सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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एक तरफ जहां ये संगठन कृषि कानूनों का समर्थन करता है, वहीं इसने प्याज के निर्यात पर रोक को तत्काल समाप्त करने की मांग की है। इसने चेतावनी दी है कि यदि केंद्र सरकार उनकी इस मांग को नहीं मानती है तो वे बीजेपी के सांसदों पर प्याज फेंकेंगे।

 

सोमवार को कुछ किसान संगठनों ने कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की और उन तीन कृषि कानूनों के प्रति अपना समर्थन प्रदर्शित किया जिनके विरोध में हजारों किसान दिल्ली की सीमा पर प्रदर्शन कर रहे हैं। तोमर से

देश में बिजनेस के क्षेत्र में आंत्रप्रेन्योरशिप की तर्ज पर कृषि के क्षेत्र में फार्मप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है। एमएसपी और उसकी दर को लेकर राजनीति और विवाद हमेशा चलते रहेंगे लेकिन यदि समस्या का हमेशा के लिए समाधान तलाशना है तो इस क्षेत्र में भी उद्यमिता को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी है। ऐसा कृषि कार्य में तकनीक और उद्यमिता का मेल करके किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस देश में किसान को अबतक बाजार का विश्लेषण करने और उसके आधार पर जोखिम लेते हुए फसल पैदा करने और बाजार में बेचकर उसका पुरस्कार प्राप्त करने में अक्षम

आंदोलन कर रहे किसानों की छवि संतों अथवा पापियों के रूप में गढ़ी जा सकती है। 1960 के दशक में जब देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहा था तब उन्होंने हरित क्रांति की अगुवाई करके न केवल भारत को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि एक निर्यातक देश के तौर पर भी स्थापित किया। इसके लिए उन्हें नायक कहा जाना बिल्कुल उचित था।

लेकिन कम वर्षा वाले राज्य में चावल जैसे अत्यधिक पानी की जरूरत वाले फसलों को उगा कर पंजाब के किसानों ने भू जल स्तर को नाटकीय ढंग से कम कर दिया। इससे छोटे किसानों

वर्ष 1947 में भारत को एक विदेशी ताकत से राजनीतिक आजादी मिली थी और 1991 में भारत ने भारतीय राज्य से आर्थिक आजादी हासिल की। राजनीतिक आजादी के साथ सबको मताधिकार मिला और सभी नागरिक बराबर के भागीदार बने। बदकिस्मती से, 1991 में मिली आर्थिक आजादी का फायदा सभी नागरिकों को नहीं मिला। इसने मुख्य रुप से औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र को लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से मुक्ति दिलायी। आर्थिक सुधारों के दायरे में आबादी का एक बड़ा हिस्सा नहीं आया जो अपनी आजीविका औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र के बाहर कमाता था। भारतीय समाज के सबसे निचले तबके को किसी तरह की आर्थिक आजादी नहीं

किसान आंदोलन सरकार के लिए सबक है कि सुधार थोपे न जाएं, उनपर पहले समर्थन जुटाना जरूरी है

पंजाब के किसानों के मौजूदा आंदोलन में कई सबक हैं। उनमें से एक है कि राजनीति छोटा खेल है, एक 20-20 मैच, जबकि अर्थव्यवस्था लंबा, पांच दिवसीय टेस्ट मैच है। पंजाब के किसान 20-20 खेल रहे हैं और सरकार टेस्ट मैच। इस बेमेलपन के कारण दूसरा सबक यह है कि लोकतंत्र में सुधार मुश्किल है। एक लोकवादी एक रुपए प्रतिकिलो चावल देने का वादा कर सुधारक को चुनाव में हरा सकता है।

अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास कृषि क्षेत्र में सुधार के एक बड़े पैरोकार हैं और मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों को काफ़ी हद तक सही मानते हैं. लेकिन 'इंडिया अनबाउंड' नाम की प्रसिद्ध किताब के लेखक के अनुसार प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं. वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा

26 नवंबर का दिन भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। वर्ष 1949 में आज ही के दिन संविधान सभा ने देश के संविधान को स्वीकृत किया था। दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 से यह पूरे देश में लागू हो गया। इस दिन की महत्ता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने वर्ष 1979 से इसे राष्ट्रीय कानून दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गजट नोटिफिकेशन के द्वारा इस दिन को संविधान दिवस के रूप में मनाए जाने की पहल की।

इससे पहले 2014 के आम चुनावों के दौरान उन्होंने

सोचिए कि छूट वाली कीमत पर चिप्स का पैकेट खरीदने के लिए आपको गिरफ्तार कर लिया जाए। आपको यह उदाहरण इसलिए दिया जा रहा है ताकि आपको इस तरह के एक मामले को समझने में आसानी हो। दरअसल पंजाब विधानसभा में पिछले हफ्ते तीन विधेयक पारित किए गए जो इस तरह की गिरफ्तारी का प्रावधान करते हैं, हालांकि यह गिरफ्तारी चिप्स खरीदने पर नहीं होगी बल्कि छूट वाली कीमतों पर गेहूं और धान की खरीद पर होगी। ये विधेयक उन नये कृषि कानूनों के खिलाफ पारित किए गए जिन्हें हाल में केंद्र सरकार लेकर आयी। पंजाब सरकार का कहना है कि इन विधेयकों से किसानों के हितों की रक्षा होगी और

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