सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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अब जब देश की आर्थिक नैया मझधार में बेदिशा-बेसहारा लुढ़कती साफ दिख रही है, भारत के अर्थशास्त्री और राजनीतिक पंडित किसी और के सिर दोष थोपने की कोशिश में लगे हुए हैं। नैया डुबोने का दोष क्या सोनिया गांधी के सिर मढ़ा जा सकता है या अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के सिर पर? कांग्रेस प्रवक्ताओं का सीधा जवाब है इस सवाल का- दोष इन दोनों राजनेताओं में से किसी का नहीं है। दोष है, वैश्विक परिस्थितियों का। यानी भारत में जो विदेशी निवेशक कभी दौड़े-दौड़े आया करते थे, इन दिनों अपना पैसा

कई विद्वानों का मानना है कि भारतवासी भारत में रहकर वैसी कामयाबी हासिल नहीं कर सकते, जो विदेशों में पहुंचते ही उनको नसीब हो जाती है। इस बार न्यूयॉर्क में मुझे इस बात की सच्चाई का गहरा एहसास हुआ। जिस दिन यहां पहुंची एक पारसी दोस्त की बेटी की शादी में कानक्टीकट जाना हुआ और रास्ते में पता चला कि गाड़ी का ड्राइवर देसी था।

उसके साथ बातें शुरू हुई, तो पता चला कि वह काम की तलाश में 20

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- आरटीई एक्ट की विसंगतियों की मार झेल रहे स्कूल संचालकों ने कहा, हो रही है ज्यादती
- स्कूलों को मान्यता प्रदान करने के लिए गुजरात मॉडल अपनाने की मांग
 
राइट टू एजुकेशन एक्ट की विसंगतियों की मार झेल रहे देश भर के लो फीस बजट प्राइवेट स्कूलों के प्रतिनिधियों ने गुरुवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में बैठक की। नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलायंस (एनआईएसए) के बैनर के तले आयोजित इस बैठक में स्कूल संचालकों व

मुझे वह दिन याद आता है। दोपहर बाद का वक्त था। मुंबई के एक्सप्रेस हाईवे पर ट्रैफिक जाम था। यह महत्वपूर्ण उपनगरीय हाईवे एयरपोर्ट सहित महानगर के महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ता है। सड़क पर फंसे पड़े कई अन्य लोगों की तरह मुझे भी फ्लाइट पकडऩी थी। कोई सामान्य दिन होता तो टर्मिनल तक पहुंचने में दस मिनट लगते। पर उस दिन आधे घंटे से ट्रैफिक एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा था। कोई सड़क नहीं बन रही थी और न कोई दुर्घटना हुई थी। पर कुछ पुलिसवालों ने ट्रैफिक रोक रखा था। मैंने कारण पूछा तो छोटा सा जवाब मिला, '

इतिहास के सबसे बड़े सबकों में से एक यह है कि केवल औद्योगिक क्रांति ही किसी गरीब राष्ट्र को समृद्ध बना सकती है। हर सफल राष्ट्र मैन्यूफैक्चरिंग से ही समृद्ध हुआ है। केवल इसी तरह कोई राष्ट्र लाखों अकुशल युवाओं को काम दे सकता है, लेकिन दो दशकों के सुधारों के बाद भी भारत अब तक औद्योगिक क्रांति नहीं ला पाया है। इसकी अर्थव्यवस्था अब भी उत्पादन क्षेत्र की बजाय सेवा क्षेत्र पर आधारित है। त्रासदी यह है कि 90 फीसदी भारतीय अच्छी मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों में काम करने की बजाय अनियमित किस्म की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। हालत यह है कि गणेशजी की

आर्थिक सुधार स्पष्ट और सरल होने चाहिए। तमाम शर्तों के उलझाव से बंधे हुए नहीं। यूपीए सरकार इस बात को काफी पहले भूल चुकी है। वह तो सबको साथ लेकर चलने के नाम पर हर बदलाव से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि इसके जरिये कितने वोट बैंकों को संतुष्ट कर पाएगी। यह नजरिया भूमि अधिग्रहण बिल जैसे सबसे जरूरी बदलावों को भी बहुत सारी शर्तों, लटकाऊ जुगाड़ों और लालफीताशाही के बीच उलझा देता है। ऐसे में आरबीआई के नए गवर्नर रघुराम राजन के बैंकिंग सुधार ताजी हवा के झोंके जैसे हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी बैंक अपनी नई शाखा आरबीआई से इजाजत लिए बगैर भी खोल सकता है। अभी तक

संसद का सत्र आरंभ होते ही नई दिल्ली का माहौल काफी सक्रिय और जोशपूर्ण हो जाता है। बावजूद इसके कि आजकल अधिकतर गतिविधियां संसद में नहीं, बल्कि संसद के बाहर पूरी की जाती हैं। इस बार के मानसून सत्र का अंतिम सप्ताह दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला, कई वर्षो के गतिरोध के बाद भूमि अधिग्रहण एवं खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए। दूसरा, वह मामले अधिक स्पष्ट दिखाई दिए जहां राजनीतिक दल आसानी से समझौता कायम कर सकते हैं। यहां मैं सूचना का अधिकार, संशोधन विधेयक, 2013 की बात कर रहा हूं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 एक ऐसा कारगर

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खाद्य सुरक्षा गारंटी अध्यादेश से सस्ते अनाज की आस लगाए बैठे लोगों पर अब दोहरी मार पड़ रही है। पूर्व की तुलना में समान मात्रा में अनाज पाने के लिए अब उन्हें दो से तीन गुना ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। यह सब हो रहा है सरकार द्वारा मुफ्त अथवा लगभग मुफ्त प्रदान करने के नाम पर। इस सरकारी गुणा-गणित से अंजान मुफ्त में सबकुछ पाने की आस लगाए बैठे लोगों को अब शायद कुछ सदबुद्धि प्राप्त हो। विस्तार से जानने के लिए पढ़ें...

35 किलो गेहूं के लिए

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