सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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    दिल्ली सहित देश के 7 राज्यों में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हो चुका है। इस अधिनियम के अनुसार हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह सरकार से उसकी किसी भी गतिविधि, प्रावधान, योजना, आदि से संबंधित कोई सूचना मांग सकता है। प्रशासनिक सुधार की दिशा में यह एक अच्छा कदम है। स्वीडन में पिछले 200 सालों से भी अधिक समय (1776 ई­) से यह अधिनियम लागू है और वहाँ भ्रष्टाचार लगभग नहीं के बराबर है।
    अभी बहुत कम लोगों को इस अधिनियम की जानकारी है, फिर भी कई लोगों और नागरिक समूहों ने इसका उपयोग कर प्रशासनिक भ्रष्टाचार को उजागर किया है और समय

    नये कानूनों के निर्माण की खातिर संसद में विचार हेतु जिन विधेयकों को लाए जाने की कोशिश की जा रही है, उनमें से एक असंगठित क्षेत्र मजदूर विधेयक भी है। इस विधेयक की रूपरेखा असंगठित मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की गई है। अभी तक मजदूरों के कल्याण के लिए जो कानून अस्तित्व में हैं, वह काफी नहीं है। उनकी परिधि में सामान्यत: संगठित क्षेत्र के मजदूर ही आ पाते हैं, परिणामस्वरूप असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इसका कोई फायदा नहीं मिल पाता है। दूसरे श्रम आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जो भी मजदूर वर्तमान सामाजिक सुरक्षा कानूनों (

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