छोटे मसलों से बनती सरकारें

क्या भारतीय मतदाता सरकार बदलने का फैसला बड़े मुद्दों के आधार पर करता है? जी नहीं। उसका उनसे कोई लेना-देना नहीं होता। वह सड़क, पानी, सामान्य प्रशासन जैसी उन बातों के आधार पर सत्ता बदलता है जो उसके दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं।

चुनाव के शब्दकोष में सबसे लोकप्रिय शब्दावली है ‘सत्ता विरोधी रुझान’ जिसे अंग्रेजी में एंटी इन्कमबेंसी कहा जाता है। एंटी इन्कमबेंसी की हर व्यक्ति के पास अपनी-अपनी परिभाषा है, लेकिन मुझे लगता है कि यह मतदाताओं के दिमाग में इस विचार का कोड वर्ड है, ‘अब बहुत हो गया है। मैं इतने घटिया शासन से थक गया हूं। अब इसे जाना चाहिए।’

पिछले हफ्ते मुझे इसका प्रमाण भी मिल गया। मेरी एक पड़ोसी ने मुझसे कहा, ‘मैंने पिछली बार कांग्रेस को यह सोचकर वोट दिया था कि वह थोड़ी अलग होगी, लेकिन कांग्रेसी भी वैसे ही निकले जैसे उनके पूर्ववर्ती थे। इसलिए मैं इस बार अपना वोट किसी और को दूंगी और मैं सत्ता में परिवर्तन तब तक करती रहूंगी जब तक कि मैं जो चाहती हूं, वह मुझे नहीं मिल जाता।’ मेरी वह पड़ोसी अपनी सरकार से बहुत ही छोटी-सी चीज चाहती है।

वह बस इतना चाहती हैं कि लाल बत्ती को पार करके स्कूटर चलाने वाले व्यक्ति को पकड़ने के लिए रोड पर कोई पुलिसवाला हो, वह चाहती है कि सरकारी स्कूल में शिक्षक अपनी पूरी ड्युटी करें, वह चाहती है कि उसके टैंक का नल अचानक बंद न हो जाए, वह चाहती है कि उसके उस मामले में सेशन जज ईमानदारी से फैसला दें जिसमें उसका भतीजा उसकी जायदाद हड़पना चाहता है। जब मेरी पड़ोसी प्रशासन की बात करती है, तब वह केवल इतना सोचती है कि सरकार उसकी दिन-प्रतिदिन की जीवनचर्या को कैसे प्रभावित करती है। वह कानून-व्यवस्था के बारे में सोचती है, पेयजल, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और गड्ढे विहीन सड़कों के बारे में सोचती है। मतदाताओं के इसी व्यवहार को चुनावी पंडित सत्ता विरोधी रुझान मानते हैं, जबकि वह केवल अपने अधिकारों की बात कर रही है।

कई अन्य भारतीयों की तरह पहले मैं भी सोचा करता था कि भारतीय मतदाता बड़े मसलों जैसे समाजवाद, पूंजीवाद, धर्म और जाति के आधार पर वोट देते है, लेकिन अब मुझे एहसास हुआ है कि मतदान में बड़ी बातों का कोई महत्व नहीं होता। छोटी बातें ही ज्यादा मायने रखती है। दैनिक बातों में सरकार की विफलता या सफलता के ही मायने हैं। कई बार इस बात से कोफ्त होती है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में हमारे लोकसेवकों की विफलता से रोज की जिंदगी में आम लोगों की परेशानियां कितनी बढ़ जाती हैं। चूंकि हमारे नौकरशाह जवाबदेह नहीं है, इसलिए हमारा प्रशासन भी कमजोर होता है और इसी वजह से हमारे सार्वजनिक संस्थान भी असफल हो जाते हैं। हमें लगता होगा कि हमारे नेता कभी तो इसे समझेंगे और कुछ करेंगे, लेकिन इसके बावजूद वे अब भी केवल हिंदुत्व, दलितों, पिछड़े वर्गो, और भारत-अमेरिका एटमी करार के बारे में ही बात करते हैं।

2004 का चुनाव भाजपा इसलिए नहीं हारी थी कि उसका ‘शाइनिंग इंडिया’ का नारा फेल हो गया। आरएसएस का यह मानना गलत था कि भाजपा इसलिए चुनाव हारी क्योंकि उसने हिंदुत्व के नारे को भुला दिया। धर्मनिरपेक्षवादियों का भी यह सोचना गलत था कि भाजपा को हिंदुत्व और गुजरात की कीमत चुकानी पड़ी। वामपंथी भी इस सोच में गलत थे कि मतदाताओं ने भाजपा को उसकी गलत आर्थिक नीतियों की सजा दी। दरअसल एनडीए इसलिए हारा क्योंकि वह प्रशासन में कमजोर रहा।

बिजली, सड़क और पानी जैसे शब्द अब धीरे-धीरे हमारे राजनीतिक शब्दकोष में आते जा रहे हैं और वे अंतत: मंदिर, मस्जिद और मंडल का स्थान ले लेंगे। जब मध्यमवर्ग के लोगों की संख्या 50 फीसदी तक हो जाएगी, तब राजनीति पूरी तरह बदल जाएगी। 1980 के दशक में मध्यम वर्ग की संख्या कुल आबादी में महज आठ फीसदी थी। आज यह संख्या करीब 29 फीसदी है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार 2020 तक आधी आबादी मध्यम वर्ग की हो जाएगी (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों को छोड़कर)। तब मध्यमवर्ग के वोट मायने रखेंगे और उनके मुद्दे भी। तभी राजनीतिक दल, बिजली, पानी, सड़क जैसे मुद्दों पर अपना प्रचार अभियान चलाएंगे।

-गुरचरन दास

गुरचरण दास