सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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यह बात हम भारतीयों को शायद ही हजम हो कि अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पर ब्रिटेन में भारी जुर्माना लगाया गया। वह लंदन में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आई थीं, लेकिन उनके सुरक्षाकर्मी 3.30 पाउंड का पार्किंग टिकट खरीदना भूल गए और गाड़ी को बिना फीस दिए ही पार्क कर दिया। इस पर वहां के ट्रैफिक वॉर्डन ने उनकी गाड़ी पर 80 पाउंड जुर्माने का नोटिस चिपका दिया। हिलेरी के बॉडीगार्ड चिल्लाते रहे लेकिन वॉर्डन पर कोई असर नहीं पड़ा। ऐसी ही एक और घटना है। एक स्वीडिश पूंजीपति फिनलैंड में तय गति सीमा से ज्यादा तेज गाड़ी चला रहे थे। पकड़े गए। फिनलैंड में जो जितना

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विश्व को भारत में संभावनाएं दिखाई दे रही है। वो हमारे देश को बाजार की तरह देखते हैं। उन्हें यहां 1 अरब से अधिक खरीददार दिखाई देते हैं। जहां वे अपने उत्पादों को बेच सकते हैं। हमारी मानवीय संपदा विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र है। यही कारण है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश में व्यवसाय के लिए आ रही है। उन्हें, यहां बेहतर आर्थिक भविष्य की संभावनाएं दिखती हैं। जबकि हम सवा सौ करोड़ लोग पूरी दुनिया के लिए उत्पादन करने में सक्षम हैं। आगे आने वाले समय में भारत को बाजार नहीं, उत्पादक देश बनना है। इसके लिए हमें अपने युवा शक्ति में भरपूर संभावनाएं

पिछले कुछ महीनों से देश में एक अजीब-सी मायूसी छा रही थी। महत्वपूर्ण नीतियों में विलंब, भ्रष्टाचार और लोकमत को अनदेखा करने की प्रवृत्ति से निराशा का माहौल बन गया था। लेकिन हताशा के ये बादल अब धीरे-धीरे हटते नजर आ रहे हैं। शुक्रिया उन नागरिकों का जिन्होंने जनहित में लड़ाई लड़ी। इसके अलावा माहौल में परिवर्तन में न्यायालय के निर्णयों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं की बदौलत राजनीतिक सुधारों के नागरिकों के प्रयास आंशिक रूप से ही सही, सफल हो पाए। आखिरकार जनता के दबाव और चुनावी राजनीति की मजबूरियों के कारण सरकार को अंतत: कार्रवाई करनी ही पड़ी

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देश का राष्ट्रीय वायुवाहक एयर इंडिया संकट में है। पिछले चार वषों में सरकार ने कंपनी को 16,000 करोड़ रुपये की रकम उपलब्ध कराई है। यह रकम 500 रुपये प्रति परिवार बैठती है। इसका मतलब यह हुआ कि देश के हर परिवार से यह रकम वसूल कर एयर इंडिया को उपलब्ध कराई गई है। इतनी बड़ी राशि झोंकने के बाद भी कंपनी का घाटा थम नहीं रहा है।

घाटे का एक कारण जरूरत से ज्यादा उड्डयन कंपनियों का बाजार में प्रवेश करना है। जैसे नुक्कड़ पर पान की चार दुकाने खुल जाएं तो ग्राहक बंट जाते हैं और इनमें से कुछ दुकाने शीघ्र ही बंद हो जाती

18 सितंबर को ग्रीस के निवासी उस समय काफी आहत हुए जब उन्हें वामपंथी रैप गायक की हत्या और पूर्व में नियो नाजी पार्टी से संबंधित गोल्डेन डॉन के एक सदस्य द्वारा हत्या की बात कबूलने की बात पता चली। यह पार्टी उस समय देश में हो रहे ओपिनियन पोल्स में तीसरे क्रम पर चल रही थी। इस मामले को लेकर मचे बवाल के कुछ दिनों के बाद, लोक व्यवस्था मंत्री ने गोल्डेन डॉन से संबंधित 32 आपराधिक मुकदमों का खुलासा प्रमुख अभियोजन के समक्ष किया, जिसे पार्टी के आपराधिक संगठन होने के बाबत फैसला करना था। अगले सप्ताहांत (28 व 29 सितंबर) को गोल्डेन डॉन नेता निकोलस माइकलोलियाकोस, चार अन्य

अर्थशास्त्र का एक अकाट्य सत्य है- बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाओगे। और कई सालों की खराब आर्थिक नीतियों व प्रबंधन के फलितार्थों के देश में चौतरफा परिलक्षित होने के साथ ही हम कह सकते हैं कि बबूल के पेड़ पर कांटे आज बहुतायत उग आए हैं। बड़े से बड़ा आशावादी भी भारतीय अर्थव्यवस्था में आई तेज गिरावट से इनकार नहीं कर सकता, हालांकि हाल तक इसे बड़ी शान के साथ रेजिलिएंट (टिकाऊ) और इंसुलेटेड (परिरक्षित) कहकर पेश किया जा रहा था। 

एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसके आंकड़ों के इंद्रजाल ने दिल्ली

तेलंगाना के गठन के फैसले के साथ हमने जो शुरू किया है, वह इतना  खतरनाक है कि यदि इसे अभी नहीं रोका गया तो हम आने वाले वक्त में बहुत पछताएंगे। धमकाकर नया राज्य बनाने के लिए मजबूर करने की कोशिश के नतीजे अच्छे नहीं होंगे।

हम भारतीयों के बारे में एक बड़ी ही अच्छी बात यह है कि हम उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ते। हमें हमेशा लगता है कि जल्दी ही कोई मसीहा आएगा या ऐसा कुछ महान हो जाएगा, जो हमें सारी समस्याओं से मुक्त कर देगा। बॉलीवुड ने इसे और मजबूती से हमारे दिमाग में बिठा दिया है, जहां अंत में हीरो सब कुछ ठीक कर

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नेता अक्सर चुनाव जीतने के बाद जनता को भूल जाते हैं। सांसद, विधायक या मंत्री बनकर पांच साल सत्ता का सुख भोगते हैं और मतदाताओं से किए वादों की अनदेखी करते हैं। मतदाताओं के पास अगर चुनने के साथ साथ माननीयों को वापस बुलाने का अधिकार (राइट टू रिकॉल) हो, तो नकारा नेताओं की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकेगी। दुनिया भर में ‘राइट टू रिकॉल’ का कई जगह इस्तेमाल हो रहा है। भारत में भी इसकी मांग जोर पकड़ रही है लेकिन सरकार और राजनीतिक दल इस मुद्दे पर उदासीन हैं। इस विषय से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रहे हैं हरिकिशन शर्मा

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