सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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पिछ्ले हफ्ते आई एक न्यूज रिपोर्ट ने काफी खलबली मचा दी थी, जिसमेँ नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा था कि स्कूल, कॉलेज और जेलोँ को निजी क्षेत्र के हवाले कर देना चाहिए। जैसा कि पहले से पता था, उनके इस वक्तव्य पर बवाल तो मचना ही था, अधिकतर लोग इस क्षेत्रोँ के निजीकरण की बात सुनकर नाराज हुए, परिणाम्स्वरूप कांत को यह स्पष्ट करना पड़ा कि वह सिर्फ स्कूलोँ के भौतिक संसाधनो में निजी क्षेत्र की भागीदारी की बात कर रहे थे।

लेकिन शिक्षा के अकादमिक स्तर पर निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी में

निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किए गए शिक्षा का अधिकार कानून के कारण देश यूनिवर्सल इनरॉल्मेंट के लक्ष्य के करीब तो पहुंच गया लेकिन गुणवत्ता युक्त शिक्षा अब भी हमारे यहां दूर की कौड़ी है। छात्रों के सीखने के स्तर व गुणवत्ता को जांचने वाले अंतर्राष्ट्रीय‘प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पिसा)’कार्यक्रम में भारत 74 प्रतिभागी देशों में 72वें स्थान पर रहा। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के मुताबिक वर्ष 2010 में सरकारी स्कूलों के चौथी कक्षा के 55.1 फीसदी बच्चे कम से कम घटाव के सवाल हल कर लेते थे,

समाज के कमजोर तबके की सुरक्षा सुनिश्चित करना हर सभ्य समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भारत के संदर्भ में बात करेँ तो यहाँ बच्चोँ, महिलाओँ और अल्पसंख्यकोँ की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार और पूरे समाज के हाथ में है। यहाँ महिलाओँ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मामले में कई महत्वपूर्ण बाधाएं हैं क्योंकि यहाँ तमाम तरह के पितृसत्तात्मक नियम बना दिए गए हैं जिन्हेँ न सिर्फ महिलाओँ की अधिकतर हिस्से बल्कि तकरीबन सभी पुरुषोँ का समर्थन हासिल है। लेकिन बच्चोँ की सुरक्षा के मामले में सरकारी मशीनरी की शिथिलता, भ्रष्टाचार और जांच के निष्क्रिय व

वर्ष 2018 के लिए बजट पेश करने का समय नजदीक आ गया है। पूर्ण बजट पेश करने का यह मोदी सरकार के कार्यकाल का आखिरी मौका होगा। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और वित्त मंत्री का ध्यान सभी को खुश करने पर होगा। आर्थिक प्रगति और विकास का नारा देकर सत्ता में आयी मोदी सरकार का ध्यान शुरू से ही शिक्षा पर भी रहा है। नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसी एजेंडे के तहत शुरू किया गया था हालांकि इसमें अबतक सफलता नहीं मिल सकी है। स्मृति ईरानी को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा और प्रकाश जावड़ेकर को बड़ी उम्मीदों के साथ यह जिम्मेदारी सौंपी गई।

- सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि आधार कार्ड के इस्तेमाल से 60,000 करोड रुपये बचे हैं, इसका मतलब है कि सिस्टम में तमाम खामियाँ हैं। 
- सरकार हर बच्चे की स्कूलिंग पर साल में कम से कम 25,000 रुपये खर्च करती है। इसके बावजूद सरकारी स्कूल अच्छी शिक्षा देने में असफल हैं, इसके लिए डिलिवरी सिस्टम ही जिम्मेदार है।

1.3 बिलियन आबादी के साथ भारत की समस्या भी काफी बडी है, यहाँ 1 बिलियन लोग प्रतिदिन 2 डॉलर्स से कम कमाते हैं, 30 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं,

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च

पहली बार कर्नाटक सरकार ने एक प्रस्ताव दिया जिसका उद्देश्य था लोगोँ के लिए व्यक्तिगत स्तर पर स्कूल की शुरुआत करना और उसे चलाना आसान बनाना। प्रस्ताव के अनुसार, एक शैक्षिक संस्थान खोलने के लिए कोई भी प्राइवेट बॉडी लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (एलएलपी) रजिस्टर  कराकर काम कर सकती है, उसके लिए एक सोसायटी अथवा चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर कार्य करने की बाध्यता नहीं होगी। लेकिन इसकी शर्त यह होगी कि इनका प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा ही होगा और संस्थान नॉन-प्रॉफिट शेयरिंग आधार पर ही चलेगा।

कल्पना कीजिए कि आप एेसे आदर्शवादी युवा हैं, जिसमें भावी पीढ़ी के बच्चों को प्रेरित करने की महत्वाकांक्षा है। इसलिए आप स्कूल खोलते हैं। आप अपने जैसे ही प्रेरक शिक्षक जुटाते हैं। स्कूल तत्काल सफल हो जाता है और उसे छात्रों, पालकों और समाज का सम्मान प्राप्त होता है। फिर 2010 में एक नया कानून (राइट टू एजुकेशन एक्ट) आता है। इसमें सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों में वेतन की समानता की बात है। आप अपने शिक्षकों का वेतन दोगुना कर 25 हजार प्रतिमाह करने पर मजबूर होते हैं। यहां तक कि श्रेष्ठतम निजी स्कूल जैसे दून स्कूल और मेयो को भी वेतन बढ़ाने पड़ते हैं

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