सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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माओवादी उभार के विषय पर लिखी गई एक पुस्तक ‘हैलो बस्तर‘ के लोकार्पण के अवसर पर पुस्तक के लेखक राहुल पंडिता ने छोटे मोटे अधिकारियों और वन ठेकेदारों द्वारा जनजातियों के भारी शोषण पर रोशनी डाली। उन्होंने माओवादी विरोधी निगरानी बल सलवा जुडूम की निंदा की और कहा कि आदिवासियों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वे माओवादियों के साथ मिलकर बंदूकें उठाएं और अपने हक के लिए लड़ें।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस अवसर पर कहा कि मुख्य समस्या सामाजिक और प्रशासनिक है। जैसे-जैसे हम बस्तर जिले के मुख्यालय

यह बैठक उसी शहर में थी और उस रामलीला मैदान से ज्यादा दूर भी नहीं थी, जहां कुछ दिन पहले तक भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध में बाबूराव हजारे अनशन पर बैठे थे। उनके इस अनशन ने सरकार, संसद और खबरिया टेलीविजन चैनलों को हिला कर रख दिया। लेकिन एक पांच सितारा होटल के वातानुकूलित और शांत माहौल में कारोबारी शिक्षा के भविष्य पर चल रहा साक्षात्कार मानो किसी अलग ही दुनिया में था। ऐसी दुनिया, जो देश भर में मध्य वर्ग के प्रदर्शनों और इनसे छुटकारा पाने की राजनीतिक तबके की काल्पनिक कोशिशों से परे थी।

गुडग़ांव के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही अन्ना पक्ष और

अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।

दो तरह के

64 वर्ष पूर्व कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसने अंग्रेजो के निर्दयी एवं दमनकारी शासन का पर्दाफाश किया. उसने हाल मे अपने साथ भी कुछ ऐसा ही किया. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने जो-जो किया उस से उसने ये सिद्ध कर दिया है की वो खुद भी कितनी निर्दयी ,बेवकूफ एवं दमनकारी है. अन्ना हजारे को जेल में डालकर, उन्होंने ऐसे जन समर्थन की लहर पैदा कर दी है जिसने इस आंदोलन में हुयी पिछली गलतियों को छिपा दिया है.

ऐसा ही कुछ तब हुआ था जब ब्रिटिश हुकूमत ने महात्मा गाँधी को और इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण

जमीन हमेशा ही विवादों का कारण रही है। शहरीकरण, गैर-कृषि कार्यों के लिए जमीन की बढ़ती मांग, छोटे जमीन मालिकों में कुशलता का अभाव व रोजगार की कमी से विवाद की वजह को समझा जा सकता है। पश्चिमी यूरोप, खास तौर पर ब्रिटेन और इससे भी बढ़कर इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ही जमीन के बाजार को मुक्त कर दिया गया था और शिक्षा तथा तकनीकी कौशल की पहुंच बढ़ गई थी। हमने ऐसे सुधार नहीं लागू किए जो लोगों को कृषि कार्य से बाहर निकलने या कृषि में ही कुछ नया कर सकने में समर्थ बना सके।

लोगों के पास ऐसी कुशलताएं भी नहीं हैं, जिन्हें बाजार में भुनाया जा

भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है. इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है. यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है. इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार

आज से 20 वर्ष पूर्व 21 जून 1991 को नरसिम्हा राव ने एक ऐसे कमजोर और अल्पसंख्यक सरकार की बागडोर संभाली थी, जो गंभीर आर्थिक संकट से घिरी थी। इसके बावजूद उन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया। भारत 1991 में इतना गरीब था और यहां की शासन व्यवस्था इतनी बदहाल थी कि यह विदेशी सहायता के लिए आवश्यक शर्तों को भी पूरा नहीं कर पा रहा था। आज भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए अमेरिका का भी सहयोग मिल रहा है और यह जल्द ही आर्थिक विकास की गति में चीन को भी पीछे छोड़

अब तक किसी भी स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत का मूड इतना विषादग्रस्त नहीं रहा है। विडंबना है कि पिछला एक दशक भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे सुनहरा काल रहा है। देश विस्मयकारी रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। दशकों से देश प्रगति के पथ पर जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक तो इस संपन्नता में भागीदारी नहीं कर सका, किंतु काफी बड़ी संख्या में भारतीयों ने महसूस किया कि उनका जीवन उनके माता-पिता के जीवन से बेहतर है और उनके बच्चे उनसे भी बेहतर जीवन जिएंगे। पश्चिम में बुझती आकांक्षाओं के विपरीत हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग पहले पैदल चलते थे अब साइकिल की सवारी

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