आगाज अच्छा है पर सफर अधूरा

लंबी अवधि में भारत की विकास दर तेज रहने के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं। मसलन भारत की आधी आबादी 30 साल से कम उम्र की है और इस उम्र में ये लोग वित्तीय मामलों में अधिक जोखिम उठाने के लिए तैयार होते हैं। जबकि एक 45 वर्ष का व्यक्ति वित्तीय मामलों में जोखिम नहीं ले सकता क्योंकि उसे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी के बारे में भी सोचना होता है।

सीधे शब्दों में कहें तो आने वाले लंबे समय में भारत में बाकी देशों के मुकाबले पहली पीढ़ी के अधिक उद्यमी सामने आएंगे, जो जाहिर तौर पर एक अच्छी खबर है। देश में हर जगह नए उद्यमी फल-फूल रहे हैं। लेकिन क्या नए उद्यमों में आई तेजी की यह बयार समाज के सबसे पिछड़े तबके दलितों तक पहुंच पाई है? इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि दलित उद्यमियों के बारे में कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है। सरकार द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों में दलित परिवारों के पास मौजूद परिसंपत्ति और स्वरोजगार अपनाने वाले दलितों से जुड़े आंकड़े मिल जाएंगे। लेकिन दलित उद्यमियों और कारोबारियों के बारे में कहीं कोई जानकारी मौजूद नहीं है।

पेनिसिलवेनिया विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया (सीएएसआई) ने इस दिशा में पहल की है। वह इस बारे में एक सर्वेक्षण कर रहा है, जिसमें 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कारोबार करने वाले दलित कारोबारियों की गणना की जाएगी। देश में 16.6 करोड़ दलित हैं और अभी तक इस सर्वेक्षण के तहत करीब 500 उद्यमियों के बारे में जानकारी जुटाई गई है। इस सर्वेक्षण में शामिल चंद्रभान प्रसाद का कहना है कि देश भर में दलित उद्यमियों की संख्या पता लगाने में अभी करीब डेढ़ साल और लगेगा। अभी तक इस सर्वेक्षण में जिन दलित उद्यमियों के नाम आए हैं वे स्वास्थ्य देखभाल, आतिथ्य सत्कार, विनिर्माण, ट्रेडिंग और निर्माण क्षेत्र से जुड़े हैं। दिलचस्प है कि अधिकतर दलित कारोबारी विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र में हैं। हालांकि इसकी कोई खास वजह नहीं गिनाई जा सकती। प्रसाद बताते हैं कि इनमें से कुछ कारोबारियों का सालाना कारोबार 1,000 करोड़ रुपये का है! हालांकि इनमें से ज्यादातर कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्घ नहीं हैं, लिहाजा इनका सही मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल हैं। इस बारे में कुछ अच्छी खबरें भी हैं। हाल में सीएएसआई ने उत्तर प्रदेश के 20,000 दलित परिवारों का अध्ययन किया, जिससे पता चला है कि 1990 के बाद से 2008 के बीच दलितों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

दलितों के आवास, भोजन और उपभोक्ता क्षमता में काफी सुधार हुआ है। प्रसाद का कहना है कि देश के ग्रामीण इलाकों में उपभोक्तावाद ने समाजवाद को पछाड़ दिया है। अध्ययन में यह भी पता चला है कि कृषि श्रमिकों के तौर पर काम करने वाले दलितों की संख्या में काफी गिरावट आई है जबकि दलित उद्यमियों की संख्या में अच्छा खासा इजाफा दर्ज किया गया है। पिछले दो दशक में हुए आर्थिक सुधारों ने काफी हद तक सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव को कम करने में मदद की है।

बदलाव की बयार का एक और उदाहरण है दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री यानी डिक्की का गठन। 2005 में गठित हुआ यह संगठन पिछले कुछ समय में काफी तेजी से काम कर रहा है। इस संगठन के 1000 से भी अधिक सदस्य हैं। फिलहाल इस मामले में 400 उद्यमियों के साथ महाराष्ट्र सबसे आगे चल रहा है। इसके बाद 200 उद्यमियों के साथ गुजरात का नंबर आता है।  उद्योग संगठन अपने सदस्यों का प्रतिनिधित्व करते हुए सरकार के पास लॉबिंग करते हैं। डिक्की का कहना है कि दलित उद्यमियों के सामने रकम का इंतजाम करना सबसे बड़ी चुनौती होती है क्योंकि उनके पास परिसंपत्ति नहीं होती है और बैंक भी उन्हें ऋण देने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं। सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम का संचालन किया जाता है। यह दलित उद्यमियों को ऋण मुहैया कराता है लेकिन यह रकम 5 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक ही होती है, जो बेहद कम है। हालांकि इस ऋण पर लगने वाले ब्याज के लिए सरकार सब्सिडी देती है।

पिछले वित्त वर्ष के दौरान निगम ने 232 करोड़ रुपये के ऋणों को मंजूरी दी और 180 करोड़ रुपये के ऋणों का आवंटन किया। इस रकम से कोई स्वरोजगार शुरू कर सकता है लेकिन उद्यमी नहीं बन सकता है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने दलितों की खातिर एक वेंचर कैपिटल फंड बनाने का सुझाव दिया है, जिसमें सरकार योगदान कर सके।  इन सभी कदमो से लगता है कि आगाज अच्छा है पर सफर  अभी अधूरा है।

- भूपेश भन्डारी