सोना कितना सोणा है...

भारतीयों का सोने के प्रति प्रेम जगजाहिर है। सोने के साथ भारतीयों का संबंध केवल पारंपरिक, सांस्कृतिक और भावुक जुड़ाव के कारण ही नहीं है बल्कि इसका एक जबरदस्त आर्थिक पहलू भी है। भारतीयों में बचत के लिए सोने में निवेश सार्वधिक पसंदीदा विकल्पों में से एक है। हालांकि इसका एक कारण सोने तक लोगों की आसान पहुंच, उपलब्धता, वांछित मात्रा में रखने की सहूलियत व अन्य स्थिर कीमत वाली वस्तुओं की तुलना में मुद्रा स्फीति के साथ सामंजस्य स्थापित रखने का गुण भी है। भारत में प्रतिवर्ष 1 हजार टन सोने का आयात होता है। वर्ल्ड गोल्ड काऊंसिल (डब्लूजीसी) के मुताबिक भारत में 20 हजार मीट्रिक टन से अधिक सोने का जखीरा मौजूद है। 
 
देशवासियों के हाथ में बहुमूल्य संपत्ति का जखीरा मौजूद होने की बात पर देश को जहां गर्व होना चाहिए वहीं भारत सरकार के लिए दरअसल, यह विषय चिंता का सबब बनता जा रहा है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 50 बिलियन डॉलर की कीमत का सोना आयात किया जाता है। यह जीडीपी का 3 प्रतिशत है जो कच्चे तेल के आयात के बाद दूसरे नंबर का सबसे बड़ा आयात है जो देश के घाटे में इजाफा करता है। चिंता का दूसरा कारण यह भी है कि इतना बड़ा बहुमूल्य जखीरा बेकार ही पड़ा है और इसका पूंजीकरण नहीं होता है। सोने की खरीद के प्रति हतोत्साहित करने के लिए भारत सरकार द्वारा पूर्व में कई कदम उठाए गए हैं जैसे कि आयात की मात्रा को सीमित करना और आयात शुल्क में वृद्धि करना आदि। हालांकि इसका फायदा होने की बजाए नुकसान ज्यादा हुआ। कालाबाजारी भी बढ़ी और घरेलू मांग पर कोई खास फर्क भी नहीं पड़ा। 
 
सोने के आयात में कमी लाकर वित्तीय घाटे को कम करने के लिए भारत सरकार और सेंट्रल बैंक द्वारा निराशाजनक फैसलों की पूरी श्रृंखला ही शुरू कर दी गई। सोने के आयात पर लगाम लगाने के लिए भविष्य में भी, चाहे कितनी ही योजनाएं बनाई जाएं और चाहे कितने ही प्रभावी ढंग से उनका क्रियान्यवन किया जाए, उनका असफल होना अवश्यंभावी है। सोने की बढ़ती कीमतें और लोगों द्वारा सोने में किया जाने वाले निवेश की प्रक्रिया, इसके गहरे आर्थिक, वित्तीय और मौद्रिक समस्याओं के लक्षण हैं ना कि समस्याओं के कारण। वास्तव में इस समस्या का हल बचत और निवेश के मौजूदा विकल्पों को और अधिक आकर्षक बनाने में समाहित है। बैंक में रूपए के रूप में बचत कम रिटर्न प्रदान करता है और कभी कभी इसके नकारात्मक रिटर्न्स भी प्राप्त हो जाते हैं। अप्रैल 2014 में देश में उपभोक्ता मुद्रास्फीति की दर 9.39 प्रतिशत जबकि बैंक में जमा दर 6 प्रतिशत से 8.5 प्रतिशत के बीच थी। आरबीआई द्वारा समय समय पर मुद्रा अवमूल्यन करने के कारण रूपए में बचत करना भी सर्वाधिक पसंदीदा विकल्प नहीं होता है। जबकि सोने में निवेश से मुद्रा अवमूल्यन के कारण होने वाले नुकसान की संभावना कम हो जाती है। अतः भविष्य में भी इसमें कमी आने की संभावना क्षीण है। 
 
उचित होगा कि सरकार लोगों को सोना रखने से वंचित करने की बजाए व्यापार और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने वाले माहौल का निर्माण करे। प्रभावी पूंजी बाजार की उपस्थिति, निवेश की विविधता और बचत के विकल्पों की उपस्थिति ही हल है। इससे नौकरियों में इजाफा और निर्यात में वृद्धि होगी देश के आयाता निर्यात में संतुलन स्थापित हो सकेगा। धीरे धीरे लोग सोने में निवेश की बजाए अन्य वित्तीय संसाधनों की ओर आकर्षित होंगे।  
 
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीमः
सरकार को भी इस बात का आभास हो चुका है कि लोगों के मन में सोने के प्रति विश्वास को कम कर पाना संभव नहीं है। इसलिए विशेषज्ञों व अन्य विभागों के द्वारा निष्क्रिय पड़े सोने की पहचान कर उसपर काम किया जाना शुरु कर दिया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा भी यह मान लिया गया प्रतीत होता है और देश में पड़े 20 हजार टन सोने के जखीरे का उपयोग करने के लिए चतुराई भरे कदम उठाए जाने लगे हैं। उन्होंने गोल्ड मोनेटाइजेशन योजना की घोषणा की है जिसके तहत जमाकर्ता अपने मेटल अकाउंट पर ब्याज कमा सकेगा। साथ ही उन्होंने गोल्ड बॉण्ड जारी करने की भी घोषणा की है जो लोगों को निश्चित दर पर ब्याज कमाने और नकद मानदेय उपलब्ध कराने का अवसर उपलब्ध कराएगा। इससे लोग एक तरफ जहां आसानी से सोने में निवेश कर सकेंगे वहीं सुनारों पर उनकी निर्भरता भी घटेगी। योजना को सफल बनाने के लिए सरकार को ब्याज दर को भी ऊंचा रखना होगा ताकि लोगों को सोने से रिटर्न प्राप्त हो सके अन्यथा धीरे धीरे यह भी अप्रासंगिक होता जाएगा।
 
कुछ अन्य विचारः
सरकार द्वारा लगातार काले धन के मुद्दे पर रोक लगाने पर जोर दिया जाता रहा है। सोने में बड़ा निवेश काले धन के माध्यम से भी किया जाता है। जिन लोगों ने सोने में निवेश किया है वे सरकारी बॉण्ड में निवेश करने से बचेंगे क्योंकि ऐसा करने से उनके लेन देन की प्रक्रिया सरकारी जांच के दायरे में आ जाएगी। सरकार को चाहिए कि वह लोगों को एक निश्चित समय के लिए सोने को बैंक में जमा कराने की योजना शुरु करे जिसके तहत लोग अपनी संपत्ति की घोषणा स्वयं कर दें और इसे व्हाइट मनी में तब्दील कर सकें।  इससे लोगों और सरकार दोनों का लाभ होगा और कम समय में ब्लैक मनी को व्हाइट मनी में परिवर्तित किया जा सकेगा।
 
- डॉ. अमित चंद्र
सेंटर फॉर सिविल सोसायटी