सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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संप्रग सरकार के मंत्रियों के लिए कुछ सुझाव हैं, जिन्होंने विश्व में भारत की साख को मिट्टी में मिला दिया है। ढाई साल पहले नौ फीसदी की भारत की विकास दर को दिसंबर 11 की तिमाही में 6.1 के स्तर पर लाने के दौरान बहुत कुछ घट गया है। विकास दर में एक प्रतिशत की गिरावट का मतलब है करीब 15 लाख लोगों की रोजगार से छुट्टी। इसमें हैरत की बात नहीं है कि संप्रग सरकार के कार्यकाल में देश ने बेहद तकलीफ और पीड़ा झेली है। भ्रष्टाचार का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, किंतु असल त्रासदी है कानून के शासन में गिरावट। कभी भारत की ताकत रहा कानून का शासन अब पतन की ओर अग्रसर है। इस सरकार ने

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देश के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कुछ दिनों पूर्व कुपोषण के कारण देश में नौनिहालों की मृत्यु को राष्ट्रीय शर्म की संज्ञा दी थी। उनके बयान के बाद से ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद उनका मंत्रालय व देश की मशीनरी अब इस मसले को गंभीरता से लेगी और कुछ कड़े कदम उठाएगी। लेकिन जनता को दो जून की रोटी उपलब्ध कराने की गारंटी देने (दावा करने) वाले खाद्य सुरक्षा बिल को ही लागू करने को लेकर उन्हीं के कुछ मंत्रियों की तरफ से नींद उड़ जाने जैसे आए बयानों ने प्रधानमंत्री की चिंताओं को कम करने की बजाए और बढ़ाने का ही काम किया है। इस बीच नौनिहालों की स्थिति के बाबत जारी एक विश्वव्यापी रिपोर्ट

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रेल प्रशासन एक बार फिर से अपनी घोषणा को लेकर चर्चा में है। यह चर्चा ट्रेनों, विशेषकर पूरब की ओर जाने वाली रेल गाड़ियों में सभी को सीट उपलब्ध कराने की घोषणा को लेकर है। इसके लिए रेल प्रशासन ने किसी भी ट्रेन में प्रतीक्षा सूची के तीन सौ से ज्यादा होने की दशा में दो अतिरिक्त कोच जोड़ने और सूची के सात सौ से अधिक होने पर विशेष ट्रेन चलाने की बात कही है। यही नहीं ट्रेन में वेटिंग की सीमा को 545 से बढ़ाकर एक हजार भी कर दिया गया है। यानि कि अब यात्रियों को लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण टिकट रिग्रेट की परेशानी से जूझना नहीं पड़ेगा। अब सबको टिकट मिलेगा और सबको बर्थ भी मिलेगा।

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भारतीय रेलों में महिलाओं के साथ बढ़ती वारदातों के मद्देनजर रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा ट्रेनों में महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की घोषणा एक सराहनीय पहल के तौर पर देखी जा रही है। उम्मीद की जा रही है महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती से महिला यात्रियों विशेषकर लंबी दूरी की ट्रेनों के महिला डिब्बों में सवारी करने वाली महिलाओं को इसका ज्यादा फायदा मिल सकेगा। इसके अतिरिक्त लोकल ट्रेनों में देर रात सफर करने वाली महिलाएं भी इस घोषणा से राहत की सांस ले सकती है। हालांकि अभी रेल मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती लोकल ट्रेनों में

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वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को इन दिनों नींद नहीं आ रही है। वजह है, देश में खाद्य सुरक्षा बिल लागू करने की राह में खर्च होने वाला धन। उन्हें चिंता है कि इससे देश का बजट बढ़ जाएगा और कम से कम १.३४ लाख करोड़ रूपए से २.३४ करोड़ रूपए तक के अतिरिक्त खर्च का बोझ उठाना पड़ेगा। यह बात और है कि खुद कृषि मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग का मानना है कि इस प्रक्रिया में वर्तमान बजट में मात्र २७ हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अन्य तार्किक अनुमानों की भी माने तो इस प्रक्रिया में ९५ हजार करोड़ से लेकर १.१० लाख करोड़ रूपए का ही खर्च आएगा जो कि कुल जीडीपी का लगभग १.४

हाल में योजना आयोग ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है, यदि उसे सरकार ने मान लिया तो भारतीय समाज में न सिर्फ स्त्री की सामाजिक-आर्थिक हैसियत बढ़ेगी, बल्कि वह पति-पत्नी के रिश्ते में आमूल परिवर्तन भी ला सकता है।

योजना आयोग का वीमेंस एजेंसी एंड एमपॉवरमेंट नामक वर्किंग ग्रुप संपत्ति का अधिकार संबंधी एक ऐसा समग्र कानून चाहता है, जिसमें पति-पत्नी के बीच अलगाव होने या परित्याग की सूरत में दोनों के बीच कुल संपत्ति का बंटवारा बराबर-बराबर हो।

एक ऐसा कानून हो, जिसके तहत पति और पत्नी जो भी संपत्ति चाहे वह चल हो या अचल हासिल करें, उस पर

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कुछ वर्षों पूर्व तक बिहार का नाम आते ही लोगों के जेहन में टूटी-फूटी सड़कें, हिचकोले खाते साइकिल की रफ्तार से चलते (दौड़ते) डग्गामार वाहन, छतों पर बैठकर और दरवाजों व सीढ़ियों पर लटक कर यात्रा करती सवारियां, विद्युत आपूर्ति के अभाव में शाम से ही घने अंधकार के आगोश में समा जाने वाले गांवों व शहरों के दृश्य उभर आते थे। राजनेताओं व बाहुबलियों के संरक्षण में खुलेआम घूमते अपराधी और उद्योग धंधों के अभाव में बेरोजगार युवकों व श्रमशक्ति का अन्य प्रदेशों को पलायन यहां की विशिष्ट पहचान बनती जा रही थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बिहार ऐसा बदला कि लोग न केवल उसे मॅाडल प्रदेश मानने

केंद्र सरकार के एक कार्यसमूह द्वारा देश के डाक सेवा क्षेत्र में बेहतर परिणाम के लिए डाक विभाग के एकाधिकार को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है। डाक क्षेत्र में सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के संदर्भ में कार्यसमूह द्वारा दिया गया यह सुझाव कई मायनों में स्वागत योग्य है। कार्य समूह की इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाने और डाक विभाग के एकाधिकार को खत्म करने की सिफारिश इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि इस संदर्भ में जो कानून चला आ रहा है वह अंग्रेजी शासन काल का है और ११० साल से भी अधिक पुराना है। वैश्विकरण के दौर में यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सेवा के किसी क्षेत्र में वांछनीय

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