सिर्फ ठोस योजनाएं बताएं

विधानसभा चुनावों के लिए घोषणापत्र आने का सिलसिला शुरू हो गया है। हमारे देश में हाल के वर्षों में चुनावों का चरित्र तो बदला है, पर घोषणापत्रों की भाषा नहीं बदली। आज भी उनमें हवाई बातें ज्यादा मिलती हैं। भारी-भरकम शब्दों की कलाकारी के जरिए वादे किए जाते हैं।

कोई पार्टी कहती है कि वह एक भयमुक्त समाज बनाएगी, कोई कहती है कि सामाजिक सौहार्द कायम करेगी। पर यह सब वे करेंगी कैसे, इसे बताना वे जरूरी नहीं समझतीं। वे यह ठोस बात नहीं करतीं कि थाने बढ़ाए जाएंगे या पु्लिस बल बढ़ेगा या पुलिस का स्वरूप बदलेगा। जैसे इस बार छत्तीसगढ़ के लिए अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने कहा है कि नक्सलवाद से निपटने के लिए उचित रणनीति अपनाई जाएगी। यह बात अलग-अलग रूपों में जनता वर्षों से सुन रही है। आखिर उचित रणनीति क्या है? पार्टी साफ क्यों नहीं कहती कि वह अमुक उपाय करेगी।

घोषणापत्रों में प्राय: कहा जाता है कि गरीबी दूर की जाएगी, राज्य का औद्योगीकरण किया जाएगा। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि इसके लिए क्या किया जाएगा? कौन से उद्योग कहां लगेंगे, उनमें किसको रोजगार मिलेगा? हां, ठोस बातों के नाम पर यह जरूर कहा जाता है कि चावल बांटे जाएंगे, कंप्यूटर या लैपटॉप बांटे जाएंगे। लेकिन यह तो मतदाता को रिश्वत देना हुआ। इसे किसी पार्टी का प्रोग्राम कैसे कहा जा सकता है। सच तो यह है कि किसी भी पार्टी के पास गरीब वर्ग के जीवन में बदलाव के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं है। ऐसी कोई ठोस प्लानिंग नहीं है, जिससे निर्धन तबका डिवेलपमेंट प्रोसेस का हिस्सा बन सके।

बहरहाल आम आदमी पार्टी (आप) का कहना है कि वह दिल्ली के सभी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 70 घोषणापत्र लाएगी, जिनमें बताया जाएगा कि अलग-अलग इलाकों में किस तरह के कदम उठाए जाएंगे। देखना होगा कि कहीं ये भी शब्दों का खेल बनकर न रह जाएं। आप बिजली बिल का संकट दूर करने की बात तो कहती है, पर उसे यह भी बताना होगा कि वह बिजली के निजीकरण के पक्ष में है या विरोध में। लोग भाषणबाजी से उकता गए हैं। आने वाले चुनावों में ठोस बातें ही की जानी चाहिए वरना घोषणापत्रों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा।

 

साभारः नवभारत टाइम्स