भारत के सरकारी स्कूलोँ में प्रतिवर्ष घट रही है लाखों छात्रोँ की संख्या, क्यों?

● प्राइवेट स्कूल लर्निंग आउटकम के मामले में सरकारी स्कूलोँ से ज्यादा आगे नहीं हैं
● तो सरकारी स्कूलोँ में होने वाले दाखिलों में गिरावट क्यों देखने को मिल रही है?

वर्ष 2010-11 में, 4,435 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन पर 486 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इन सभी स्कूलोँ में 14,000 शिक्षक अधिक थे। और इन सभी 4,435 स्कूलोँ में पढ़ने वाले बच्चोँ की कुल संख्या करीब शून्य थी।

वर्ष 2015-16 में, यह खर्च घटकर 152 करोड़ रुपये हो गया। शिक्षकोँ की संख्या घटकर 6,961 हो गई, यानि की इनकी संख्या में 50% तक गिरावट आ गई, जबकि सरकारी स्कूलोँ की संख्या में 5,044 की बढ़ोत्तरी हुई।

2010 से 2015 के बीच पूरे पांच साल में, सरकार ने ऐसे स्कूलोँ पर 1,000 करोड़ रूपये से भी अधिक खर्च किया, जहाँ छात्र ही नहीँ थे। शिक्षकोँ को ऐसी कक्षाएँ अटेंड करने के लिए वेतन दिया जाता रहा जिनमेँ कोई शिष्य ही नहीं थे। राज्यों ने वर्षोँ तक खाली कक्षाओँ पर पैसे खर्च किए। ऐसे में न सिर्फ नियुक्त शिक्षकोँ की कुशलता बेकार गई, बल्कि तमाम राज्य सरकारोँ द्वारा ऐसे स्कूलोँ की हालत सुधारने के लिए कोई उपाय भी नहीं किया गया जहाँ छात्रोँ की संख्या लगातार कम हो रही थी।


दुख की बात यह है कि यह सिर्फ सरकारी स्कूलोँ की डूबती नईया का एक नमूना भर है, जो धीरे-धीरे सतह में धंसती जा रही है। चूंकि इन स्कूलोँ के बच्चोँ के सीखने का आउटकम खराब है, जैसा कि नेशनल अचीवमेंट सर्वे -2017 के आंकड़ों के द्वारा बयां होता है, वे अपने आप को प्राइवेट स्कूलोँ से प्रतिस्पर्धा की स्थिति में पाते हैं।
यह स्पष्ट है कि प्राइवेट स्कूल शिक्षा के बेहतर अनुभव प्रस्तुत कर रहे हैं, छात्र-शिक्षक का अनुपात यहाँ बेहतर है, सीखने की प्रभावी पद्धति है, और बेहतरीन संसाधन यहाँ उपलब्ध हैं। यही वजह है कि माता-पिता अपने बच्चोँ को सरकारी स्कूलोँ से निकाल कर प्राइवेट स्कूलोँ में भेज रहे हैं। ग्रामीण व शहरी दोनोँ इलाकोँ में समान विस्तार के चलते, प्राइवेट स्कूल राज्य सरकार के स्कूलोँ के मुकाबले अधिक बच्चोँ को एडमिशन दे रहे हैं।

जब बात सीखने के परिणामोँ की आती है, तब प्राइवेट स्कूलोँ के बच्चे न सिर्फ सरकारी स्कूलोँ के बच्चोँ से आगे रहते हैं। नेशनल अचीवमेंट सर्वे 2017 के अनुसार सरकारी स्कूलोँ के कक्षा 3 से 8वीँ तक के बच्चोँ का महत्वपूर्ण विषयोँ जैसे कि गणित, विज्ञान और विभिन्न भाषाओँ के मामले में प्रदर्शन में लगातार गिरावट आ रही है। यह स्थिति तब है जब ‘राइट टु एजुकेशन’ मिड डे मील और राज्य सरकार द्वारा तमाम इंसेंटिव यह सोचकर शुरू किए गए थे कि सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ का नामांकन बढ़ेगा।

इस रिपोर्ट के लिए आंकड़ें हमने ‘द प्राइवेट स्कूलिंग फिनॉमिना इन इंडिया: ए रिव्यू से लिया है जो कि गीता गांधी किंगडन, आईओई, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन व आईजेडए द्वारा मार्च 2017 में तैयार की गई थी।

2010-11 से लेकर 2015-16 के बीच, बहुत सारे राज्योँ के सरकारी स्कूलोँ में में छात्रोँ के पंजीकरण में गिरावट दर्ज की गई है। आंध्र प्रदेश, जहाँ के आधे बच्चे सरकारी स्कूलोँ में एनरोल्ड थे वहाँ भी पिछ्ले पांच वर्षोँ में सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ की संख्या में 0.8 मिलियन की गिरावट आई है। असम और बिहार के सरकारी स्कूलोँ में जहां कि नामांकन का प्रतिशत सर्वाधिक है, वहाँ इस संख्या में बढ़ोत्तरी देखी गई। असम में जहाँ 0.05 मिलियन बच्चे बढ़े वहीँ बिहार में नामांकन में 2 मिलियन की बढ़ोत्तरी हुई। स्पष्ट है, यह संख्या आरटीई की सफलता की गारंटी नहीं हैं, क्योंकि लर्निंग आउटकम की रिपोर्ट बिहार में सरकारी शिक्षा की खराब हालत दिखाते हैं। गुजरात में भी बदलाव धीमी गति से आ रहा है, पिछले 5 सालोँ में यहाँ के सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ की संख्या में 0.1 मिलियन की कमी आई। छत्तीसगढ़ में कुल एनरोलमेंट में 0.5 मिलियन की कमी आई।

कई अन्य राज्योँ में भी पिछ्ले पांच वर्षोँ के दौरान छात्रोँ के एनरोलमेंट में काफी गिरावट आई। हरियाणा में 0.4 मिलियन की, हिमाचल प्रदेश में 0.16 मिलियन की, जम्मू और कश्मीर में 0.18 मिलियन की, झारखंड में 0.86 मिलियन की, केरल में 0.21 मिलियन की, मध्य प्रदेश में 2.6 मिलियन की, महाराष्ट्र में 1.4 मिलियन की, ओडिसा में 0.6 मिलियन की, पंजाब में 0.09 मिलियन की और कर्नाटक में 2010-11 से 2015-16 के बीच 0.5 मिलियन की गिरावट आई।

हालांकि, अगर कुल संख्या पर गौर किया जाए तो ऐसा लगता है अधिक आबादी वाले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्योँ में इस तरफ अधिक ध्यान भी नहीं दिया गया। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में क्रमशः 3.08 मिलियन और 2.29 मिलियन छात्रोँ की कमी आई है। हालांकि, 2015-16 के आखिर में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 19 मिलियन और 13 मिलियन से भी अधिक एनरोलमेंट हुए थे, जो कि छात्रोँ की संख्या में आई कमी के मुकाबले 5 गुना अधिक है। यहाँ सरकारी से प्राइवेट स्कूलोँ में बच्चोँ का जाना जारी है, लेकिन मौजूदा समय में आबादी इतनी है कि संख्या काफी हो जाती है, ऐसे में सरकारी स्कूलोँ में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के कोई उपाय भी नहीं होते।

हालांकि, कुछ स्कूलोँ में छात्रोँ की संख्या बड़ी चिंता का विषय है। साल 2010-11 में, करीब एक तिहाई स्कूलोँ में 50 से भी कम छात्र थे। अनुमान के मुताबिक, एक मिलियन से भी अधिक सरकारी स्कूलोँ की मौजूदगी में ऐसे स्कूलोँ की संख्या करीब 350,000 है। अकेले 2011 में, 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन का खर्च 21,000 करोड़ रुपये से अधिक था। वर्ष 2015-16 के बीच ऐसे स्कूलोँ की संख्या बढ़कर कुल स्कूलों की संख्या के 40% तक पहुंच गई और खर्च लगभग दोगुना यानि 48,340 करोड़ हो गया।

सामाजिक और भौगोलिक कारकोँ पर गौर किया जाए तो, सरकारी स्कूलोँ के समेकन का विकल्प हर जगह सम्भव नहीं हो सकता है। यहाँ तक प्रति छात्र शिक्षकों की उपलब्धता की संख्या का प्रबंधन भी सही नहीँ है। उदाहरण के तौर पर, 2015-16 में, 20 से कम छात्रोँ वाले हर एक स्कूल में दो-दो शिक्षक थे। स्पष्ट है कि, ऐसे स्कूलोँ में कौशल और विषय सम्बंधी विशेषज्ञता का अभाव महसूस किया गया क्योंकि कोई भी शिक्षक हर विषय में विशेषज्ञ नहीं हो सकता है। अतः ऐसे में खामियाजा प्रायः छात्रोँ को ही भुगतना पड़ता है। चूंकि नेशनल अचीवमेंट सर्वें में 10 पर्सेट सरकारी स्कूलोँ को ही कवर किया गया था, और इस तरह के छात्र-शिक्षक अनुपात में असंतुलन, विशेषज्ञता की कमी और संसाधनोँ के अभाव को देखते हुए लर्निंग आउटकम रिपोर्ट में पाए गए तथ्य वास्तव में और ज्यादा हतोत्साहित करने वाले हो सकते हैं। 

सरकार के लिए चिंता का विषय यह है कि शून्य के बराबर बच्चोँ वाले स्कूलोँ में शिक्षकोँ की संख्या घटकर 7000 तक पहुंच गई है, लेकिन वर्ष 2011-2016 के बीच ऐसे स्कूलोँ की संख्या में 20 पर्सेंट तक की बढ़ोत्तरी हो गई। ऐसे स्कूलोँ की संख्या जहाँ 5 अथवा इससे कम छात्र पढ़ते हैं, में 33 पर्सेंट की बढ़ोत्तरी हो गई, 10 अथवा इससे अधिक छात्रोँ वाले स्कूलोँ की संख्या में 50% की बढ़ोत्तरी हुई, और 20 या इससे अधिक छात्रोँ वाले स्कूलोँ की संख्या में भी 50% तक की बढ़ोतरी हुई। इससे साफ है कि सरकार छोटे सरकारी स्कूलोँ की बढ़ती संख्या पर भी नजर नहीं रख सकी है, और उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्योँ में सरकार स्कूलोँ का समेकन करने में भी असफल रही है।

कोई भी स्कूल उतना ही अच्छा होगा, जितना कि वहाँ के शिक्षक, इसे चलाने वाला प्रशासन, और इन्हेँ आगे बढ़ाने वाली सरकार। शहरी इलाकोँ के सरकारी स्कूलोँ के लिए, संख्या कुछ उम्मीद बढ़ाने वाली हो सकती है, मगर ग्रामीण इलाकोँ के स्कूलों, खासतौर से वे जहाँ कोई छात्र ही नहीं हैं, वहाँ समस्याओँ को तुरंत दूर करने की जरूरत है। शिक्षकोँ को काम करने के लिए छात्रोँ से भरी हुई कक्षाएँ मिलनी चाहिए, न कि खाली कमरे।

इन सभी छोटे स्कूलोँ में उपस्थिति, प्रदर्शन मूल्यांकन, बड़ी कक्षाओँ में प्रमोशन आदि मुद्दे सवालोँ के घेरे में हैं, क्योंकि कोई भी सरकारी स्कूल जहाँ बच्चोँ की संख्या सिर्फ 5 अथवा 50 है वहाँ पढ़ाई अपनाई जाने वाली पद्धति का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है? सरकार के लिए, समस्या का समाधान ऐसे स्थिति में स्कूलोँ के समेकन के विकल्प को गम्भीरता से लेने में निहित है, जिसके लिए बड़े आंकड़ों को आधार बनाकर देश भर में स्कूलोँ की पहुंच की स्थिति को देखा जाना चाहिए और ऐसे सभी छोटे स्कूलोँ के लर्निंग आउटकम का उपयुक्त मूल्यांकन होना चाहिए, ताकि स्कूलों का छात्रों पर पड़ रहे प्रभावों का पता लगाया जा सके और पाठ्यक्रमोँ में सुधार किया जा सके। स्पष्ट है कि छात्रोँ की एक बड़ी आबादी के लिए शिक्षा अर्जित करने का पहला विकल्प बनने के लिए प्राइवेट स्कूलोँ को अभी बहुत लम्बा रास्ता तय करना है , आज भी युवा भारत की सबसे बड़ी उम्मीद सरकारी स्कूलोँ में ही बसती है।

- तुषार गुप्ता

साभारः स्वराज्य मैगजीन

https://swarajyamag.com/ideas/why-are-government-schools-in-india-losing...

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