सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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बीते दिनों राष्ट्रीय शैक्षिक,अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के राजनीतिक विज्ञान के पुस्तक में डा.भीमराव अम्बेडकर व पं.जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति वाले एक कार्टून के प्रकाशन ने बवाल मचा दिया। अचानक से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आए इस कार्टून की सभी सियासी दलों द्वारा जमकर निंदा की गयी। सदन में जोरदार हंगामा किया गया और पुस्तक में कार्टून शामिल करने के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ गुस्से का प्रदर्शन किया गया। यहां तक कि उनके कार्यालय में तोड़फोड़ भी की गई। मजे की बात यह है कि विरोध करने वालों में वे राजनैतिक दल भी सक्रिय तौर पर शामिल रहें

विगत 13 मई को भारतीय संसद ने स्थापना के साठ वर्ष पूरे कर लिए। इन साठ वर्षों के दौरान दुनिया ने सबसे बड़ी लोकतंत्रिक व्यवस्था को तरुणाई की दहलीज लांघ युवावस्था में पहुंचता देखा। इस दौरान इस व्यवस्था से सबकी अपनी-अपनी अपेक्षाएं और उम्मीदें जुड़ी रहीं। किसी ने इसे विश्व की आर्थिक महाशक्ति के तौर पर देखा तो किसी को इसमें वैश्विक राजनैतिक नेतृत्व की झलक दिखी। किसी ने इसे सामरिक दुनिया के सेनापति के तौर पर देखा। वर्ष 1947 में अहिंसा की अनकही, अनसुनी, अनदेखी ताकत के बल पर ब्रिटानी हुकूमत की जंजीरों से आजाद हो गणतंत्र बने इस राष्ट्र और इसकी व्यवस्था से    ये

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हमारी संसद के साठ साल पूरे हो गये हैं। इतने वर्ष के सफर में एक तरफ देश में लोकतंत्र मजबूत हुआ है तो दूसरी तरफ उसके सभी उपकरण अपने अंर्तकलह से कमजोर हुए हैं। संसदीय लोकतंत्र की राजनीतिक प्रणाली दलीय प्रणाली पर चलती है जो हमारे देश में छिन्न भिन्न हो गई है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में जवाहरलाल नेहरू के रहते हुए एक लंबी बहस की परंपरा डाली गई थी। संसदीय व्यवस्था में नेहरू के समय में प्रधानमंत्री, पक्ष, विपक्ष सभी बहस करते थे। उनके बाद इंदिरा जी ने ये परंपराएं रोक दीं। अब तो कांग्रेस भी लोकतांत्रिक पार्टी नहीं रह गई है। आज विपक्षी

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सार्वजनिक स्थानों पर महिला शौचालय एक अत्यंत उपेक्षित मुद्दा रहा है। इस मुद्दे पर खुलकर बात करना तथा इस कमी को सार्वजनिक मंचों पर उठाना महिलाओं तथा महिला प्रतिनिधियों के लिए भी संकोच का विषय रहा है, लेकिन हाल के वर्षो में यह चुप्पी टूटी है। मीडिया ने भी इस मुद्दे को विशेष रूप से महत्व दिया और इस सवाल को गंभीरता से उठाया। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में ही राजौरी गार्डेन बाजार में महिला टॉयलेट के नहीं होने को अच्छा-खासा कवरेज दिया गया। दिल्ली के राजौरी गार्डेन बाजार में 600 दुकानें है, लेकिन एक भी महिला टॉयलेट नहीं है, जबकि एमसीडी ने पुरुषों के लिए चार टॉयलेट बनाए हैं। इस

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बचपन में हम सबने अज्ञानी नाविक व महाज्ञानी पंडित की कहानी अवश्य पढ़ी-सुनी होंगी। कहानी का मजमून कुछ यूं है कि एक महाज्ञानी पंडित जिन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा घमंड था, यात्रा पर निकले। रास्ते में एक नदी पड़ी जिसे पार करने के लिए उन्हें नाव की जरूरत पड़ी। नाविक से किराया आदि तय करने के बाद वह नाव पर सवार हुए। नाव अभी कुछ ही दूर बढ़ी कि महाज्ञानी पंडित के ज्ञान ने हिलोरे मारना शुरू किया। उन्होंने नाविक से पूछा कि क्या वह उनकी पुस्तक में लिखे मंत्रों को पढ़ सकता है? नाविक द्वारा यह बताने पर कि वह पढ़ तो नहीं सकता लेकिन मंत्र व उसका अर्थ उसे कंठस्थ है, पंडित ने नाविक की ओर हीन

यह सोचकर कितना अजीब लगता है कि देश में कुछ वर्ष पूर्व (लगभग एक दशक) पहले तक यदि किसी को टेलीफोन कनेक्शन लेना होता था तो उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। टेलीफोन के लिए आवेदन फार्म हासिल करने से लेकर भरे आवेदन पत्र भरकर जमा कराने, अपने नंबर का इंतजार करने, घर में फोन लग जाने में दो से तीन साल तक लग जाया करते थे। इतना ही नहीं दो-तीन साल बाद भी नंबर तब आता था जब फार्म देने वाले बाबू से लेकर अधिकारी तक की मुट्ठी गर्म नहीं की जाती थी। इसके बाद भी जबतक कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर रसूखदार लोगों के पत्र आप की सिफारिश करते विभाग तक न पहुंचे थे, तबतक घर में फोन की घंटी

इन दिनों उत्तर प्रदेश के रोजगार केंद्रों के दिन फिर गए हैं पिछले कई वर्षों से उजाड़ पड़े रहनेवाले रोजगार केंद्रो में फिर लंबी-लंबी कतारें लगने लगी हैं। उजाड़ पड़े रहने की वजह यह थी कि  सरकार के पास देने के लिए नौकरियां हैं कहां। जब रोजगार केंद्रों में नौकरियां मिलती नहीं तो भला लोग जाएं किस लिए। सरकार के पास देने के लिए नौकरियां अब भी नहीं है लेकिन नई सरकार नई रोशनी लेकर आई है। उसका वायदा है कि (हम रोजगार नहीं दे सकते तो क्या) बेरोजगारी का भत्ता देंगे। लोग भी यह सोचकर खुश हैं कि भागते भूत की लंगोटी भली। सरकार से जो भी मिल जाए बुरा क्या

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संप्रग सरकार के मंत्रियों के लिए कुछ सुझाव हैं, जिन्होंने विश्व में भारत की साख को मिट्टी में मिला दिया है। ढाई साल पहले नौ फीसदी की भारत की विकास दर को दिसंबर 11 की तिमाही में 6.1 के स्तर पर लाने के दौरान बहुत कुछ घट गया है। विकास दर में एक प्रतिशत की गिरावट का मतलब है करीब 15 लाख लोगों की रोजगार से छुट्टी। इसमें हैरत की बात नहीं है कि संप्रग सरकार के कार्यकाल में देश ने बेहद तकलीफ और पीड़ा झेली है। भ्रष्टाचार का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, किंतु असल त्रासदी है कानून के शासन में गिरावट। कभी भारत की ताकत रहा कानून का शासन अब पतन की ओर अग्रसर है। इस सरकार ने

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