सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

इस पेज पर विभिन्न लेखकों के गवर्नेंस पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

 

गांवों में मोबाइल गवर्नेंस की जरूरत

तेईस साल की राखी पालीवाल राजस्थान के राजसमंद जिले में उपली-ओदेन पंचायत की उप-प्रमुख हैं। वह एकमात्र निर्वाचित महिला सदस्य हैं, जो बाइक चलाती हैं। सुबह चार बजे उठकर खुले में शौच के खिलाफ महिलाओं को सलाह देती हैं। दिन में लॉ स्कूल जाती हैं और स्मार्ट फोन से फेसबुक अपडेट करती हैं।

बीते मार्च में हम एक रेड रिक्शा रिवॉल्यूशन नाम के एक सफर पर निकले थे, जिसका मकसद था उन साधारण महिलाओं को पहचानना, जो असाधारण काम कर

उत्तराखंड में जो भयानक नुकसान हमने पिछले सप्ताह देखा, उसके पीछे छिपे हैं कई सवाल, जिन्हें हम सिर्फ आपदा आने के समय ही पूछते हैं। बला टल जाती है, तो हम भी उन सवालों को पूछना बंद कर देते हैं। इसलिए हम आज तक समझ नहीं पाए हैं विकास और पर्यावरण का नाजुक रिश्ता और न ही हमारे शासकों ने समझने की कोशिश की है कि विकसित देशों में विकास के बावजूद पहाड़ क्यों सुरक्षित हैं, नदियां क्यों साफ हैं।

पहाड़ी इलाकों में न शहरीकरण को रोका जा सकता है, और न तीर्थयात्रियों-पर्यटकों को। अगर स्विट्जरलैंड में बन सकते हैं पहाड़ों में बड़े-बड़े

,

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार (आरटीआइ) के दायरे में लाने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) के हालिया फैसले से यह पुष्टि हो गई है कि अधिकांश राजनीतिक दल धनराशि जुटाने, पार्टी टिकट देने और इस प्रकार के अन्य अंतर्दलीय मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही के खिलाफ हैं। सबसे अधिक निराशा यह देखकर हुई कि कभी खुद को अलग तरह की पार्टी बताने वाली भारतीय जनता पार्टी भी घोटालों की दागी कांग्रेस की राह पर चल रही है और आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाकर कांग्रेस को बचाने का प्रयास कर रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने सीआइसी के आदेश को एडवेंचरिस्ट बताया और यह

 

 

मिल्टन फ्रीडमैन ने अमेरिका, यूरोप, चीन और सोवियत रूस में निजीकरण की प्रवृत्ति की छानबीन की और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्थिक स्वतंत्रता का कोई एक तय मार्ग नहीं होता है और इस दौरान सांस्कृतिक भिन्नताओं का भी ध्यान रखना आवश्यक है।  

चीन की पहले की यात्रा के दौरान के एक प्रकरण ने मुझे काफी प्रभावित किया कि समझदारी के बीच की चौड़ी खाई विभिन्न आर्थिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को अलग अलग करती है। यह आधारभूत सिद्धांतों और विचारों पर बार बार जोर डालने को अत्यंत महत्वपूर्ण

,

 

आमजन के लिए राहत की खबर है कि अब क्षेत्राधिकार के नाम पर पुलिस वाले एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकते। दिल्ली में तो जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिशों के मुताबिक आपराधिक नियम (संशोधन) कानून-२०१३ के पास होने के साथ ही एफआईआर संबंधी नए प्रावधान अस्तित्व में आ गए, लेकिन अब केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा राज्यों को भेजे गए दिशा-निर्देशों से ये पहलू चर्चा में आया है। इसके मुताबिक अगर कोई शिकायत लेकर आता है तो उसकी प्राथमिकी तुरंत दर्ज करना होगी। अगर घटना संबंधित थाना क्षेत्र की नहीं है तो बाद में शिकायत उस थाना क्षेत्र में भेजी जाएगी, जिसके

,

 

भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 2010-11 की 9.2 प्रतिशत के आधे से भी नीचे आकर 2012-13 में मात्र 5 प्रतिशत रह गई है। हमारी अर्थव्यवस्था के सामने मुख्य समस्याएं हैं- ऊंचा चालू खाता घाटा, ऊंचा वित्त घाटा और छोटे-मंझोले उद्यमों के लिए बैंक ऋण का अभाव। ये तीनों मुश्किलें एक अकेले उपाय से दूर की जा सकती हैं। वह है देश के पास मौजूद अतिरिक्त खाद्य भंडार को कम करना। कृषि मूल्य एवं लागत आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन अशोक गुलाटी और इसकी संयुक्त निदेशक सुरभि जैन ने अपने हाल के एक शोधपत्र 'सुरक्षित भंडार नीति, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल की रोशनी में' के जरिये इस बात को

,

विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद छोड़कर राजनीतिक रूप से भी हलचल पैदा की है। वह इस परिषद में इसलिए काम करने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की दर से वेतन दिए जाने की अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया। ऐसा लगता है कि मनमोहन सरकार के प्रति उनकी नाराजगी कुछ ज्यादा ही है, क्योंकि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से मुक्त होने के बाद उन्होंने केंद्रीय सत्ता पर यह आरोप भी मढ़ा कि वह आम लोगों को नजरअंदाज कर आर्थिक वृद्धि हासिल करने पर तुली

 

चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन उसके साथ भारत का 29 अरब डॉलर का विशाल व्यापार घाटा भी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने चीनी जोड़ीदार ली ख छ्यांग से हाल की मुलाकात में कहा कि इस घाटे का 'कुछ किया जाना चाहिए।' लेकिन एक अर्थशास्त्री के रूप में वे अवश्य ही यह जानते हैं कि हर व्यापारिक भागीदार के साथ व्यापार घाटे को संतुलित करने की सोच गलत है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार की खूबसूरती इसी बात में है कि यह हर देश को अपने विशिष्टि क्षेत्र में और ज्यादा महारत हासिल करने के लिए प्रेरित करता है।

Pages