सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी चीनी सरकार ने बाजी मार ली है। 1960 का आयातक चीन आज तमाम देशों को गेहूं निर्यात करता है। वहां की सरकार ने एक अलग तरह का दोहरा मॉडल अपनाया है। विश्व में सर्वाधिक आबादी वाले इस देश में किसानों को पर्याप्त सब्सिडी दी जाती है, पर बाजार खुला है।

चीन में अनाज भंडारण, बेचने आदि पर कोई पाबंदी नही है और सरकार केवल मुनाफाखोरी व कीमतों पर निगरानी रखती है। आयात के लिए जहां सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है वहीं निर्यात की पूरी छूट दी गई है। घरेलू मोर्चे पर चीन इस समय आत्म निर्भर तो है ही,

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-    हमारी खाद्य नीति ने निजी क्षेत्र को बाजार से बाहर कर दिया। सरकार अनाज की सबसे बड़ी भंडारणकर्ता बन गई और अनाज सड़ता रहा

अपने देश के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह महान है और महान हैं इसकी परंपराएं। पर इन सबसे ज्यादा महान हैं सरकार की नीतियां जो एक बार बन गई तो बदस्तूर जारी रहती हैं। फिर चाहे उनकी जरूरत हो या न हो। हर साल उन नीतियों पर अरबों रूपए लुटाए जाते हैं। बरसों पुरानी ऐसी ही नीति है – खाद्यान्न की खुली खरीद।

 

हम भारतीय असहज मुद्दों से बचने में उस्ताद  हैं। असहज मामलों पर चर्चा करने के बजाय हम ढोंगी और झूठा बनना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है शराब के सेवन का, जिस पर चर्चा से परहेज करना हम अच्छी तरह सीख चुके हैं। हमसे उम्मीद की जाती है कि हम शराब से संबंधित हर चीज की सार्वजनिक रूप से आलोचना करेंगे।

वहीं व्यक्तिगत स्तर पर करोड़ों भारतीय शराब का मजा लेते हैं। इनमें केवल बिजनेसमैन और कॉपरेरेट दुनिया में काम करने वाले लोग ही नहीं हैं, बल्कि राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, शिक्षक और पत्रकार भी शामिल हैं। इस

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शिशु मृत्यु दर और अपेक्षित आयु के मामले में बिहार राष्ट्रीय औसत से पीछे ही रहा करता था, लेकिन अभी वह दोनों मामलों में इसके काफी करीब पहुंच गया है। 47 प्रति हजार के आंकड़े के साथ फिलहाल बिहार शिशु मृत्यु दर के मामले में भारतीय औसत (48 प्रति हजार) से थोड़ा बेहतर स्थिति में है, जबकि 65.6 वर्ष की अपेक्षित आयु के साथ वह करीब-करीब भारतीय औसत (66.1 वर्ष) की बराबरी पर है। कुल मृत्यु दर के मामले में 7.2 प्रति हजार के भारतीय औसत के मुकाबले बिहार 6.8 प्रति हजार के आंकड़े के साथ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। यह तथ्य बिहार में टीकाकरण की शानदार सफलता को व्यक्त करता है। कुछ अंधेरे

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बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और कांग्रेस एक दूजे की ओर तक रहे हैं। चिदंबरम बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए मानकों में कुछ बदलाव करने का भरोसा दे चुके हैं, जिसकी मांग नीतीश लंबे समय से करते रहे हैं। 17 मार्च को नीतीश ने रामलीला मैदान में अपनी रैली में एक बार फिर यह मांग उठाई। नीतीश कुमार लोकसभा चुनावों में विशेष राज्य के दर्जे की उपलब्धि को भुनाना चाहते हैं। निश्चित रूप से वह इतने भोले नहीं हैं जो यह मानकर चल रहे हों कि यह दर्जा बिहार का कायाकल्प कर देगा और निकट भविष्य में बिहार आर्थिक पिछड़ेपन से उबर जाएगा।

देश में 11 राज्यों को

1995 में सीके जाफर शरीफ के बाद पवन कुमार बंसल रेल बजट पेश करने वाले पहले कांग्रेसी रेल मंत्री हैं। इसलिए लोग उम्मीद कर रहे थे कि इस बार 'रीजनल' नहीं 'नैशनल' रेल बजट आएगा। लेकिन कुछेक अपवादों को छोड़कर रेल बजट लकीर का फकीर ही साबित हुआ। 1990 के दशक में शुरू हुई गठबंधन राजनीति के नफा-नुकसान पर बहस हो सकती है लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इसने भारतीय रेल का कबाड़ा कर दिया। इस दौरान रेल मंत्रालय को सहयोगी दलों को दहेज में दिया जाने वाला 'लग्जरी आइटम' मान लिया गया। सहयोगी दलों से बनने वाले रेल मंत्रियों ने इसका जमकर फायदा उठाया और उनमें रेलवे से जुड़ी परियोजनाओं को अपने-अपने गृह

जब वित्तमंत्री पी. चिदंबरम 28 फरवरी को संप्रग-2 का आखिरी बजट पेश करने के लिए उठे थे तो लोग यह कल्पना रहे थे कि वह सब्सिडी और वोट के लिए कुछ और लोक-लुभावन योजनाओं की शुरुआत करने की कोशिश करेंगे। ऐसा नहीं हुआ। यह जिम्मेदार बजट निकला, जिसने राजस्व घाटे को 4.8 प्रतिशत पर रोकने का संकल्प व्यक्त किया। विडंबना यह रही कि यह उन अपेक्षाओं के लिहाज से अपर्याप्त रहा जो भारत की उच्च विकास दर के संदर्भ में की जा रही थीं।

संयोग देखिए कि बजट पेश करने से एक दिन पहले ही न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में भारतीय शोधार्थी सुगता मित्रा ने 10 लाख डॉलर का टीईडी (टेक्नॉलाजी,

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए कहा है कि देश का बाजार दुनिया के लिए हमने खोला है। उनकी बात सही है। देश सचमुच आज दुनिया का बाजार बन गया है, लेकिन दुनिया के बाजार में हम कहां हैं? यह उन्होंने नहीं बताया है। भारत दुनिया का एक ऐसा देश है, जिसके पास प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों की कमी नहीं है। अपने उद्योग धंधों का विज्ञान एवं तकनीक के जरिये आधुनिकीकरण करके विश्व बाजार का यह एक बड़ा खिलाड़ी बन सकता है, लेकिन आज जब दुनिया के बाजार पर नजर डालते हैं तो भारत सहित तमाम देशों में चीनी सामानों की भरमार दिखाई देती है। हमारे यहां लैपटाप से लेकर पेन

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