सरकारी शिक्षा का सच

शिक्षा जीवन की ऐसी कड़ी है, जहां से तरक्की और खुशहाली के सारे रास्ते खुलते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आर्थिक उन्नति का आधार भी शिक्षा ही है, लेकिन यही शिक्षा अगर मजाक बनकर रह जाए तो क्या कहिएगा?

उत्तराखंड में तो ऐसा ही प्रतीत होता है। इसकी तस्दीक कर रही है असर (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन) की हालिया रिपोर्ट। सूबे के नौ जनपदों के 250 गांवों के 5092 परिवारों में किया गया यह सर्वे बताता है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का मतलब सिर्फ ‘मिड-डे मील’ का ‘दाल-भात’ छकना ही रह गया है। कैसी विडंबना है कि जिस उत्तराखंड का यशोगान नीति-नियंता ‘देवभूमि’, ‘भारत का भाल’, ‘आध्यात्मिक गुरु’ जैसी उपमाओं से करते नहीं अघाते, उसी उत्तराखंड में आठवीं कक्षा के 19 फीसद बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ पढ़ने में भी सक्षम नहीं। 65 फीसद बच्चे गणित में भाग के सवाल नहीं कर सकते, जबकि तीसरी कक्षा के 70 फीसद से अधिक बच्चों को साधारण घटाने के सवालों का भी ज्ञान नहीं। यह हाल तब है, जब मोटी तनख्वाह लेने वाले शिक्षकों की फौज इन बच्चों को प्रशिक्षित कर रही है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस बदहाली के लिए जिम्मेदार कौन है। शिक्षा, शिक्षा व्यवस्था या सरकार। असल में देखा जाए तो शिक्षा से जुड़े हमारे सारे अंग बेकार पड़ चुके हैं। शिक्षकों को अगर कोई चिंता है तो वेतन-भत्तों की। दुर्गम से सुगम में आने की। तबादले रुकवाने की। इसके अलावा जैसे उन्हें कुछ सूझता नहीं ही नहीं। यही वजह है कि शहर और शहर से लगे स्कूल ओवर स्टॉफ में दबे जा रहे हैं, जबकि दूरदराज के स्कूलों में ताला खोलने वाला तक कोई नहीं। सूबे में सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं, जहां बच्चे आते हैं, दाल-भात खाते हैं और फिर घर की राह पकड़ लेते हैं। अभिभावकों की मजबूरी यह है कि उनके पास बच्चों को इन स्कूलों में भेजने के सिवा कोई विकल्प नहीं। सो, खामोश रहकर तबाह होते भविष्य टुकर-टुकर निहार रहे हैं।

 

साभारः दैनिक जागरण

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