राज्यपालों की जरूरत ही क्या

राज्यपालों का पद कितना महत्वहीन हो गया है, इसका पता इससे चला कि केंद्रीय गृह मंत्रलय के एक अफसर ने कुछ राज्यपालों को पद छोड़ने के लिए कहा। इनमें से कुछ ने इस अफसर की बात मान भी ली। कुछ अभी भी त्यागपत्र न देने पर अड़े हुए हैं। इस पर गौर करें कि जो अड़े हैं उनमें अधिकतर नेता हैं। कुछ लोग इस पर हैरत जता रहे हैं कि आखिर केंद्रीय गृह सचिव राज्यपालों को पद छोड़ने के लिए कैसे कह सकते हैं? कुछ इसे लेकर चिंतित हैं कि मोदी सरकार तो वही काम कर रही है जैसा मनमोहन सरकार ने किया था। पता नहीं इनकी चिंताओं से मोदी सरकार प्रभावित होगी या नहीं, लेकिन यह साफ है कि राज्यपाल पद की बची-खुची गरिमा में पलीता लग रहा है। विभिन्न राज्यपाल जिस तरह दिल्ली की दौड़ लगा रहे हैं उससे यह स्पष्ट है कि वे अपनी नौकरी बचाने की जुगत भिड़ा रहे हैं।
 
कहने को यह संवैधानिक पद है, लेकिन राज्यपालों के पास कोई भी ढंग का काम नहीं है। अगर राज्यपाल न हों तो किसी का काम रुकने वाला नहीं है। केंद्र सरकार अपने अन्य प्रतिनिधियों के जरिये वे सारे काम करा सकती है जो अभी तक राज्यपाल करते आ रहे हैं। राज्यपालों के कुछ अधिकार संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश को सौंपे जा सकते हैं। यदि किन्हीं कारणों से राज्यपाल पद समाप्त करने में कोई अड़चन हो तो फिर तीन-चार राज्यपालों से सारा काम लिया जा सकता है। एक राज्यपाल दक्षिण के राज्यों को देखे, दूसरा उत्तर के, तीसरा पूवरेत्तर के और चौथा पश्चिम के राज्यों को। आखिर जो काम चार राज्यपाल कर सकते हैं उसके लिए 29 राज्यपालों की क्या जरूरत? यदि अतिरिक्त कार्यभार के रूप में कोई राज्यपाल दो-तीन राज्यों का काम देख सकता है तो चार राज्यपाल 29 राज्यों की कथित संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह क्यों नहीं कर सकते?
 
राज्यपाल नई सरकार के गठन के समय मुख्यमंत्री और उसके मंत्रियों को शपथ दिलाते हैं, लेकिन यह कोई ऐसा काम नहीं जिसके लिए राज्यपाल पद आवश्यक हो। राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, लेकिन विश्वविद्यालयों में वही होता है जो राज्य सरकारें चाहती हैं। हां, विश्वविद्यालयों को राज्यपाल के रूप में अपने कार्यक्रमों के लिए एक मुख्य अतिथि अवश्य मिल जाता है, लेकिन आखिर ऐसे अतिथि को भारी भरकम वेतन और अन्य सुविधाओं के साथ विशालकाय एवं हर तरह की सुविधाओं से युक्त भवनों यानी राजभवनों में रहने का अवसर क्यों दिया जाना चाहिए? चूंकि राज्यपालों के पास कोई काम नहीं होता इसलिए वे या तो विभिन्न कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनते हैं या फिर जब-तब सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की शिकायतें सुनते हैं।
 
राज्यपाल एक काम और करते हैं और वह होता है राज्य सरकारों को परेशान करने का। आम तौर पर ऐसा वे केंद्र सरकार के इशारे पर ही कर पाते हैं। अगर केंद्र सरकार यह चाहती है कि किसी राज्य सरकार द्वारा पारित कोई विधेयक आगे न बढ़ने पाए तो महामहिम उसे दबाकर बैठ जाते हैं। राज्यपाल का विवेक वस्तुत: केंद्र सरकार के पास बंधक होता है। वह बात-बात पर गृहमंत्रलय का मुंह ताकता है और उसकी मर्जी के बगैर कुछ भी करने की स्थिति में नहीं होता। एक वक्त था जब राज्यपाल के पदों पर कुछ ऐसे लोग बैठे जो आदर और सम्मान के पात्र होते थे, लेकिन बाद में तमाम राज्यपालों ने ऐसे आचरण किए कि वे केंद्रीय सत्ता के एजेंट और पिट्ठू कहे जाने लगे। 1984 में जब आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल ने एनटी रामाराव की सरकार गलत तरीके से बर्खास्त की तब रामलाल नाम ही हेय बन गया था। बाद में ऐसी ही कुख्याति रोमेश भंडारी और बूटा सिंह ने भी अर्जित की। रोमेश भंडारी ने उत्तर प्रदेश में एक दिन का मुख्यमंत्री बनाया तो बूटा सिंह ने बिहार में सरकार गठन की संभावनाएं उभरते ही विधानसभा भंग कर दी। यह काम केंद्र के इशारे पर किया गया और इसके लिए तबके राष्ट्रपति को मास्को में रात को सोते से उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने जब बूटा सिंह के फैसले की बखिया उधेड़ी तो केंद्र सरकार को उन्हें हटाना पड़ा।
 
अब सारा देश यह देखेगा कि जो कमला बेनीवाल गुजरात में बतौर राज्यपाल मोदी सरकार से लोहा लेती रहीं वह केंद्र में सत्ता बदल जाने के कारण आनंदीबेन सरकार के समक्ष किस तरह मोम बनी नजर आएंगी। वह वे सारे काम खुशी-खुशी करेंगी जो कुछ समय पहले तक करने से इन्कार करती रहीं। हालांकि राज्यपाल केंद्र की इच्छा से ही काम करता है, लेकिन उसके पास एक विधिक सलाहकार भी होता है। इसके अतिरिक्त उनके पास अन्य बहुत से अधिकारी और कर्मचारी होते हैं। भारत जैसे गरीब देश में यह फिजूलखर्ची ही नहीं, एक किस्म का अपराध भी है।
 
कल्पना कीजिए कि अगर 29 राज्यों का काम चार राज्यपाल करने लगें तो शेष 25 राजभवनों का कितना बेहतर उपयोग हो सकता है? उन्हें बड़ी आसानी से अस्पतालों अथवा शिक्षा संस्थानों में तब्दील किया जा सकता है। भारत जैसे गरीब देश में रिटायर्ड नेताओं और नौकरशाहों को महामहिम बनाना और उन पर करोड़ों रुपये खर्च करना लोकतंत्र की भावना के सर्वथा प्रतिकूल है। लोकतंत्र और संसदीय परंपराओं के प्रतिनिधित्व और देश-दुनिया को भारतीय गणतंत्र की आभा दिखाने के लिए एक राष्ट्रपति और उनका राष्ट्रपति भवन पर्याप्त है। बेहतर हो कि लीक से हटकर काम करने वाली मोदी सरकार 29 न सही तो 25 राज्यपालों से तो मुक्ति पाए ही। राज्यपालों के सभी या कम से कम 25 पद खत्म किए जाने से उन लोगों के अलावा किसी को तकलीफ नहीं हो सकती जो या तो राजभवनों में विलासी जीवन जी रहे हैं या फिर ऐसा जीवन जीने की चाहत लिए हुए हैं।
 
 
- राजीव सचान (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
साभारः दैनिक जागरण