सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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बजट के प्रस्तुत होते ही सेंसेक्स ने 600 अंकों की छलांग लगाई, लेकिन जैसे ही निवेशकों को ये समझ आया कि बजट की कुछ बातें वित्तीय घाटे को ध्यान में रखने की बजाय आंकड़ों में सुधार और आशावाद पर अधिक आधारित है, तो सेंसेक्स को नीचे गिरते भी ज्यादा वक्त नहीं लगा।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट में कर प्रबंधन की कुशलता की कमी दिखाई पड़ती है, फिर भी इसमें वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई पड़ती है और रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल के लिए नकद सब्सिडी की एक नई नीति सामने रखता है।

वित्त मंत्री ने वित्तीय क्षेत्र के

विदेशी मुद्रा में पूर्णतया कंगाल होने के बाद ही देश के राजनीतिक वर्ग को 1991 में आर्थिक सुधार लाने की सुध आयी. डेंग ज़ियाओपिंग के नेतृत्व में चीन में 12 साल पहले ही आर्थिक सुधार शुरू हो चुके थे. ये देर से की गयी शुरुआत एक महत्त्वपूर्ण वजह है कि आज भारत और चीन के विकास में इतना फासला है. भारत में दो चरणों में सुधारों को क्रियान्वित किया गया: पहला चरण था 1991 से 1993 के बीच प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में और दूसरा चरण था 1997 से 2004 के बीच प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व काल में. इसके विपरीत, चीन में सुधारों का सिलसिला अनवरत चलता आ रहा है.

प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तार काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए।

आपको कुछ

हम में से कई लोग भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा रिकॉर्ड से खुश होंगे क्योंकि वह तेज रफ्तार से वृद्धि  करने वाली अर्थव्यवस्था है लेकिन वे भूल चुके हैं कि आजादी के बाद भारत ने समान रूप से जबरदस्त शुरुआत की थी। बीसवीं सदी की एक जानी-मानी शख्सियत जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने विकास योजना की आधारशिला रखी और इसमें देश अग्रणी रहा।

सबसे ज्यादा उल्लेखनीय बात यह रही कि सरकार के दिशानिर्देशों के साथ नियंत्रणबद्ध योजना की प्रक्रिया शुरू हुई और भारत ने वर्ष 1954-55 और और 1964-65 के बीच सालाना औसतन 8 फीसदी से ज्यादा की औद्योगिक वृद्धि हासिल की

क्या आपको पता है कि भारत में कितने लोग रोज़ भूखे पेट सोते हैं? क्या आपको यह भी पता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग किस देश में रहते हैं? आपको यह जानकर दुख होगा कि भारत के कम से कम 50 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं याने उन्हें रोज़ भर पेट भोजन भी नहीं मिलता| भोजन याने क्या? सिर्फ दाल-रोटी!! उन्हें फल-फूल और माल-मिठाई मिलना तो दूर रहा, घी-तेल में बनी साग-सब्जी मिल जाए तो उनकी दीवाली हो जाती है| ऐसे गरीब लोग जितने भारत में हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं| चीन में ऐसे गरीबों की संख्या 10 करोड़ है जबकि भारत में उनकी संख्या 40 से 50 करोड़ आंकी जाती है| इन

क्या भारतीय मतदाता सरकार बदलने का फैसला बड़े मुद्दों के आधार पर करता है? जी नहीं। उसका उनसे कोई लेना-देना नहीं होता। वह सड़क, पानी, सामान्य प्रशासन जैसी उन बातों के आधार पर सत्ता बदलता है जो उसके दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं।

चुनाव के शब्दकोष में सबसे लोकप्रिय शब्दावली है ‘सत्ता विरोधी रुझान’ जिसे अंग्रेजी में एंटी इन्कमबेंसी कहा जाता है। एंटी इन्कमबेंसी की हर व्यक्ति के पास अपनी-अपनी परिभाषा है, लेकिन मुझे लगता है कि यह मतदाताओं के दिमाग में इस विचार का कोड वर्ड है, ‘अब बहुत हो गया है। मैं इतने घटिया शासन से थक गया हूं

जब विकृत या गलत या उल्टी प्रोत्साहन व्यवस्था भ्रष्टाचार को दंडित करने की बजाए ईनाम देती है, तब भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है। हमें इस विकृत प्रोत्साहन का अंत करने के लिए संस्थागत परिवर्तनों की जरूरत है।

मुझे आशा है कि साल 2010 को एक ऐसे साल के रूप में याद किया जाएगा, जब नाराज मतदाता नेताओं को बाध्य कर देंगे कि वे राजनीति को एक फायदेमंद और कर मुक्त पेशे के रूप में देखना बंद करें। मीडिया में इन दिनों कई घोटाले जैसे अवैध खनन, आदर्श सहकारी समिति, राष्ट्रमंडल खेल और 2जी लाइसेंस जैसे मामले छाए हुए हैं।

राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता् लगातार नए अधिकारों की बात करते हैं- काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अब भोजन का अधिकार। "अधिकार" शब्द को तोड़-मरोड़कर इनटाइटलमेंट के पर्याय में इस्तेमाल किया जाने लगा है, लेकिन दोनों में काफी फर्क है।

अधिकार राज्य और समाज के किसी भी प्रकार के दमन (जाति, धर्म और लिंग के आधार पर) से मुक्त होते हैं। अधिकारों के लिए राज्य से किसी तरह के अनुमोदन की जरूरत नहीं होती, जबकि इनटाइटलमेंट वो कल्याणकारी योजनाएं (कदम) हैं, जिनके लिए सरकार की सहमति जरूरी होती है। अधिकारों को बजट से सीमित नहीं किया जा सकता,

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