सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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जिस "स्वस्थ्य सरकारी नीति के सात सिद्धांतों'' की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं, वे मुक्त अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। उनमें से प्रत्येक किसी विशेष मुद्दे पर किस तरह लागू होता है, इस संबंध में हमारी राय अलग-अलग हो सकती है, पर ये सिद्धांत अपने आप में स्थापित सत्य हैं। इन्हें मैंने नहीं बनाया है। बल्कि मैंने इन्हें सिर्फ एक जगह इकट्ठा किया है। ऐसा नहीं है कि मुक्त अर्थ व्यवस्था के आधार स्तंभ सिर्फ ये ही हैं या सिर्फ यही सत्य है, लेकिन ये एक संतुलित और सम्यक विचार जरूर प्रस्तुत करते हैं। मेरा विश्वास है कि सरकार की प्रत्येक संरचना में बैठे

- 'एजुकेशनः फिलॉसफी, पॉलिसी एंड प्रैक्टिस' विषयक वर्कशॉप के दौरान शिक्षा के वर्तमान व भावी स्वरूप और नीतियों पर हुई गहन चर्चा
- सेंटर फॉर सिविल सोसायटी और आजादी.मी ने मीडियाकर्मियों के लिए किया था दो दिवसीय वर्कशॉप का आयोजन

नई दिल्ली। किसी देश व वहां के नागरिकों समेकित विकास के लिए शिक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवयव है। अतः देश, समाज और नागरिकों के विकास के लिए शिक्षा सभी सरकारों की प्राथमिकता सूची में होती है। हालांकि अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी

देश के प्रत्येक बच्चे को समुचित शिक्षा मिलनी चाहिए, यह एक आदर्श वाक्य है। यह वाक्य जितना आदर्शवादी है उतना ही निर्विवाद भी है। भला कौन कहेगा कि समुचित शिक्षा नहीं मिलनी चाहिए! शायद कोई नही। खैर, इस आदर्श वाक्य को मै दो शब्दों की वजह से अधूरा मानता हूँ। बेहतर होता कि हम ये कहते कि "देश के प्रत्येक बच्चे को 'मन-मुताबिक़' शिक्षा मिले" बजाय कि उपरोक्त वाक्य कहें। शाब्दिक तौर पर दोनों ही वाक्य समानार्थी प्रतीत होते हैं लेकिन व्यहारिकता के स्तर पर प्रयोग होने वाले सिद्धांतों के धरातल पर दूसरा वाक्य ज्यादा सुधारवादी एवं पारदर्शी है। चूँकि किसी बच्चे

जोनाथन ने खास फायदे के मेले वाली उस औरत का सपना देखा। वह बार बार उसे पैसे दे रही थी और फिर से वापस छीनती जा रही थी। उसने उसे एक बार फिर पैसे दिए और उसे वापस लेने के लिए आगे बढ़ी। अचानक जोनाथन एक झटके से नींद से जागा। उसे याद आया कि उसे अपनी आमदनी की रिपोर्ट कर अधिकारियों को देनी है, वर्ना उसे भी इंसानों वाले चिड़ियाघर के बाड़े में बंद होना पड़ेगा।

ताजा सिंकी रोटी की स्वादिष्ट खुशबू उसकी नाक में भी गई। बूढ़ा आदमी मेज के पास खड़ा होकर नाश्ते के लिए जैम लगे टोस्ट तैयार कर रहा था।

एक प्रावधान को लेकर 'शिक्षा का अधिकार' कानून एक बार पुन: चर्चा में है। इसबार बहस इसबात पर हो रही है कि आरटीई के आर्टिकल 30(1) में दिए गये 'नो डिटेंशन' नीति में बदलाव किया जाय अथवा नहीं! सबसे पहले तो यह समझते हैं कि आरटीई का आर्टिकल 30(1) क्या कहता है ? इस अनुच्छेद के अनुसार  शिक्षा के अधिकार क़ानून में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि प्राथमिक स्तर पर किसी भी छात्र को कक्षा की परीक्षा में उत्तीर्ण-अनुतीर्ण करने की बाध्यता अथवा अनिवार्यता नहीं होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो कानून में एक 'सेट ऑफ़ क्वेश्चंस' वाली परीक्षा प्रणाली के आधार पर

अगर सवाल उठाया जाय कि 'स्कूल' क्यों ? तो सीधा जवाब मिलेगा, शिक्षा प्रदान करने के लिए। लेकिन वर्तमान स्थिति इस सीधे जवाब से उलट है। वर्तमान में स्कूल शिक्षा देने की बजाय सरकारी कानूनों का पालन करने अथवा न पालन कर पाने की स्थिति से निपटने में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार क़ानून' चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। लेकिन आज इस क़ानून के कई प्रावधान ही बच्चों की शिक्षा में आड़े आ रहे हैं। मसलन, आरटीई का बिल्डिंग कोड अथवा लैंड नार्म्स।

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न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ और लम्बित मामलों की तुलना में जजों की संख्या में भारी कमी का हवाला देते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर पिछले दिनों एक कार्यक्रम में भावुक हो गये। उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे। एक खबर के मुताबिक़ भावुक होते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा कि निचली अदालतों में 3 करोड मामले लंबित हैं। मात्र बीस हजार जजों के कंधों पर दो करोंड़ मामलों की सुनवाई का दबाव है। लाखों लोग इसलिए जेलों में हैं क्योंकि जज उनके मामले ही नहीं सुन पा रहे हैं, लेकिन इसके लिए जजों को दोष न

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गत दिनों दिल्ली सरकार के नीतिगत फैसलों में परस्पर विरोधाभाष पैदा करतीं दो ख़बरें मीडिया में आईं। बीस अप्रैल को मीडिया में एक खबर आई कि ऑड-इवन के दौरान निजी टैक्सी कम्पनियों द्वारा सर्ज-प्राइसिंग अर्थात मांग और आपूर्ति के आधार पर कैब कम्पनियों द्वारा किराया तय किये जाने को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बहुत नाराज हैं। मुख्यमंत्री द्वारा इसे खुली लूट बताते हुए इसपर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध लगाने की भी बात ख़बरों के माध्यम से सामने आई। इस खबर के ठीक दो दिन बाद एक दूसरी खबर यह आई कि दिल्ली सरकार ऐप आधारित प्रीमियम बस सेवा शुरू करने वाली है। दिल्ली

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