सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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एक बार की बात है। एक चमकदार और रंगीन फूलों से भरे घास के मैदान और उद्यानों के बीचोबीच स्थित एक पुराने पेड़ पर मधुमक्खियों का एक बड़ा छत्ता स्थित था। छत्ते में एक रानी मधुमक्खी थी, जिसे कुछ वरिष्ठ मधुमक्खियों के साथ छत्ते के संचालन के लिए चुना गया था। सामूहिक रूप से चयनित इस व्यवस्था को सरकार कहा जाता था। श्रमिक मधुमक्खियों को विश्वास था कि सरकार उनके द्वारा एकत्रित शहद का समुचित भंडारण करेगी और उनकी देखभाल करेगी। सरकार के उपर भी एक जिम्मेदारी थी कि वह नए नए उद्यानों की खोज करेगी ताकि मधुमक्खियों के बच्चों की आने वाली पीढ़ी

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वैश्विक गांव में तब्दील हो चुकी दुनिया के तमाम देश जहां वस्तुओं, सेवाओं व खाद्यान्नों की विनिमय प्रक्रिया को अपनाकर देश को प्रगति व देशवासियों को समृद्धि की ओर अग्रसर करने में जुटे हैं वहीं, आश्चर्यजनक रूप से हमारे देश के कुछ राजनैतिक दलों और उनके समर्थकों का अब भी मानना है कि बाजार का नियमन कर कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है। कम से कम पश्चिम बंगाल में आलू की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाये जा रहे कदम तो यही साबित करते हैं। ममता बनर्जी सरकार ने राज्य में आलू की लगातार बढ़ती कीमतों से निबटने के लिए कीमतों पर

यह जानते हुए भी कि अपना भारत महान ऐसा देश है, जहां इंसानों और इंसानियत की कदर कम होती है, हैरान हुई पिछले सप्‍ताह जब बुलडोजर चले कैंपा कोला बिल्डिंग के दरवाजों पर। हैरान हुई अधिकारियों और पुलिस वालों की बेरहमी को देखकर, और शायद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी हैरान हुए होंगे, वरना न रुकवाते लोगों को बेघर करने की यह बर्बर कार्रवाई। 

ऐसे महानगर में जहां घर मिलना इतना मुश्किल है कि झुग्गी बस्तियों में बसने को मजबूर हैं इस शहर के आधे लोग। इन बस्तियों में चोरी करके लेनी पड़ती

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टमाटर और प्याज समेत खाद्य पदार्थो की बेतहासा बढ़ती कीमतों को लेकर उपभोक्ता परेशान हैं, परंतु लोग भूल रहे हैं कि कुल मिलाकर कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात उपभोक्ताओं के हित में है। देश में खाद्य तेल और दाल की उत्पादन लागत ज्यादा आती है। इनका भारी मात्र में आयात हो रहा है, जिनके कारण इनके दाम नियंत्रण में हैं। यदि हम विश्व बाजार से जुड़ते हैं तो हमें टमाटर, प्याज के दाम ज्यादा देने होंगे, जबकि तेल और दाल में राहत मिलेगी। मेरी समझ से उपभोक्ता के लिए तेल और दाल ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अत: टमाटर और प्याज के ऊंचे दाम को वहन करना चाहिए।

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सर्वेक्षण पर सवाल

जनमत सर्वेक्षणों पर कांग्रेस की आपत्ति निराधार नहीं कही जा सकती, लेकिन वह जिस तरह उन पर प्रतिबंध लगाने की वकालत कर रही है उससे उसके इरादों को लेकर संदेह पैदा होता है। क्या वह इसलिए जनमत सर्वेक्षणों के खिलाफ खड़ी हो गई है, क्योंकि हाल के ऐसे सर्वेक्षणों में उसकी हालत पतली होती दिखाई गई है? पता नहीं सच क्या है, लेकिन यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पिछले कुछ समय से अपने आलोचकों के प्रति कुछ ज्यादा ही सख्त तेवर अपनाती दिख रही है।

क्या यह महज एक

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा निर्धारित योग्यता के अनुसार, वर्तमान में शिक्षक बनने के इच्छा रखने वाले अभ्यर्थियों को न केवल डिप्लोमाधारी होना चाहिए बल्कि शिक्षण पात्रता परीक्षा (टीईटी) में भी उत्तीर्ण होना चाहिए। पहली से पांचवी कक्षा में अध्यापन के लिए अभ्यर्थी को सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 50% अंक के साथ प्राथमिक शिक्षा में डिप्लोमा और शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है।

सवाल यह है कि आखिर टीईटी की आवश्यकता क्यों? क्या डिप्लोमा काफी नहीं है? यदि नहीं है तो क्या यह उक्त पाठ्यक्रम की

शिक्षा में गुणवत्ता की गिरावट चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्वविद्यालय ज्ञान तथा नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित किए जाते हैं। यहां नई पीढ़ी को तैयार किया जाता है। कोई भी संस्था या विश्वविद्यालय किस ऊंचाई तक अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा सकता है तथा युवा प्रतिभा का विकास कर सकता है इसमें कुलपति द्वारा प्रदत्त शैक्षिक, नैतिक तथा बौद्धिक नेतृत्व सबसे महत्वपूर्ण होता है। हाल ही में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्राध्यापकों ने एक अपील की है कि नया कुलपति किसी विद्वान, अकादमिक तथा लब्धप्रतिष्ठित व्यक्ति को बनाया जाए, जो स्वयं के कार्य तथा लगन से अन्य को

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जब ऐसा कहा गया है कि मानव (Home Economicus) धन पैदा करने के लिए तैयार किया गया एक यंत्र है, तो भारतीय अर्थशास्त्र में बताए जा रहे उस तर्क की जांच करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, जिसके अनुसार भारत की विशाल जनसंख्या गरीबी का एक कारण है। यदि मनुष्य एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो धन पैदा कर सकती है, तो इसकी अधिक संख्या गरीबी का कारण कैसे हो सकती है? सच क्या है ?

सच यह है कि नक्शे पर अंकित प्रत्येक बिंदु, जो किसी शहर या कस्बे को प्रदर्शित करता है और घनी आबादी वाला है, अन्य स्थानों (यथा

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