सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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एक दशक भी नहीं हुआ है जब उत्साही निवेश विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक भारत की तरक्की के गीत गा रहे थे। वे कहते थे भारत में इतनी क्षमता है कि अगले दो दशकों में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा। इसके लिए उन्होंने स्प्रेडशीट मॉडल्स का उपयोग किया। इसमें उन्होंने 8 से 10 फीसदी प्रतिवर्ष की वृद्धि दर डाली और अगले 30 साल का अनुमान निकाला। उन्होंने एमबीए स्कूलों में सीखा था कि कैसे ऐतिहासिक दरों के आधार पर पूर्वानुमान लगाते हैं। जाहिर है, कोई भी चीज जो 10 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ रही हो, 30 साल में महाकाय हो जाएगी (ठीक-ठीक कहें

केंद्र सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून को लोकसभा और राज्यसभा में पारित करा लेने के साथ अर्थव्यवस्था में कोहराम मचा है। यह ठीक ही है। सरकार के पास वर्तमान खर्च को पोषित करने के लिए राजस्व नहीं हैं। ऋण के बोझ से सरकार दबी जा रही है। वर्तमान में केंद्र सरकार का कुल खर्च लगभग 12 लाख करोड़ रुपये है, जबकि आय मात्र सात लाख करोड़ रुपये। लगभग आधे खर्चे को ऋण लेकर पोषित किया जा रहा है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा कानून का लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का बोझ अपने सिर पर लेना अनुचित दिखता है। फिर भी गरीबों को राहत देने के इस प्रयास का समर्थन करना चाहिए

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- शेफर्ड ऑफ पैराडाइज, बोटल मसाला इन मोइली, द डंकी फेयर, इन सिटी लाइट्स, हैव यू सीन द अराना को विभिन्न वर्गों की सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का खिताब

- डॉक्यूमेंट्री देखने पहुंचे केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोयली, टेस्ट क्रिकेटर मुरली कार्तिक, पत्रकार कुलदीप नैय्यर व समाज सेविका अरूंधति रॉय

- चार दिनों तक चले फिल्म फेस्टिवल के दौरान दस देशों की 38 डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का हुआ प्रदर्शन, फोटो प्रदर्शनी ने भी किया आकर्षित

लेह-लद्दाख घूमने गए अतुल कुमार नामक दिल्ली निवासी एक युवक को वहां के एक वर्ग विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र में शिक्षा की दयनीय स्थति को देख काफी पीड़ा हुई। स्थानीय लोगों विशेषकर युवाओं से बातचीत में उसे पता लगा कि उन्हें पढ़ने का काफी शौक है लेकिन उन्हें पढ़ाने वाला कोई नहीं है। उन्होंनें बताया कि उनके गांव के सरकारी स्कूल में जो टीचर आते हैं वो महीनें में एक दो दिन ही क्लास लेते हैं और अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहते हैं।

स्थानीय लोगों की परेशानी को सुन अतुल ने अपने कुछ अन्य उत्साही मित्रों के साथ लेह जाकर वहां के

नए कंपनी कानून को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल चुकी है। इसके चलते कम से कम 500 करोड़ रुपये के नेट वर्थ और न्यूनतम 1,000 करोड़ रुपये राजस्व कमाने या 5 करोड़ रुपये से ज्यादा मुनाफा अर्जित करने वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य हो जाएगा कि वे पिछले तीन वर्षों में अपने औसतन शुद्घ लाभ का 2 फीसदी कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर खर्च करें।

इस कानून में जो बुनियादी बात नजरअंदाज की गई है, वह यही कि परमार्थ का काम कारोबारी करते हैं कंपनियां नहीं। कंपनी का काम हरसंभव तरीके से

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बादलों में बंद रोशनी 54

बड़ी मुसीबतों में एक बेजोड़ चमक भी छिपी होती है। इनसे ऐसे दूरगामी परिवर्तन निकलते हैं, सामान्य स्थिति में जिनकी कल्पना का साहस तक मुश्किल है। किस्म-किस्म के दर्दनाक आर्थिक दुष्चक्रों के बावजूद भारत के लिए घने बादलों के बीच एक विलक्षण रोशनी झिलमिला रही है। रुपये की अभूतपूर्व कमजोरी ने भारत के ग्रोथ मॉडल में बड़े बदलावों की शुरुआत कर दी है। भारत अब चाहे या अनचाहे, निर्यात आधारित ग्रोथ अपनाने पर मजबूर हो चला है, क्योंकि रुपये की रिकार्ड कमजोरी निर्यात के लिए अकूत ताकत का स्त्रोत

लोकतंत्र बचाने का तीन सूत्रीय एजेंडा
 
पिछले दो दशकों में भारत का आर्थिक उदय उल्लेखनीय घटना है। इसने करोड़ों लोगों को घोर गरीबी से निकालकर ठोस मध्यवर्ग  बनाया है। बहुत ही खराब शासन (उत्तरप्रदेश में तो आपराधिक शासन) के बीच समृद्धि हासिल की गई है। दुर्गा शक्ति प्रकरण सार्वजनिक जीवन में आपराधिक व्यवहार का ताजा मामला है। उत्तरप्रदेश के लोगों ने जब अखिलेश यादव में भरोसा जताया तो उन्हें लगा कि वे अलग प्रकार की सरकार चुन रहे हैं। अब उन्हें लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ है।
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केंद्रीय सरकार ने राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के लिए इस कानून में जरूरी बदलाव लाने का निर्णय अगस्त 1 को ले लिया। इससे पहले विभिन्न प्रमुख राजनीतिक दलों पर इस विषय पर आम सहमति बनती नजर आई थी कि उन्हें सूचना के अधिकार की जिम्मेदारी से मुक्त रखा जाए। इससे राजनीतिक दलों की पोल अच्छी तरह खुल गई है और देश के नागरिकों को पता चल गया है कि चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्षी दल, वे सभी अपने को पारदर्शिता से बचाना चाहते हैं। इससे पहले केंद्रीय सूचना आयोग ने इस बारे में तर्कसंगत फैसला दिया था कि सूचना के अधिकार के कानून के अंतर्गत सार्वजनिक

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