सोने पर सरकारी नीति और तस्करों की चांदी

सोने की तस्करी में जबर्दस्त इजाफा दर्ज किया जा रहा है। 2014-15 में अवैध ढंग से लाया जा रहा 1000 करोड़ रुपये मूल्य का (3500 किलोग्राम) सोना जब्त किया गया। दो साल पहले की तुलना में यह मात्रा लगभग दस गुनी है।
 
देश के इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर सोने की तस्करी आज तक नहीं देखी गई थी। एक जमाने में यह देश की बहुत बड़ी समस्या मानी जाती थी लेकिन मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में आकर यह अतीत की बात हो गई थी।
 
हैरत की बात है कि देखते-देखते इसने फिर से भीषण रूप ले लिया है और इस बार इसका पैमाना पहले से कहीं बड़ा है। मौजूदा सरकार के कुछ उत्साही समर्थक कह सकते हैं कि इन आंकड़ों का मतलब सिर्फ यह है कि अब चौकसी बढ़ गई है।
 
यानी तस्करी तो पहले भी होती थी लेकिन अब माल ज्यादा पकड़ा जाता है। अफसोस! कि यह निष्कर्ष व्यावहारिक कसौटियों पर खरा नहीं उतरता। नई सरकार आने के बाद से निगरानी तंत्र के पुनर्गठन की कोई खबर नहीं है, न ही इस तंत्र में कोई नया अंग जोड़ा गया है।
 
ऐसे में दो ही संभावनाएं बनती हैं जो दो साल के अंदर अवैध सोने की बरामदगी में 900 फीसदी बढ़ोतरी की वजह समझा सकें। या तो कस्टम, पुलिस और अन्य संबंधित विभागों के कर्मचारी अचानक बहुत ज्यादा स्मार्ट हो गए हैं, या फिर तस्करी के इंटरनेशनल नेटवर्क पर बेवकूफों का कब्जा हो गया है।
 
जाहिर है, इनमें से एक भी बात पर भरोसा करने की कोई ठोस वजह नहीं है। ऐसे में यह मानने के सिवा कोई चारा नहीं कि सोने पर आयात शुल्क 10 फीसदी किए जाने के फैसले के बाद तस्करी में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है।
 
जानकारों के मुताबिक जब्त किया गया सोना अमूमन तस्करी से लाए गए कुल सोने का 10 फीसदी ही होता है। अगर यह सही है तो बीते एक साल में तस्करी से देश में लाए गए सोने की कीमत एक लाख करोड़ रुपए बैठती है।
 
इस संदर्भ में सरकार द्वारा प्रस्तावित स्वर्ण जमा योजना पर भी गौर करने की जरूरत है। इसके तहत बैंक सोने का स्रोत भी नहीं पूछेंगे। लिहाजा काले सोने को सफेद बनाने में एक भी पैसे का खर्च नहीं आएगा। कहीं यह स्कीम तस्करी की बीमारी को और बढ़ाने वाली न साबित हो।
 
साभारः नवभारत टाइम्स