सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने

(आर्थिक खुलेपन, जिसकी शुरुआत 1991 में हुई, के ज़रिये भले ही भारत में समृद्धि आई, लेकिन इसके लिए राजनीतिक जमीन तैयार नहीं हो पाई)

केंद्र सरकार ने हाल ही मे देश का सलाना आर्थिक बजट पेश किया। इसके साथ ही नई आर्थिक नीति को अपनाए हुए लगभग 20 साल पूरे हो गए, जब भारत ने अपनी उन अधिकतर पुरानी आर्थिक नीतियों का त्याग कर दिया था, जिसने 1991 के शुरुआती महीनों में भारत को कंगाली की कगार पर ला खड़ा किया था।

उस वर्ष नाटकीय रूप से उदारीकरण की नीतियों को अपनाने और 1990 के दशक के आखिरी सालों में किए गए कुछ नीतिगत बदलावों को कुछ

भारत आर्थिक सुधार करने में भले ही अफ्रीका से पीछे रहा, लेकिन विकास में काफी आगे निकल चुका है। भारत में ज्यादातर सुधार जीडीपी विकास दर के 6 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंचने से काफी पहले ही हो चुके थे। ब्रिटिश विद्वान जेम्स मेनर कहते हैं कि घाना और दक्षिण अफ्रीका के विचारशील लोग उनसे पूछते हैं, "भारतीय ऐसा कैसे कर पाते हैं? उनके यहां उदारीकरण हमसे कम हुआ, लेकिन उनकी विकास दर हमसे ज्यादा है और समाज में स्थिरता भी अधिक है।"

इसका जवाब मैं देना चाहुंगा। आर्थिक सफलता महज आर्थिक सुधारों पर नहीं बल्कि सांस्थानिक मजबूती और ऐतिहासिक कौशल पर

भारत में आर्थिक  स्वतंत्रता के मामले में आंध्र प्रदेश ने सब से अधिक तरक्की करी है. तेलंगाना जैसी विषम समस्या के चलते भी, आंध्र प्रदेश आर्थिक स्वतंत्रता के लिए एक  अनुकूल वातावरण प्रदान करने में सफल रहा है.

फ्रेडरिक नौमान फ़ौंडेशन (दक्षिणी एशिया) द्वारा हाल ही में जारी की गयी 'इकोनोमिक फ्रीडम ऑफ़ द स्टेट्स ऑफ़ इंडिया 2011' (भारत के राज्यों में आर्थिक स्वतंत्रता 2011) रिपोर्ट  के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में तामिल नाडू  सर्वोच्च रहा जबकि गुजरात दूसरे स्थान पर आया. अपना पिछला प्रदर्शन सुधारते हुए, आन्ध्र

बजट के प्रस्तुत होते ही सेंसेक्स ने 600 अंकों की छलांग लगाई, लेकिन जैसे ही निवेशकों को ये समझ आया कि बजट की कुछ बातें वित्तीय घाटे को ध्यान में रखने की बजाय आंकड़ों में सुधार और आशावाद पर अधिक आधारित है, तो सेंसेक्स को नीचे गिरते भी ज्यादा वक्त नहीं लगा।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट में कर प्रबंधन की कुशलता की कमी दिखाई पड़ती है, फिर भी इसमें वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई पड़ती है और रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल के लिए नकद सब्सिडी की एक नई नीति सामने रखता है।

वित्त मंत्री ने वित्तीय क्षेत्र के

विदेशी मुद्रा में पूर्णतया कंगाल होने के बाद ही देश के राजनीतिक वर्ग को 1991 में आर्थिक सुधार लाने की सुध आयी. डेंग ज़ियाओपिंग के नेतृत्व में चीन में 12 साल पहले ही आर्थिक सुधार शुरू हो चुके थे. ये देर से की गयी शुरुआत एक महत्त्वपूर्ण वजह है कि आज भारत और चीन के विकास में इतना फासला है. भारत में दो चरणों में सुधारों को क्रियान्वित किया गया: पहला चरण था 1991 से 1993 के बीच प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में और दूसरा चरण था 1997 से 2004 के बीच प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व काल में. इसके विपरीत, चीन में सुधारों का सिलसिला अनवरत चलता आ रहा है.

प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तार काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए।

आपको कुछ

हम में से कई लोग भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा रिकॉर्ड से खुश होंगे क्योंकि वह तेज रफ्तार से वृद्धि  करने वाली अर्थव्यवस्था है लेकिन वे भूल चुके हैं कि आजादी के बाद भारत ने समान रूप से जबरदस्त शुरुआत की थी। बीसवीं सदी की एक जानी-मानी शख्सियत जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने विकास योजना की आधारशिला रखी और इसमें देश अग्रणी रहा।

सबसे ज्यादा उल्लेखनीय बात यह रही कि सरकार के दिशानिर्देशों के साथ नियंत्रणबद्ध योजना की प्रक्रिया शुरू हुई और भारत ने वर्ष 1954-55 और और 1964-65 के बीच सालाना औसतन 8 फीसदी से ज्यादा की औद्योगिक वृद्धि हासिल की

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