़ा कानून भी देश का कोई बहुत भला नहीं कर पा रहा है। शिक्षा सरकार की वरीयता सूची से बाहर होती जा रही है।

-विशेष गुप्ता