सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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सोचिए कि छूट वाली कीमत पर चिप्स का पैकेट खरीदने के लिए आपको गिरफ्तार कर लिया जाए। आपको यह उदाहरण इसलिए दिया जा रहा है ताकि आपको इस तरह के एक मामले को समझने में आसानी हो। दरअसल पंजाब विधानसभा में पिछले हफ्ते तीन विधेयक पारित किए गए जो इस तरह की गिरफ्तारी का प्रावधान करते हैं, हालांकि यह गिरफ्तारी चिप्स खरीदने पर नहीं होगी बल्कि छूट वाली कीमतों पर गेहूं और धान की खरीद पर होगी। ये विधेयक उन नये कृषि कानूनों के खिलाफ पारित किए गए जिन्हें हाल में केंद्र सरकार लेकर आयी। पंजाब सरकार का कहना है कि इन विधेयकों से किसानों के हितों की रक्षा होगी और

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च

दुनिया में कोरोना वायरस का तांडव लगातार जारी है। दुनिया में अबतक लगभग चार करोड़ लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं जबकि 11.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश भारत भी इस प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है। अब तक देश में 75 लाख लोग इस संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं और 1.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले 100 साल के इतिहास में इसे सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में देखा जा रहा है। कुल मौतों के हिसाब से भारत अमेरिका (2,24,282) और ब्राजील (1,53,690) के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। जबकि संक्रमित

रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

इस बहस की ताजा वजह

पिछले दिनों बहु प्रतिक्षित और बहु चर्चित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। देश की शिक्षा को लेकर नीति क्या हो, आखिरी बार यह 1986 में तय किया गया था। हालांकि 1992 में इसमें छिटपुट संशोधन किया गया था। वर्ष 2014 की चुनावी रैलियों में तब के बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा नीति में बदलाव की ज़रूरतों को मुद्दा बनाया था। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा लागू किये गए शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों की प्रधानमंत्री ने चुनावी रैलियों के दौरान मुखर

मुनि इंटरनेशनल स्कूल, वेस्ट दिल्ली के भीड़ भाड़ वाले उत्तम नगर एरिया में संचालित होने वाला एक बजट स्कूल है। बजट स्कूल यानी सरकारी स्कूलों में प्रतिछात्र प्रतिमाह खर्च होने वाली राशि के बराबर या कम शुल्क में शिक्षा प्रदान करने वाले प्राइवेट अनऐडेड स्कूल्स। आम दिनों में स्कूल और इसके आस पास छात्रों व अभिभावकों की काफी चहल पहल रहती है। लेकिन इन दिनों यहां सन्नाटा पसरा हुआ है। स्कूल के मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ है। इन पर जमी धूल और मकड़ी के जालों को साफ साफ देखा जा सकता है। इसके मालिक और भूतपूर्व सैनिक अशोक ठाकुर के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं।

दिल्ली एक बार फिर से मिशन मोड में है। यह मिशन है ‘मिशन नर्सरी एडमिशन’। नवंबर के अंतिम सप्ताह में नर्सरी दाखिलों के लिए गाइडलाइंस जारी होने के साथ ही अभिभावकों की दौड़ शुरू हो गई है। दौड़ अपने बच्चों को एक अदद ‘बढ़िया’ स्कूल में दाखिला दिलाने की है। यह सिर्फ घर से ‘पसंद’ के स्कूल तक की ही दौड़ नहीं है, यह दौड़ है उन सभी संभावित विकल्पों को आजमाने की जो उन्हें मनपसंद स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करा सके। इस दौरान अभिभावकों को जिस आर्थिक, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये सिर्फ वही जानते हैं। हालांकि गाइडलाइंस जारी करते समय प्रत्येक वर्ष शिक्षा विभाग द्वारा

लगभग 3 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली, दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से एक है। 1950 में दिल्ली की आबादी 10 लाख थी जो 2019 तक बढ़कर 2.96 करोड़ हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक दिल्ली की जनसंख्या 4.3 करोड़ हो जाएगी। लेकिन नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता के कारण जिस तेजी से शहर की जनसंख्या में वृद्धि हुई उस तेजी से यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर (भौतिक संरचना) में बदलाव नहीं हो सका। इस कारण अनके चुनौतियां पैदा हो गईं जैसे कि आवास, परिवहन, प्रदूषण, रोजगार, शिक्षा आदि आदि।
यदि हम दुनिया के अन्य अधिक जनसंख्या वाले बेहतर प्रबंधन युक्त शहरों की संरचना देखें तो हम पाएंगे कि

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