सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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पिछले तीन वर्षों से हमारी अर्थव्यवस्था संकट में है। विकास दर लगातार गिर रही है, महंगाई बढ़ती जा रही है और रुपया टूट रहा है। इन सभी समस्याओं की जड़ में कुशासन ही दिखाई देता है। महंगाई बढ़ने का कारण है सरकार द्वारा अपने राजस्व का लीकेज किया जाना। जैसे सरकार का राजस्व एक करोड़ रुपया हो और उसमें 20 लाख रुपये का रिसाव करके अफसरों और नेताओं ने सोना खरीद लिया हो। अब सरकार के पास वेतन आदि देने के लिए रकम नहीं बची। ये खर्चे पूरे करने के लिए सरकार ने बाजार से कर्ज लिए।

कर्ज लेना आसान बनाने

वर्ष 2014 में भारत के समक्ष जो सबसे बड़ी संभावना और चुनौती होगी, वह आर्थिक विकास की उच्च दर को वापस लौटाने की होगी, जैसा कि कुछ वर्ष पहले था। यह केवल उच्च विकास ही है जो हमारे देश की सतत समृद्धि को सुनिश्चित करेगी। 2014 के आम चुनावों में हमें अवश्य ही एक ऐसे उम्मीदवार और पार्टी के पक्ष में मतदान करना चाहिए जो विकास को वापस पटरी पर लौटा सके।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में एक फीसद की बढ़ोतरी से प्रत्यक्ष तौर पर 15 लाख नौकरियों का सृजन होता है। हर एक नौकरी से अप्रत्यक्ष

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वाघ बनाम आदिवासी – अनुसूचित जनजाति (वन अधिकार मान्यता) बिल 2005 पर बहस को इसी रूप में पेश किया जा रहा है। आप अगर वाघ के पक्ष में हैं तो आपको आदिवासियों के वन अधिकार को मान्यता नहीं देनी चाहिए। और यदि आप आदिवासियों के पक्ष में हैं तो इसका मतलब यह है कि वाघ आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। यह पूरीतरह से झूठी दुविधा है।
जबकि हमें बाघों (और पेड़ों) को बचाने के लिए हमें वन विभाग से जंगल वापस लेने चाहिए और उन्हें वनवासियों की देखरेख में रखना चाहिए। आजादी के पहले और आजादी के बाद
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उत्तराखंड के विश्व स्तरीय कार्बेट पार्क पर एक बार फिर शिकारियों की शिकंजा कसता जा रहा है। पिछले दस महीनों में बाघों के शिकार की घटनाएं निरंतर अंतराल पर सामने आई हैं। इतना नहीं नहीं, बल्कि बाघों की अन्य कारणों से मौत का सिलसिला भी जारी है। इस वर्ष अभी तक दस बाघों की मौत हो चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर वन विभाग समेत बाघों के संरक्षण में जुटी अन्य एजेंसियों की योजनाएं कारगर साबित क्यों नहीं हो रही हैं।

कार्बेट पार्क की यूपी व उत्तराखंड से लगी सीमा पर हाल ही में

लगभग एक साल पहले पाकिस्तानी सैनिक नियंत्रण रेखा के इस तरफ आकर हमारे सैनिकों के सिर काट ले गए थे। हमारी सरकार ने पहले इस पर विरोध जताया, फिर चुप्पी साध ली। चीनी सैनिकों ने दौलत बेग ओल्डी में आकर अपना शिविर लगा दिया, लेकिन तब हमारे विदेश मंत्री ने यह कहकर बात टाल दी थी कि इसे एक खूबसूरत चेहरे पर छोटी-सी फुंसी के रूप में देखा जाना चाहिए। यानी चीन के साथ हमारे खूबसूरत रिश्ते में कड़वाहट नहीं आनी चाहिए। लेकिन न्यूयॉर्क में हमारी एक राजनयिक गिरफ्तार क्या हुई, उस पर ऐसा हंगामा खड़ा हुआ पिछले दिनों, जैसे अमेरिका के साथ हमारे सारे संबंध तोड़ने की

पिछले दिनों भारत ने विश्व में अपनी प्रतिभा और विज्ञान का लोहा मनवाते हुए, मंगल-ग्रह पर बेहद कम खर्च पर अपना मंगलयान भेजा। दूसरी तरफ़, उसी भारत का सुप्रीम कोर्ट 1861 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए एक कानून में हस्तक्षेप से इनकार करता है, और इसकी जिम्मेदारी संसद को सौंप देता है। ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया 'इंडियन पीनल कोड' का सेक्शन 377 दो वयस्कों के समलैंगिक यौन संबध बनाने को अपराध मानता है, जिसके लिए आपको दस साल की जेल या आजीवन कारावास तक हो सकता है। इस कानून के समर्थकों का कहना है कि समलैंगिक संबंधों से एड्स का खतरा बढ़ता है, हालांकि

इसमें कोई शक नहीं कि आम आदमी पार्टी के आने से भारतीय राजनीति में उम्मीद जग गई है नए सिरे से राजनीतिक सवालों को देखने की। भ्रष्टाचार, परिवारवाद और झूठे वायदों ने राजनीतिक माहौल में जो निराशा फैलाई है देश भर में, वह थोड़ी कम हुई है। आप के नेता यह जानते हैं, सो हर तरह से दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे अन्य राजनेताओं जैसे नहीं हैं। मतगणना के दिन आप के बड़े नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर नतीजों का इंतजार करते दिखे। इस बात की खूब तारीफ की टीवी के पंडितों ने। जीत का जश्न मनाया आप ने जंतर-मंतर पर आम कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ। यह

खुद को बदलें राहुल और कांग्रेसी

 

मुझे याद आता है कि स्कूल में मैंने एक नाटक में भाग लिया था। नाटक था, 'सम्राट के नए कपड़े।' कथा एक निर्वस्त्र राजा के आसपास घूमती है, जो सोचता था कि उसने विशेष प्रकार के वस्त्र पहन रखे हैं। उसके दरबार के चापलूस उससे सहमत थे और इतने अद्भुत कपड़े पहनने के लिए उसे बधाई दे रहे थे। जब राजा सड़क पर निकला तो उससे डरे हुए लोग भी उसके नए पहनावे की तारीफ करने लगे। आखिर में एक मासूम बच्चे की निगाह उस पर पड़ी और

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