वैश्वीकरण और नैतिक मूल्यों का विकासः जगदीश भगवती

मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आज के जमाने में अगर आप किसी यूनिवर्सिटी कैंपस में खुली बाजार व्यवस्था की बात करेंगे तो आप वैश्वीकरण की आलोचनाओं के तले दब जाएंगे। छात्रों और फैकल्टी के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार की मुखालफत की मुख्य वजह दूसरों के हितों की चिंता है। इसके पीछे सामाजिक और नैतिक कारण है। अगर इसे सरल शब्दों में कहें तो वे मानते हैं कि वैश्वीकरण का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता, लेकिन मैं इसके उलट सोचता हूं। मेरा मानना है कि वैश्वीकरण के चलते न केवल धन संपदा का निर्माण और विस्तार हो रहा है, बल्कि इसमें शामिल पक्षों में बेहतर नैतिक मूल्यों का विकास भी हो रहा है।
 
कई आलोचकों का मानना है कि वैश्वीकरण बाल मजदूरी, पिछडे देशों में गरीबी, महिला पुरुष के बीच समानता को बढ़ावा देने और पर्यावरण को बचाने जैसे सामाजिक और नैतिक एजेंडा को दरकिनार कर देता है। लेकिन जब मैंने दूसरे मुद्दों के साथ-साथ इन मुद्दों का अपनी किताब -इन डिफेंस ऑफ ग्लोबलाइजेशन- में विश्लेषण किया, तो नतीजे मेरे अंदेशे के उलट निकले।
 
उदाहण के तौर पर बहुत लोग मानते थे कि वैश्वीकरण के चलते मिले बडे आर्थिक अवसर का फायदा एक गरीब किसान कुछ इस तरह से उठाएगा कि वह अपने बच्चे को स्कूल से निकल कर काम पर लगा देगा। इस तरह खुली बाजार व्यवस्था का विस्तार एक बुरी ताकत के तौर पर समझा जाएगा । लेकिन मैंने पाया कि सच्चाई इसके ठीक उलट थी। बहुत मौकों पर वैश्वीकरण के चलते जब लोगों कि आमदनी बढ़ी तो उन्होंने  अपने बच्चों को स्कूल में बनाए रखा, वहां से निकाला नहीं। वियतनाम में चावल उगाने वाले किसान इसका बड़ा उदाहरण हैं। आखिर अब उनकी कमाई ज्यादा हो गई थी और बच्चों के जरिए होने वाली छोटी कमाई की जरुरत उन्हें नहीं बची थी।
 
अब लिंग समानता की ही बात करते हैं। वैश्वीकरण के बाद ऐसे उद्योग, जो आयात-निर्यात वाले सामान और सेवाओं से जुड़े थे, उनके बीच मुकाबला और तेज हो गया। इस प्रतियोगिता का नतीजा हुआ कि कुछ विकासशील देशों में महिला और पुरुष कर्मचारियों की तनख्वाह में अंतर काफी कुछ कम हो गया। इसकी वजह यह थी कि कंपनियों को जल्द ही यह एहसास हो गया कि पुरुषों के पक्ष में झुकाव के साथ वे चल नहीं सकतीं। कम कीमत और बेहतर उत्पादकता के साथ काम करने के दवाब के चलते जल्द ही कंपनियों का झुकाव महंगे पुरुष कर्मचारियों की जगह सस्ती महिला कर्मचारियों की तरफ होने लगा। इस तरह महिलाओं की पगार बढ़ गई और पुऱुषों की पगार कम हो गई। तनख्वाह के मामले में वैश्वीकरण ने निश्चित तौर पर कोई समानता कायम नहीं की है लेकिन फासले को कम जरुर किया है।
 
गरीबी की विषम समस्या से जूझ रहे भारत और चीन जैसे देशों में ऐसे कई सबूत है कि वहां वैश्वीकरण के दौर में व्यापार और विदेशी निवेश के बाद वहां काफी तरक्की हुई है। इसके बाद वहां गरीबी भी आश्चर्यजनक तौर पर काफी कम हुई है। इन देशों को अभी काफी आगे जाना है लेकिन वैश्वीकरण ने भौतिक सुख के मामले में यहां के करोड़ों लोगोंकी हालत पहले से काफी बेहतर कर दी। कुछ आलोचकों का मानना है कि गरीबी को कम करने के लिए आर्थिक विकास करने का विचार –पुरानपंथी ट्रिकल डाउन –रणनीति है। वह एक ऐसी तस्वीर उभारते हैं कि ऊंची सोसायटी या मिडल क्लास का एक आदमी दावत उड़ा रहा है और उसके नीचे कमजोर तबके के लोग और कु्त्ते बचा-खुचा और कबाड़ खाने में लगे हैं। हकीकत में विकास को बेहतर तरीके से हम एक आंदोलनकारी की ‘पुल अप स्ट्रैटजी’ के तौर पर समझ सकते हैं। एक बढती अर्थव्यवस्था गरीबों को ऊपर उठाती है ताकि उन्हें अच्छा रोजगार मिल सके और गरीबी कम हो सके।
 
वह यह भी मानते हैं कि वैश्वीकरण आमतौर पर समाज के कुछ खास मकसदों को ही पूरा करने में मदद करता है, कुछ आलोचकों का तर्क होता है कि यह नैतिकता को धीरे-धीरे बर्बाद कर देता है। उनकी नजर में फैलती खुली बाजार व्यवस्था एक ऐसे डोमेन में फैलती है, जिस पर सिर्फ मुनाफा देखा जाता है। मुनाफा कमाने की आदत इंसान को स्वार्थी और खतरनाक बना देता है। लेकिन ऐसा होना शायद ही मुमकिन है।
 
नीदरलैंड के इतिहास में सिमोन सचमा ने कैलविस्ट लोगों के बारे में जो कुछ लिखा है, जरा उसके बारे में सोचिए। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जरिए उन्होंने अपना भविष्य बनाया... लेकिन स्वार्थी होने के बजाय वह दूसरे के हितों के बारे में सोचते रहे। सचमा ने इसे  -- अमीरों का आश्चर्य –की संज्ञा ठीक ही दी है। कुछ इसी तरह की कहानी गुजरात के जैनियों की है। अपने कारोबार के जरिए जो कमाई जैनियों ने की, उसके साथ उनके नैतिक मूल्य भी जुड़े थे।
 
वैश्वीकरण का नैतिक मूल्यों पर क्या असर होता है –इसे बताने के लिए मैं  जॉन स्टुअर्ट मिल्स की कुछ पंक्तियां लिखना चाहूंगा। उन्होंने प्रिंसिपल ऑफ पॉलिटिकल इकोनॉमी (1948) में लिखा है....
 
वाणिज्य का आर्थिक लाभ इसके बौद्धिक और नैतिक असर की महत्ता के नीचे दब जाता है। ऐसे समय में जहां इंसान का विकास बहुत धीमा हो रहा है, दो अलग-अलग तरह के लोग जिनकी सोच और काम करने का अंदाज अलग हो , मूल्यों को बढ़ा-च़ढ़ाकर पेश करना बहुत कठिन है। ऐसा कोई देश नहीं, जिसे दूसरे से कुछ लेने की जरुरत नहीं पड़ती। न सिर्फ कुछ खास कला या तौर-तरीके बल्कि चरित्र निर्माण के वे पहलु भी, जिसके मामले में वे कमतर हैं।
 
बिना किसी अतिशयोक्ति के कहा जा सकता है कि दुनिया में शांति और अमन-चैन की गारंटी की मुख्य वजह हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हुई वृद्धि है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढोतरी विचारों और संस्थाओं के निरंतर विकास के साथ-साथ मनुष्य के लिए भी एक स्थाई सुरक्षा है।
 
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हम अक्सर वह परिघटना देखते हैं, जिसका मिल ने वर्णन किया था। 1980 के दशक में जब जापानी मल्टीनेशनल कंपनियों के द्फ्तर न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस जैसी जगहों पर खुले तो उनके कर्मचारी अपनी पत्नियों को वहां साथ लेकर गए। जब उन परंपरागत जापानी महिलाओं ने देखा कि पश्चिमी समाज में महिलाओं को किस तरह से देखा जाता है तो उनके अंदर भी महिलाओं के लिए समानताऔर अधिकार की भावना जगी। जब वे जापान लौटीं तो वहां समाज सुधार का जरिया  या यूं कहें कि एजेंट बन गईं। आज के दौर में टेलीविजन और इंटरनेट ने सामजिक और राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक और नैतिक जागृति जगाने में काफी अहम रोल अदा किया है।
 
एडम स्मिथ की एक बात काफी मशहूर है कि अगर यूरोप में किसी नैतिक मूल्यों वाले आदमी को पता चल जाए कि अगले दिन उसकी छोटी अंगुली नहीं बचेगी तो वह सारी रात नहीं सो पाएगा लेकिन उसे अगर यह बताया जाए कि भूकंप में उसके लाखों चानी भाई-बंधु की मौत हो गई है तो वह तसल्ली से खर्राटे भरेगा। इसकी वजह यह है कि उसने उन चीनी लोगों को कभी नहीं देखा। हमारे लिए चीनी अदृश्य नहीं हैं। डेविड ह्यूम के शब्दों में वह हमारी समझ के सबसे आखिर में हैं। पिछली गर्मियों में चीन में जबरदस्त भूकंप आया। टेलीविजन स्क्रीन पर फौरन तस्वीरें दिखने लगीं। दुनिया ने उसे अनमने से नहीं देखा बल्कि कुदरत के कहर से मारे गए लोगों से एक जुड़ाव महसूस  किया। उनके लिए संवेदना व्यक्त की.. ये वैश्विकरण के सबसे बेहतरीन लम्हों में से था।
 
- यह लेख जॉन टेम्पलट्न फाउंडेशन द्वारा उपलब्ध कराये गये लेख का अनुवाद है।
(जगदीश भगवती कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स और लॉ के यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं। वह इन डिफेंस ऑफ ग्लोबलाइजेशन नाम की किताब के लेखक भी है और आम नीतियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर लिखते हैं।)