सरकारी पैसे से निजी प्रचार

सरकारी विज्ञापनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पहल बेहद महत्वपूर्ण है। उसने एक तीन सदस्यीय समिति गठित की है, जो अखबारों और टीवी में आने वाले सरकारी विज्ञापनों को लेकर दिशा-निर्देश बनाएगी ताकि इस मामले में सार्वजनिक धन का दुरुपयोग रोका जा सके। समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है। कोर्ट ने कुछ गैर सरकारी संगठनों की याचिका पर यह आदेश दिया। वैसे यह मुद्दा काफी समय से उठता रहा है।
 
विपक्ष सरकार पर अपने प्रचार के लिए पब्लिक के पैसे उड़ाने का आरोप लगाता रहा है। लेकिन विडंबना यह कि सत्ता में आने के बाद विपक्ष ने भी ठीक ऐसा ही किया। जनतंत्र में सरकार का जनता के प्रति अपना फर्ज निभाने के लिए प्रचार का सहारा लेना एक स्वस्थ परंपरा है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह जनता को जागरूक बनाए और उसे जरूरी बातों की जानकारी देने के लिए, संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रचार करे। जैसे, वह सामाजिक समानता और सौहार्द बढ़ाने वाले, वोटरों को वोट डालने की प्रेरणा देने वाले, या डेंगू से बचाव के उपायों की जानकारी देने वाले विज्ञापन जारी कर सकती है। पर हमारे देश में इस नाम पर भी सियासत होती रही है।
अक्सर पीएम या सीएम की इमेज चमकाने के लिए सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल होता है। विभिन्न मंत्रालयों की तरफ से संबंधित मंत्री का रुतबा बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े इश्तहार दिए जाते हैं। अकसर उन बातों का भी प्रचार किया जाता है, जो कि कार्यपालिका के निहायत जरूरी या रुटीन किस्म के काम हैं। जैसे जनता को सड़क या पुल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इन बातों को भी अमुक जी या तमुक जी की लंबी-चौड़ी तस्वीरों के साथ कुछ इस तरह पेश किया जाता है, जैसे उनकी कृपा से कोई असाधारण काम संपन्न हो गया हो, या जनता पर कोई अहसान कर दिया गया हो। इस तरह सरकारी विज्ञापन निजी विज्ञापन में बदल जाता है। खासकर चुनाव करीब होने पर तो ऐसे विज्ञापनों की भरमार हो जाती है।
 
सत्तारूढ़ दल जनता के पैसे से अपना चुनावी प्रचार भी कर लेते हैं। सरकारी विज्ञापन मीडिया को प्रलोभन देने या उसकी राय को प्रभावित करने का जरिया भी बन जाता है। नौकरशाही इसमें अपने तरीके से खेल करती है। विज्ञापन किस संस्थान को किस आधार पर कितने अनुपात में दिया जाएगा, इसका कोई नियम नहीं है। इसका नतीजा यह हुआ है कि कुछ पत्र-पत्रिकाएं सिर्फ सरकारी विज्ञापन हड़पने के लिए ही निकलती हैं। वे कितनी संख्या में प्रकाशित होती हैं, कहां जाती हैं किसी को नहीं मालूम। शिलान्यास या उद्घाटन जैसे आयोजनों की सूचना भी अखबारों में फुल पेज में दी जाती है, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं होती। ऐसा वे सरकारें करती हैं जो जरूरी कामों के लिए भी धन की कमी का रोना रहती हैं। समिति को इन तमाम पहलुओं पर विचार करना चाहिए और केंद्र-राज्य, दोनों स्तरों पर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि सरकारी प्रलाप बंद हो और केवल सार्थक विज्ञापन आएं।