सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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कुछ वर्षों पूर्व तक बिहार का नाम आते ही लोगों के जेहन में टूटी-फूटी सड़कें, हिचकोले खाते साइकिल की रफ्तार से चलते (दौड़ते) डग्गामार वाहन, छतों पर बैठकर और दरवाजों व सीढ़ियों पर लटक कर यात्रा करती सवारियां, विद्युत आपूर्ति के अभाव में शाम से ही घने अंधकार के आगोश में समा जाने वाले गांवों व शहरों के दृश्य उभर आते थे। राजनेताओं व बाहुबलियों के संरक्षण में खुलेआम घूमते अपराधी और उद्योग धंधों के अभाव में बेरोजगार युवकों व श्रमशक्ति का अन्य प्रदेशों को पलायन यहां की विशिष्ट पहचान बनती जा रही थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बिहार ऐसा बदला कि लोग न केवल उसे मॅाडल प्रदेश मानने

केंद्र सरकार के एक कार्यसमूह द्वारा देश के डाक सेवा क्षेत्र में बेहतर परिणाम के लिए डाक विभाग के एकाधिकार को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है। डाक क्षेत्र में सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के संदर्भ में कार्यसमूह द्वारा दिया गया यह सुझाव कई मायनों में स्वागत योग्य है। कार्य समूह की इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाने और डाक विभाग के एकाधिकार को खत्म करने की सिफारिश इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि इस संदर्भ में जो कानून चला आ रहा है वह अंग्रेजी शासन काल का है और ११० साल से भी अधिक पुराना है। वैश्विकरण के दौर में यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सेवा के किसी क्षेत्र में वांछनीय

लंबे समय से आर्थिक समस्याओं से जूझ रही देशी विमान कंपनियों की समस्या के समाधान के लिए आखिर केंद्र सरकार को देर से ही सही इस क्षेत्र में और अधिक उदार होने की जरूरत समझ में आ ही गई। सरकार अब इस क्षेत्र में ४९ प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की छूट देने पर राजी होती नजर आ रही है। यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो भारतीय एयरलाइनों में ४९ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मुद्दे पर केंद्र सरकार जल्द ही बड़ी घोषणा कर सकती है।

इस बार सरकार का इरादा विदेशी एयरलाइन कंपनियों को देसी एयरलाइन्स कंपनियों में ४९फीसदी तक एफडीआइ की अनुमति देने का है। इस संबंध में

माओ ने कहा था – सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसका तात्पर्य यह था कि क्रांति सशस्त्र संघर्ष के जरिये ही हो सकती है। भारत के माओवादी अच्छी तरह जानते हैं कि सशस्त्र संघर्ष के लिए अस्त्र-शस्त्र और हथियार खरीदने के लिए जेब भरी होना जरूरी है। उसीतरह बंदूक चलानेवालों का पेट भरा होना चाहिए तभी वह डटकर संघर्ष कर सकते हैं इसलिए माओवादी हर वैध और अवैध तरीके से पैसा जुटाकर अपनी तिजोरियां भरनें में लगे हैं। माओवदियों का आर्थिक साम्राज्य कितना बड़ा है इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि  कुछ अर्से पहले केंद्रीय गृहसचिव ने कहा था कि माओवादी हर साल 1600 से 2000 करोड़

आखिरकार जमीन और जंगल के अन्यायपूर्ण राष्ट्रीयकरण की नीतियों में आंशिक सुधार का रास्ता तैयार हो रहा है। मंत्रियों के एक समूह ने एक खनन विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसमें यह व्यवस्था की गयी है कि स्थानीय समूहों (आदिवासियों या ग्रामीणों) को कोयले के खनन से होने वाले लाभ में 26 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी और अन्य खनिजों के खनन के मामले में राज्य सरकार को पिछले साल दी गई रायल्टी के बराबर राशि ग्रामीणों को भी दी जाएगी।

इसके बाद से खनन के जरिए होने वाला लाभ खनन कंपनियां, केंद्र सरकार (टैक्स के माध्यम से) और राज्य सरकरें (रॉयल्टी और स्थानीय कर

माओवादी उभार के विषय पर लिखी गई एक पुस्तक ‘हैलो बस्तर‘ के लोकार्पण के अवसर पर पुस्तक के लेखक राहुल पंडिता ने छोटे मोटे अधिकारियों और वन ठेकेदारों द्वारा जनजातियों के भारी शोषण पर रोशनी डाली। उन्होंने माओवादी विरोधी निगरानी बल सलवा जुडूम की निंदा की और कहा कि आदिवासियों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है सिवाय इसके कि वे माओवादियों के साथ मिलकर बंदूकें उठाएं और अपने हक के लिए लड़ें।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस अवसर पर कहा कि मुख्य समस्या सामाजिक और प्रशासनिक है। जैसे-जैसे हम बस्तर जिले के मुख्यालय

यह बैठक उसी शहर में थी और उस रामलीला मैदान से ज्यादा दूर भी नहीं थी, जहां कुछ दिन पहले तक भ्रष्टाचार के खिलाफ विरोध में बाबूराव हजारे अनशन पर बैठे थे। उनके इस अनशन ने सरकार, संसद और खबरिया टेलीविजन चैनलों को हिला कर रख दिया। लेकिन एक पांच सितारा होटल के वातानुकूलित और शांत माहौल में कारोबारी शिक्षा के भविष्य पर चल रहा साक्षात्कार मानो किसी अलग ही दुनिया में था। ऐसी दुनिया, जो देश भर में मध्य वर्ग के प्रदर्शनों और इनसे छुटकारा पाने की राजनीतिक तबके की काल्पनिक कोशिशों से परे थी।

गुडग़ांव के व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र में कदम रखते ही अन्ना पक्ष और

अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।

दो तरह के

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